मैक्स वेबर के आदर्श प्रारूप की विशेषताएँ - Characteristics of Max Weber's Ideal Format

मैक्स वेबर के आदर्श प्रारूप की विशेषताएँ - Characteristics of Max Weber's Ideal Format


आदर्श प्रारूप का निर्माण समाजशास्त्री कुछ वास्तविक तथ्यों के आधार पर तर्कसंगत रूप से करता है इसका निर्माण अध्ययन के लिए उपकल्पना की रचना हेतु किया जाता है इसका अर्थ यह है कि वास्तविक जीवन में जो तत्व पाए जाते हैं उनमें से विचारपूर्वक कुछ तथ्यों का चयन किया जाए और उन्हें अध्ययन के लिए एक पैमाना या मापक मान लिया जाए। यद्यपि आदर्श प्रारूप का निर्माण वास्तविकता के आधार पर किया जाता है। फिर भी वास्तविकता के बराबर नहीं होता। वास्तविकता की किन किन विशेषताओं को अनुसंधानकर्ता अपने आदर्श प्रारूप के लिए चुनेगा यह उसी पर निर्भर करता है। इसलिए प्रत्येक अध्ययन कर्ता अपने समस्या के अध्ययन के हिसाब से भिन्न-भिन्न आदर्श प्रारूप बना सकता है।


मैक्स वेबर ने आदर्श प्रारूप का प्रयोग सामान्यता तुलनात्मक अध्ययन के लिए किया है। धर्म के क्षेत्र में मैक्स वेबर के द्वारा दुनिया के जिन छह धर्मों का अध्ययन किया है गया है उसकी विधि आदर्श प्रारूप ही है। मैक्स वेबर के अनुसार हमें केवल उन्हीं आदर्श प्रारूपों का अपने अध्ययन में उपयोग करना चाहिए जो नियंत्रित, शंकारहित एवं प्रयोग सिद्ध हो। इस आधार पर वेबर में आदर्श प्रारूपों की निम्न विशेषताओं का उल्लेख किया है 


1. वैज्ञानिक दृष्टि से जो अनुसंधानकर्ता के द्वारा जो अर्थ क्रिया का लगाया जाता है। उसी अर्थ के अनुसार आदर्श प्रारूप का निर्माण किया जाना चाहिए।


2. आदर्श प्रारूप में केवल तर्कसंगत एवं महत्वपूर्ण तथ्यों को ही शामिल किया जाता है क्योंकि आदर्श प्रारूप सब कुछ का वर्णन नहीं है।


3. आदर्श प्रारूप स्वयं लक्ष्य या साधन नहीं है बल्कि ठोस ऐतिहासिक तथ्यों के विश्लेषण में सहायक यंत्र या उपकरण मात्र है अतः आदर्श प्रारूपों का निर्माण कर लेना ही समस्या का लक्ष्य नहीं है समाजशास्त्र का लक्ष्य उससे कहीं अधिक है।


उपरोक्त विशेषताओं के अतिरिक्त आदर्श प्रारूप के निम्नलिखित लक्षण बताए जाते हैं।


1. आदर्श प्रारूप में जो कुछ है उसका वास्तविक जीवन में होना आवश्यक नहीं है।


मैक्स वेबर का कहना है कि आदर्श प्रारूप के अंतर्गत जिन विशेषताओं को रखा गया है जरूरी नहीं है कि वह सारे लक्षण सामाजिक घटनाओं में वैसे ही मिले। हो सकता है कि आदर्श प्रारूप के कुछ लक्षण वास्तविक घटना में मिले और कुछ नहीं भी मिले। वेबर ने उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि पूंजीवाद के आदर्श प्रारूप में हम कुछ विशेषताओं को सम्मिलित करते हैं लेकिन जब हम पूंजीवाद को अमेरिका या भारत के संदर्भ में देखते हैं तो हमें इसमें आदर्श प्रारूप की ये विशेषताएँ नहीं दिखाई देती ।

मैक्स वेबर ने आदर्श प्रारूप को यथार्थ से भिन्न इसलिए किया है क्योंकि संपूर्ण यथार्थ को समझना समाजशास्त्री के लिए संभव नहीं है समाजशास्त्री समय और स्थान के हिसाब से समाज के विशिष्ट भागों को देखता है और उसी के अनुसार आदर्श प्रारूपों का निर्माण करता है। 


