प्रत्यक्षवाद की विशेषताएं - Characteristics of Positivism
प्रत्यक्षवाद की विशेषताएं - Characteristics of Positivism
रॉलिंन चैम्बलिस ने प्रत्यक्षवाद की विशेषताओं की चर्चा करते हुए अपनी पुस्तक सोशल ‘Social Thought' में लिखा है “कॉम्ट ने यह स्वीकार किया था कि प्रत्यक्षवाद अनीश्वरवादी है क्योंकि यह किसी भी रूप में अलौकिकता से संबंधित नहीं है। उनका यह भी दावा था कि प्रत्यक्षवाद भाग्यवादी नहीं है क्योंकि वह यह स्वीकार करता है कि बाहरी अवस्था में परिवर्तन हो सकता है। यह आशावादी भी नहीं है क्योकि इसमें आशावाद के आध्यात्मिक आधार का आभाव है। यह भौतिकवादी भी नहीं है क्योंकि यह भौतिक शक्तियों को बौद्धिक शक्ति के अधीन करता है। प्रत्यक्षवाद का संबंध वास्तविकता से है, काल्पनिकता से नहीं, उपयोगी ज्ञान से है न की समस्त ज्ञान से। इसका संबंध यथार्थ ज्ञान से है न की समस्त ज्ञान से। इसका संबंध उन निश्चित तथ्यों से है जिनका की पूर्व ज्ञान संभव है।"
प्रत्यक्षवाद की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं।
1. सामाजिक घटनाओं के लिए निश्चित नियम (Certain Law for Social Phenomen)
प्रत्यक्षवाद के अनुसार समाज में घटने वाली प्रत्येक घटना के पीछे कुछ निश्चित नियम होते हैं। सामाजिक घटनाएं कभी भी आकस्मिक नहीं होती है। सामाजिक घटनाओं में परिवर्तन भी कुछ नियमों के अनुसार ही होते हैं। प्राकृतिक घटनाएं, दिन एवं रात, ऋतु का बदलना, बाढ़, भूकंप एवं सूखा नियमों पर आधारित है। जिसके कारणों का पता लगाया जा सकता है और इसके लिए हम वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करते हैं। सामाजिक घटनाओं के अध्ययन के लिए भी हम वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करते हैं। इसलिए अगस्त कॉम्ट प्रत्यक्षवाद को कुछ नियमों द्वारा संचालित मानते हैं।
2. वैज्ञानिक पद्धति (Scientific Method)
प्रत्यक्षवाद की प्रकृति वैज्ञानिक है। यह इसकी मौलिक विशेषता है। इसमें कल्पना और भावनाओं का कोई स्थान नहीं रहता। इसमें किसी भी सामाजिक समस्या का अध्ययन वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा किया जा सकता है।
इसे हम इस तरह से समझ सकते हैं कि हमारे सामने संपूर्ण ब्रह्मांड है और इस ब्रह्मांड का संचालन कुछ नियमों के अधीन होता है। ब्रह्मांड का संचालन जिन नियमों के अधीन होता है, उसमें दो विशेषताएं पाई जाती हैं
1. ये नियम प्राकृतिक होते हैं
2. ये नियम अपरिवर्तनीय होते हैं
कॉम्ट का कहना है कि इन नियमों का ज्ञान धार्मिक आध्यात्मिक आधार पर न होकर वैज्ञानिक आधार पर होता है। इसलिए इसके अंतर्गत दो तत्वों को सम्मिलित किया है
1. अवलोकन
2. वर्गीकरण
कॉम्ट का कहना है कि वैज्ञानिक पद्धति के माध्यम से सामाजिक घटना का भी ज्ञान हो सकता है। क्योंकि सामाजिक घटना भी प्रकृति का ही एक अंग है। घटनाओं के अध्ययन के लिए अनुभव, अवलोकन एवं वर्गीकरण ही पर्याप्त है। उन घटनाओं को प्रभावित करने वाले कारणों की खोज की आवश्यकता नहीं है।
