सामाजिक तथ्यों की विशेषताएं - Characteristics of Social Fact
सामाजिक तथ्यों की विशेषताएं - Characteristics of Social Fact
सामाजिक तथ्य व्यक्ति के कार्य करने सोचने तथा अनुभव करने के तरीके हैं। जिनमें व्यक्तिगत चेतना से बाहर भी अस्तित्व को बनाए रखने की उल्लेखनीय विशेषता होती है। समाज विज्ञान सामाजिक तथ्यों का एक विधिवत अध्ययन है। सामाजिक तथ्यों के निर्धारण से इसकी विषय-वस्तु निर्धारित होती है, क्योंकि किसी भी सामाजिक घटना पर विचार करते समय हम उस घटना के साथ विचारों का मिश्रण करके उस पर विचार व्यक्त करते हैं। हम सामाजिक घटना में से मनोवैज्ञानिक तथ्यों को बाहर निकाल देते हैं और जो शेष बचता है वहीं सामाजिक तथ्य कहलाते हैं।
दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों की स्पष्ट व्याख्या करने के लिए सामाजिक तथ्यों की विशेषताओं को स्पष्ट किया है.
यदि हम संपूर्ण दुनिया के सामाजिक तथ्यों को देखें तो पता चलता है कि सामाजिक तथ्य अपने निर्णय अनुसार व्यक्तित्व का निर्माण करते रहते हैं। वास्तव में व्यक्ति जो कुछ है, वह सामाजिक तथ्यों अर्थात वह सामाजिक व्यवहार, अभिवृत्तियों एवं सामूहिक विश्वासों का परिणाम है।
बाध्यता (Constraint )
सामाजिक तथ्यों की दूसरी विशेषता उसकी बाध्यता है। सामाजिक तथ्यों का निर्माण अनेक व्यक्तियों के द्वारा होता है। यह व्यक्तिनिष्ठ नहीं होते बल्कि वस्तुनिष्ठ होते हैं और हर तरह से व्यक्ति के लिए बाहरी होते हैं, अत्यंत शक्तिशाली होते हैं इनका व्यक्ति के व्यवहार पर बाध्यता मूलक दबाव पड़ता है। यह बाध्यता व्यक्ति के व्यवहार को समाज के मानक और मूल्यों के अनुरूप बनाने के लिए प्रेरित करती है। त सामाजिक तथ्य व्यक्ति के व्यवहार को ही नहीं बल्कि उसके सोचने, विचारने आदि तरीकों को भी प्रभावित करती है। समाज में प्रचलित अनेक सामाजिक तथ्य जैसे नैतिक नियम, धार्मिक विश्वास, अर्थव्यवस्थाएं सभी मनुष्य के व्यवहार व तरीकों को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। के
इस तरह इनका पालन व्यक्ति के लिए बाध्यता मूलक होता है। इनकी उत्पत्ति व्यक्तिगत चेतना से नहीं होती है बल्कि यह सामूहिक चेतना का परिणाम होते हैं। इसलिए यह व्यक्ति पर दबावकारी होते हैं।
यह व्यक्ति से बाहर की वस्तु होने के कारण व्यक्ति के उपर एक विशिष्ट प्रकार के व्यवहार के लिए दबाव डालते हैं। सामाजिक तथ्यों के पीछे हमेशा समूह एवं समाज की शक्ति होती है, इसलिए इस शक्ति के दबाव एवं प्रभाव के कारण व्यक्ति हमेशा उसी प्रकार का आचरण करता है जैसा कि उसे समाज या समूह निर्देश देता है। सामाजिक दबाव एवं शक्ति के कारण बाहर की वस्तु व्यक्ति से श्रेष्ठ होती है। इसलिए हमेशा व्यक्ति उसके सामने झुकता है। समाज के नियमों और आदेशों को स्वीकार करता है। समाज में पाई जाने वाली इस शक्ति का पता हमें अपने प्रतिदिन के सामान्य जीवन एवं सामान्य स्थिति में नहीं चल पाता है। इसका आभास हमें तब होता है जब हम विरोध करते हैं, उसे स्वीकार नहीं करते या उसका उल्लंघन करते हैं, ऐसी स्थिति में समाज रोष प्रकट करता है, दंड की व्यवस्था करता है और दंड ही सामाजिक तथ्यों के विरोध का फल है।
दुर्खीम के अनुसार सामाजिक तथ्य सामूहिक चेतना की श्रेणी में आते हैं। सामूहिक चेतना व्यक्तिगत चेतना का सर्वोत्कृष्ट रूप है। क्योंकि सामूहिक चेतना व्यक्तिगत चेतनाओं के अस्तित्व और विशेषताओं की समष्टि चेतना है। यह चेतनाओं की चेतना है।
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