परिवार की प्रमुख विशेषताएं - Characteristics of Family

 परिवार की प्रमुख विशेषताएं - Characteristics of Family


विश्व के सभी समाजों में पारिवारिक संगठन की विविधता के बावजूद भी कुछ सामान विशेषताएं पाई जाती हैं।मैकाइबर और पेज नहीं ऐसी 8 प्रमुख विशेषताओं का वर्णन किया है जो भारतीय परिवार में भी पाई जाती हैं:


1.सार्वभौमिकता (Universality)- सभी छोटे-बड़े संगठनों में परिवार सबसे अधिक सार्वभौम है।यह सभी समाजों और सभी कालों में पाया जाता रहा है। प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में कभी ना कभी, किसी न किसी परिवार का सदस्य अवश्य रहा है और भविष्य में भी रहेगा। सामाजिक विकास के प्रत्येक स्तर पर परिवार पाया जाता है। प्रत्येक प्रकार के समाज में चाहे वह सभ्य, आधुनिक, नगरीय हो या असभ्य, आदिम, ग्रामीण हो परिवार का अस्तित्व सदैव रहा है।


2. भावात्मक आधार (Emotional Basis) परिवार के सदस्य भावात्मक आधार पर एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित रहते हैं। पति-पत्नी के बीच घनिष्ठ प्रेम और संतानकामना की पाई जाती है। माता-पिता में अपनी संतान के प्रति वात्सल्य और त्याग की भावना पाई जाती है। संतान में अपने माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के प्रति प्रेम, श्रद्धा, आदर के भाव पाए जाते हैं। परिवार के संगठन को बनाए रखने में इन भावनाओं का महत्वपूर्ण स्थान है।


3. रचनात्मक प्रभाव (Formative Influence) परिवार व्यक्ति का प्रथम सामाजिक पर्यावरण है।परिवारका बच्चों के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।यह बालकों के चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है तथा उनके जीवन को संस्कारित करता है। उन पर अमिट छाप डालता है और उनके व्यक्तित्व के निर्माण में योगदान देता है कूले ने परिवार को मानव स्वभाव का संवर्धनगृह (Nursery) कहा है।


4. सीमित आकार (Limited Size) प्राणीशास्त्रीय दशाओं के कारण परिवार का आकार बहुत ही सीमित होता है। इसमें पति-पत्नी के अतिरिक्त वास्तविक या काल्पनिक संबंधी पाए जाते हैं। इसमें वही बच्चे सदस्यों के रूप में होते हैं जिनका जन्म परिवार में हुआ हो या जिन्हें गोद लिया गया हो। इस दृष्टि से सामाजिक संरचना के औपचारिक संगठनों में परिवार सबसे छोटा है।


5. सामाजिक संरचना में केंद्रीय स्थिति (Nuclear Position in the Social Structure) सभी सामाजिक संगठनों में परिवार की केंद्रीय स्थिति है।संपूर्ण सामाजिक संरचना का आधार परिवार ही है। सरल प्रकार के समाज और अधिक विकसित पितृसत्तात्मक समाजों की सामाजिक संरचनाओं का निर्माण पारिवारिक इकाइयों के आधार पर ही हुआ है। आज के कुछ जटिल आधुनिक समाज में परिवार के इस कार्य में कमी आई है परंतु उसमें भी स्थानीय समुदाय परिवारों के संयुक्त रूप अथवा संघ हैं।


6. सदस्यों का उत्तरदायित्व (responsibility of the Members) परिवार के सदस्यों में उत्तरदायित्व की असीमित भावना पाई जाती है। संकट के समय व्यक्ति अपने समाज व राष्ट्र हित के लिए कार्य करता है,बलिदान की ओर अग्रसर होता है परंतु परिवार में वह सदैव ही एक-दूसरे के प्रति अपने उत्तरदायित्व को निभाता रहता है परिवार के लिए वह बड़े से बड़ा त्याग करने को तैयार रहता है। परिवार के प्रति उत्तरदायित्व की भावना की जड़े मनुष्य के स्वभाव में गहरी बैठी हुई हैं। उत्तरदायित्व की यह भावना परिवार के संगठन और स्थायित्व के लिए अत्यंत आवश्यक है।