क्योंकि घटनाओं के कारणों की यथार्थ खोज असंभव है। प्रत्यक्षवाद का उद्देश घटनाओं एवं तथ्यों का यथास्थिति यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि प्रत्यक्षवाद की प्रथम मान्यता यह है कि इसके द्वारा सामाजिक घटनाओं के क्रम को यथार्थ रूप से समझा जा सके। इस प्रकार सामाजिक घटनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करके सामाजिक नियमों का निर्माण भी किया जा सकता है।
3. अध्ययन का वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Attitude of Study)
प्रत्यक्षवाद में हम हर घटना का अध्ययन वैज्ञानिक पद्धति यानी निरीक्षण, परीक्षण एवं वर्गीकरण के द्वारा करते हैं। सामान्यतः समाज में जब कोई दुर्घटना होती है या कोई जन-धन की हानि होती है तो उसे धर्मवादी ईश्वर की इच्छा मानकर अस्वीकार करता है। तत्वज्ञानी उससे तार्किक आधार पर समझने की कोशिश करते हैं और उसकी व्याख्या करते हैं। जबकि प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से घटनाओं को समझ कर निष्कर्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं।
4. वास्तविक ज्ञान (Real Knowledge)
प्रत्यक्षवाद किसी भी प्रकार के निरपेक्ष विचार को स्वीकार नहीं करता है। क्योंकि कॉम्ट ने प्रत्यक्षवाद की विवेचना वास्तविक ज्ञान के आधार पर की है
काल्पनिक आधार पर नहीं। प्रत्यक्षवाद विशुद्ध वैज्ञानिक चिंतन है। जिसमें यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने पर जोर दिया जाता है और तथ्य की खोज निरीक्षण एवं परीक्षण के द्वारा की जाती है।
5. ज्ञान से संबंधित (Concernned with Knowledge)
प्रत्यक्षवाद में अज्ञात शक्तियों को सम्मिलित नहीं किया जाता। इसमें घटनाओं के क्रियान्वयन के नियमों को ढूंढा जाता है। इसमें हम केवल उन्हीं घटनाओं का अध्ययन करते हैं जिन्हें हम प्रत्यक्ष रुप से देख सकते हैं। 6. धर्म एवं विज्ञान (Religion and Science)
कॉम्ट के अनुसार प्रत्यक्षवाद धर्म और विज्ञान दोनों का सम्मिश्रण है। यह विज्ञान को विकास का साधन मानता है। साध्य नहीं। कॉम्ट प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक सिद्धांत के द्वारा समाज की उन्नति का लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है। प्रत्यक्षवाद में धर्म और विज्ञान दोनों का समन्वय है।
7. सामाजिक पुनर्निर्माण का आधार (Basis of Social Reconstruction)
अगस्त कॉम्ट ने प्रत्यक्षवाद के आधार पर एक ऐसी व्यावहारिक योजना प्रस्तुत करने का प्रयास किया है जो समाज में भौतिक, नैतिक एवं बौद्धिक प्रगति को बढ़ाती है।
वह सामाजिक पुनर्निर्माण के माध्यम से ऐसी कल्पना का निर्माण करना चाहते हैं, जहां भय, असुरक्षा, स्वार्थ, ईष्या एवं जलन जैसी भावनाएं तथा अन्य विघटनकारी तत्व न हो। वे सामाजिक घटनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन कर समाज को एक नई व्यवस्था प्रदान करना चाहते थे। उनके सामाजिक पुनर्निर्माण का आधार प्रत्यक्षवाद था। सामाजिक पुनर्निर्माण की यह योजना सामाजिक संगठन के लिए अद्वितीय है।
8. भविष्यवाणी करने वाला विज्ञान (Predictive Science)
कॉम्ट का कहना है कि प्रत्यक्षवाद की सहायता से समाजशास्त्र को एक ऐसा विज्ञान बनाया जा सकता है जो भविष्यवाणी करने में भी समर्थ होगा। समाजशास्त्र के अंतर्गत समाज की घटनाओं का अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है
