टोटमवाद की विशेषताएं - Characteristics of Totemism

 टोटमवाद की विशेषताएं - Characteristics of Totemism


1. टोटम के साथ गोत्र के लोग अपना गूंढ़, पवित्र तथा अलौकिक संबंध मानते हैं।


2. टोटम शक्ति का प्रतीक है, यह समूह की रक्षा करती है। 


3. टोटम व्यक्ति को अपवित्रता से बचने की चेतावनी देता है तथा भावी घटनाओं के विषय में संकेत देता है।


4. गोत्र के सदस्य टोटम को अपना मूल पिता मानते हैं।


5. टोटम के प्रति हमेशा भय, श्रद्धा और भक्ति की भावना रखी जाती है।


6. टोटम को खाना, मारना और हानि पहुंचाना वर्जित होता हैं। टोटम से संबंधित प्रत्येक वस्तु को पवित्र माना जाता है।


7. टोटम के संबंध में जो निषेध होते हैं उनका कड़ाई से पालन किया जाता है और इसका उल्लंघन करने वाले को दंड की व्यवस्था होती है।


8. टोटम सर्वशक्ति संपन्न रहस्यमय शक्ति समझी जाती है जो समूह के संपूर्ण जीवन को नियंत्रित एवं निर्देशित करती है।


9. गोत्र के सदस्य विश्वास करते हैं कि टोटम संकट के समय उनकी रक्षा करता है।


10. टोटम के प्रति लोगों में आदर की भावना पाई जाती है। उसकी मृत्यु पर शोक प्रकट किया जाता है।


11. टोटम संबंधी नियमों का उल्लंघन करने वालों की सामाजिक निंदा की जाती है और नियमों का पालन करने वालों को सम्मान दिया जाता है।


12. टोटम सामूहिक प्रतिनिधित्व का प्रतीक है। यह एक गोत्र के सदस्यों को नैतिक बंधन में बांधता है।


टोटमवाद के प्रचलित विश्वासों के बाद दुखम इन विश्वासों की उत्पत्ति पर भी प्रकाश डालते हैं। दुर्खीम टोटमवाद को धर्म की उत्पत्ति का आधार एवं सामूहिक प्रतिनिधित्व का प्रतीक मानते हैं। दुर्खीम का कहना है कि धार्मिक विचारों की उत्पत्ति सामूहिक एकीकरण के संवेगात्मक अवसर पर होती है।

वे मानते हैं कि समस्त सामाजिक तथ्यों का उद्गम मनुष्यों का पारस्परिक संपर्क है। दुर्खीम ने ऑस्ट्रेलिया की आदिम जनजाति अरुण्टा मे मनाए जाने वाले कारोबारी उत्सव के आधार पर सामूहिक एकत्रीकरण द्वारा धार्मिक विचारों की उत्पत्ति को स्पष्ट किया है।


दुर्खीम का कहना है कि कारोबारी के अवसर पर मनुष्य बहुत आनंदित होता है और वह अपने पर नियंत्रण नहीं रख पाता। यदि कोई दुखद बात होती है तो वह पागलों की भांति चिल्लाते हैं और चक्कर काटते हैं। दुर्खीम ने आदिवासियों के उत्सव और सामूहिक मिलन के अवसर पर होने वाले इन क्रियाकलापों का बहुत ही सुंदर चित्रण प्रस्तुत किया है। सामूहिक एकत्रीकरण अपने आप में एक शक्तिशाली उत्तेजना होती है, जब व्यक्ति समूह में एक दूसरे के निकट आते हैं तो एक बिजली सी उत्पन्न होती है जो उन्हें आनंद के आकाश में उड़ा ले जाती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति की सुझाव ग्रहणशीलता बढ़ जाती है। संवेग की तीव्रता में चारों ओर अनियंत्रित हाव-भाव शोर शराबा और चीख-पुकार की दुनिया सक्रिय रहती है। पर इस तरह की सामूहिक भावना सामूहिक क्रियाओं को जन्म देती है। इस अवसर पर व्यक्ति अपने स्वयं के व्यक्तित्व को भूल जाता है और उसे ऐसा अनुभव होता है जैसे कोई नवीन प्राणी है और एक अजीब संसार में भ्रमण कर रहा है। इस तरह एक अजीब और पृथक संसार के क्रियाकलापों में ही धार्मिक विश्वासों और विचारों का जन्म होता हैं। दुखम के ही शब्दों में “अतः यह प्रतीत होता है की इन उद्वेलित सामाजिक परिस्थितियों के बीच और स्वयं इस उफान में से धार्मिक विचार जन्म लेता हैं।”