2. आदर्श प्रारूप का संबंध नैतिक रुप से किसी आदर्श से नहीं होता 


सामान्य बोलचाल की भाषा में आदर्श का अर्थ अनुकरण करने योग्य होता है उदाहरण के तौर पर यदि हम यह कहें कि राम एक आदर्श पुरुष थे तो हमारा तात्पर्य यह है कि वह हमारे लिए अनुकरणीय थे परंतु समाजशास्त्र में आदर्श प्रारूप के अंतर्गत इस तरह की कोई अनुकरणीय बात नहीं होती यहां पर आदर्श से मतलब किसी भी तर्क के अंतिम छोर से होता है। 


3. आदर्श प्रारूप में मूल्य नहीं होते


मैक्स वेबर आदर्श प्रारूप को इसीलिए आदर्श कहते हैं क्योंकि इसमें अनुसंधानकर्ता के मूल्य उपस्थित नहीं होते। उदाहरण के लिए जब हम हिंदू धर्म के अध्ययन के लिए आदर्श प्रारूप का निर्माण करते हैं तो यह केवल एक सांस्कृतिक संस्था का अध्ययन मात्र है। अनुसंधानकर्ता जब किसी धर्म का अध्ययन करता है या वह उसकी अच्छाई या बुराइयों की बात करता है और धर्म में क्या होना चाहिए और क्या नहीं ऐसे मूल्यों का समावेश आदर्श प्रारूप में नहीं होता।


4. प्रारूप उपकल्पनात्मक होता है


लेविस कोजर ने आदर्श प्रारूप की एक प्रमुख विशेषता इस ग्रुप कल्पनात्मक प्रवृत्ति को बताया है उनके अनुसार आदर्श प्रारूप वास्तविकता या यथार्थ नहीं होते हैं। अनुसंधानकर्ता अपनी परिस्थिति के आधार पर उपकल्पनाओं का निर्माण करते हैं, कोजर ने कहा है कि आदर्श प्रारूप का संबंध उन स्थितियों से होता है जो अध्ययन की जाने वाली घटनाओं को प्रकट करती हैं। हो सकता है कि आदर्श प्रारूप द्वारा दी गई उपकल्पनाओं का संबंध उन परिणामों से हो जो की घटनाओं के कारण पैदा होते हैं। जूलियन फ्रेंड ने आदर्श प्रारूप की मीमांसा में कहा है यद्यपि आदर्श प्रारूप यथार्थ नहीं होते हैं फिर भी यह हमें एक ऐसी अवधारणात्मक युक्ति को देता है जिसकी सहायता से हम अनुभाविक यथार्थ के विकास को समझ सकते हैं और इसका विश्लेषण कर सकते हैं।"

5. आदर्श प्रारूप एक विवेक की ब्लूप्रिंट है।


आदर्श प्रारूप का मुख्य आधार विवेक होता है जिस समस्या से जुड़े हुए क्षेत्र पर आदर्श प्रारूप बनाया जाता है। दुनिया में निरंतर उतार-चढ़ाव आने के कारण उसका यथार्थ बदलता रहता है। आदर्श प्रारूप में उतार-चढ़ाव का कोई समावेश नहीं होता है आदर्श प्रारूप तो विवेक कार्यकारण पर बनता है जबकि यथार्थ बराबर बदलता रहता है।


6. आदर्श प्रारूप का संबंध विज्ञान की अवधारणा से जुड़ा हुआ है


आदर्श प्रारूप कितना उपयोगी होगा इसका संबंध विज्ञान की अवधारणा से जुड़ा रहता है यदि विज्ञान का उद्देश्य कभी समाप्त नहीं होने वाले अनुसंधान से है तो इसका अर्थ यह है कि अनुसंधानकर्ता जिन अवधारणाओं का उपयोग करता है वह अवधारणाएं भी निरंतर रूप से पीछे छूट जाती हैं लेकिन विज्ञान के चरण में तभी आगे बढ़ते हैं जब उसकी अवधारणाएं पीछे रह जाती हैं विज्ञान के द्वारा नई अवधारणा का सूत्रपात विज्ञान की गति को तेज करता है इस तरह हम निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि यदि हमें विज्ञान को आगे बढ़ाना है तो हमारे लिए आवश्यक है कि हम उपयुक्त आदर्श प्रारूप में भी अनिवार्य रूप से बदलाव लाएं।