1. भूत कालीन घटनाओं का अध्ययन
2. वर्तमान कालीन घटनाओं का अध्ययन
भूत कालीन घटनाओं का अध्ययन करके इन घटनाओं के साथ वर्तमान का संबंध स्थापित किया जा सकता है और भविष्य के संबंध में निष्कर्ष भी निकाले जा सकते हैं।
कॉम्ट का कहना है कि यदि हम वर्तमान कालीन घटनाओं का अध्ययन प्रत्यक्षवाद की सहायता से करें तो भविष्य की घटनाओं के बारे में भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं। इस प्रकार समाजशास्त्र ऐसा विज्ञान है जो भविष्यवाणी करने में समर्थ है।
9. जन राज्य की स्थापना (Formulation of Common Wealth)
कॉम्ट के प्रत्यक्षवाद के सिद्धांत के प्रतिपादन का उद्देश्य यूरोप में एक जन राज्य की स्थापना करना था। इसकी सहायता से वह यूरोपीय देशों के बीच होने वाले युद्ध को समाप्त करके शांति और व्यवस्था की स्थापना करना चाहते थे। उनका कहना था कि कभी भी जोर जबरदस्ती से कल्याणकारी राज्य की स्थापना संभव नहीं है। इसके लिए शांति के तरीके अधिक उपयुक्त हैं। उसने कल्याणकारी राज्य की स्थापना को कार्य विधि के स्थापना की कार्य विधि के अंतर्गत दो तत्वों को सम्मिलित किया
1. प्रदर्शन ( Demonstration )
2. अनुनय (Persuation )
1. प्रदर्शन ( Demonstration) कुछ देश शांति और व्यवस्था स्थापित करके दूसरे देशों के लिए प्रदर्शन का कार्य करें। ऐसा करने से अधिक से अधिक राष्ट्र इस व्यवस्था की ओर अग्रसर होंगे।
2. अनुनय ( Persuation) दूसरा तरीका अनुनय विनय का है। इसमें समझा बुझाकर इससे होने वाले लाभों से अवगत कराकर कल्याणकारी राज्य की स्थापना की जा सकती है।
इस तरह के राज्य की स्थापना में जो तत्व सहायक हो सकते हैं उन्हें तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है -
1. सिद्धांत कल्याणकारी राज्य की स्थापना का पहला तत्व सिद्धांत है। जब तक हमारे सामने किसी भी प्रकार का सिद्धांत नहीं होगा हमारे कार्य की सफलता में संदेह होगा। कॉम्ट ने कहा है कि कल्याणकारी राज्य की स्थापना का प्रमुख सिद्धांत है, प्रेम और इसमें मानवता के प्रति प्रेम सम्मिलित है।
2. आधार कल्याणकारी राज्य की स्थापना का दूसरा प्रमुख तत्व आधार हैं। जीवन और संसार में प्रत्येक का आधार ही नहीं होते हैं मौलिक प्रश्न यह है कि जब हम कल्याणकारी राज्य की स्थापना की बात कर रहे हैं तो उसका आधार क्या होगा? कॉम्ट के अनुसार व्यवस्था के माध्यम से यूरोपीय देशों में कल्याणकारी राज्य की स्थापना हो सकती है। कॉम्ट का व्यवस्था से सीधा संबंध सामाजिक व्यवस्था से था।
3. उद्देश्य प्रत्येक कार्य का कोई न कोई निश्चित उद्देश्य होता है और कल्याणकारी राज्य की स्थापना का उद्देश्य प्रगति करना है। यहां पर प्रगति का अर्थ दूसरों के लिए जियो से है।
कॉम्ट के इस सिद्धांत को गणितीय आधार पर भी इस प्रकार समझाया जा सकता है
A. सिद्धांत = प्रेम = मानवता से प्रेम
B. आधार = व्यवस्था = सामाजिक व्यवस्था
C. उद्देश्य = प्रगति = दूसरों के लिए जियो
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