7. सामाजिक नियंत्रण (Social Control) यद्यपि संसार के विभिन्न भागों में परिवार के अलग-अलग रूप दिखलाइए पड़ते हैं तथापि प्रत्येक स्थान पर परिवार सामाजिक नियंत्रण के एक साधन के रूप में कार्य करता है। व्यक्ति और समाज दोनों के दृष्टिकोण से ही परिवारिक एक आधारभूत और लाभदायक संगठन है।इसको बनाए रखने के लिए अनेक सामाजिक निषेध कानून पाए जाते हैं।


8. परिवार की अस्थाई और अस्थाई प्रकृति (Its Permanent and Temporary Nature ) - एक समिति के रूप में परिवार कुछ सदस्यों का समूह है। इन सदस्यों से मिलकर परिवार का निर्माण होता है। इनके परिवार से अलग हो जाने से परिवार का एक समिति के रूप में अस्तित्व समाप्त हो जाता है। विवाह द्वारा पति पत्नी मिलकर परिवार की रचना करते हैं और उनकी मृत्यु हो जाने पर अथवा एक दूसरे को छोड़ देने या तलाक देने पर परिवार भंग हो जाता है। इस रूप में परिवार की प्रकृति परिवर्तनशील या अस्थाई है परंतु जब हम परिवार पर एक संस्था के रूप में विचार करते हैं पाते हैं कि इनकी प्रकृति स्थाई है, यह निरंतर बना रहता है।पुराने सदस्य मृत्यु को प्राप्त होते हैं और नवीन सदस्य इसमें प्रवेश करते रहते हैं। एक संस्था के रूप में परिवार के नियम और कार्यप्रणाली बने रहते हैं, चलते रहते हैं जो परिवार को स्थायित्व प्रदान करते हैं।


9. वैवाहिक संबंध (Marital Relationship)- वैवाहिक संबंध के आधार पर ही परिवार का जन्म होता है। यह संबंध समाज द्वारा स्वीकृत होता है, इसी संबंध के आधार पर यौन संबंध और संतान उत्पत्ति होती हैं। जिन्हें समाज द्वारा मान्यता प्राप्त होता है। वर्तमान समय में हिंदू समाज में कुछ विशिष्ट परिस्थितियों मेंपति पत्नी को तलाक देने का अधिकार दिया गया है फिर भी इन सभी कारणों के बावजूद परिवार के सार्वभौमिक संरचना पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है।


10. आर्थिक व्यवस्था (Economic System)- प्रत्येक परिवार की साधारण रूप से कुछ आर्थिक आवश्यकता होती हैं जिसके माध्यम से सदस्य अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए आवश्यक वस्तुएं प्राप्त करते हैं और अपना जीवन निर्वाह करते हैं। बिना आर्थिक व्यवस्था के परिवार के सदस्यों का भरण पोषण संभव नहीं हो सकता।


11. वंश नाम (Nomenclature)- प्रत्येक परिवार में वंश नाम को चलाए रखने की एक व्यवस्था पाई जाती हैं।वंश नाम को निश्चित करने के संबंध में कुछ नियम पाए जाते हैं। परिवार में प्रत्येक बच्चे को किसी नियम के आधार पर उपनाम और वंश नाम प्राप्त होता है। एक परिवार के सदस्य पीढ़ी दर पीढ़ी इसी उपनाम से पहचाने जाते हैं। वंश नाम मातृवंशीय भी हो सकता है और पितृवंशी भी। भारत में खासी, गारो तथा नायर आदि जनजातियों में वंश नाम माता के नाम पर जबकि अन्य जनजातियों और हिंदुओं में अधिकतर पिता के नाम पर चलते हैं। 


12. सामान्य निवास स्थान (Common Habitation)- प्रत्येक परिवार के लिए एक सामान्य निवास स्थान या घर भी होता है। जहां सभी सदस्य रहते हैं। यह निवास मातृस्थानिक भी हो सकता है जैसे नैयर, खासी, गारो और पितृस्थानिक भी जैसे हिंदू धर्म, मुस्लिम धर्म कभी-कभी ऐसा भी होता है कि पति-पत्नी में से कोई भी एक दूसरे कोई परिवार में ना जा कर जाकर अपना नया निवास बना कर रहने लगते हैं। डॉ एस सी दुबे ने ऐसे परिवारों को नव-स्थानिक (Neolocal Family) कहा है। आजकल भारत में ऐसे परिवारों के उदाहरण आसानी से देखने को मिल सकते हैं।