7. आदर्श प्रारूप का आधार मूल्य विस्थापन होता है


आदर्श प्रारूप अपनी केंद्रीय रूप में मूल्य विस्थापन से जुड़ा रहता है जिसे हम समष्टि कहते हैं इस समष्टि में विविधता होती है ऐसी स्थिति में कोई भी अनुसंधानकर्ता कभी भी संपूर्ण समष्टि के यथार्थ को नहीं जान पाता है इसलिए हमारा यथार्थ शब्द से संबंधित ज्ञान आंशिक होता है जब कभी भी कोई अनुसंधानकर्ता आदर्श प्रारूप का निर्माण करता है तो उसका समाज की वस्तु और विचारों के बारे में जो भी मूल्य विस्थापन है वह आदर्श प्रारूप में अवश्य सम्मिलित होता है। 


8. आदर्श प्रारूप न तो सत्य होता है और न झूठ 


आदर्श प्रारूप का निर्माण किसी अस्पष्टता के शोध प्रणाली के माध्यम से विषय वस्तु का अध्ययन करने के लिए किया जाता है जिससे हम उसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकें। मैक्स वेबर ने कहीं पर भी यह स्पष्ट नहीं किया है कि आदर्श प्रारूप के लक्ष्य ज्ञान बोध से जुड़े होते हैं और ना ही उन्होंने कही यह स्पष्ट किया है कि आदर्श प्रारूप किसी एक विवेक पूर्ण व्यवस्था को बनाते हैं। जुलियेन फ्रेंड का कहना है कि “आदर्श प्रारूप एक प्रकार की विशुद्ध प्रयोगात्मक विधि है जिसका निर्माण समाज वैज्ञानिक अपने ढंग से करता है इसका निर्माण केवल खोज करना होता है यदि कोई आदर्श प्रारूप समाज के वैज्ञानिक अनुसंधान के लिये कारगर सिद्ध नहीं होता तो वह बिना हिचक के उसे फेंक देता है।"


 9. आदर्श प्रारूप की सही भूमिका बोधगम्यता को बढ़ाना है


सामान्यतः सामाजिक घटनाओं के अध्ययन के बारे में हमारी जानकारी बहुत अधिक स्पष्ट और विस्तृत नहीं होती है ऐसी स्थिति में घटनाओं के अध्ययन करने के लिए हम तार्किक आधार पर प्रघटनाओं के बारे में आदर्श प्रारूपों का निर्माण करते हैं जिससे कि घटना और प्रघटनाओं से संबंधित हमारी बोधगम्यता में वृद्धि होती है। 


10. एक ही घटना के अध्ययन के लिए विभिन्न आदर्श प्रारूपों का निर्माण किया जा सकता है


सामाजिक अनुसंधान में वैज्ञानिक अनुसंधान कर्ता का अंतिम लक्ष्य होता है कि वह घटना के संबंध में संपूर्ण पहलुओं का अध्ययन करें जिससे कि वह हर सामाजिक घटना को समझ सके। जब अनुसंधानकर्ता किसी भी सामाजिक घटना को समझने का प्रयास करता है तो वह उसके लिए आदर्श प्रारूप का निर्माण करता है। इसमें अनुसंधानकर्ता को यह स्वतंत्रता होती है कि वह अपने अध्ययन के अनुरूप अनेक आदर्श प्रारूपों का निर्माण कर सकता है अर्थात वास्तविकता यह है कि अनुसंधानकर्ता किसी भी घटना के बारे में जितने विचार रखता है उतने ही आदर्श प्रारूपों का निर्माण कर सकता है। 11. आदर्श प्रारूप घटना की स्पष्ट अभिव्यक्ति का साधन है।


आदर्श प्रारूप घटना की स्पष्ट अभिव्यक्ति का साधन होते हैं अनेक समाजशास्त्री और इतिहासकार ऐसे भी है जो आदर्श प्रारूप का केवल इसलिए विरोध करते रहे हैं कि आदर्श प्रारूप में यथार्थता नहीं होती है और यह केवल कल्पनाओं का गठबंधन होता है। इस सबके बाद भी यदि हम आदर्श पर मैक्स वेबर के आदर्श प्रारूपों का अध्ययन करते हैं तो यदि हम समाजशास्त्र को एक विज्ञान मानते हैं तो यह आवश्यक है कि हम इसकी अध्ययन विधियों को भी वैज्ञानिक तरीके से करें इसलिए आदर्श प्रारूप को घटना की स्पष्ट अभिव्यक्ति का साधन माना जाता है। हम पाते हैं कि मैक्स वेबर ने नौकरशाही के बारे में जो कुछ भी लिखा था वह केवल आदर्श प्रारूप थे और मैक्स वेबर की मृत्यु के बाद भी आज भी उन्हें पढ़ा जा रहा है यदि हम


समाजशास्त्र को एक विज्ञान मानते हैं तो यह आवश्यक है कि इसकी अध्ययन विधियों भी वैज्ञानिक हो।