कॉम्ट के समालोचना , आलोचना - Comte's critique, critique

 कॉम्ट के समालोचना , आलोचना - Comte's critique, critique


कॉम्ट के तीन स्तरों के नियमों का अध्ययन करने से स्पष्ट है कि उन्होंने ऐतिहासिक आधार पर मानव चिंतन की अवस्थाओं को सामाजिक प्रगति के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास किया है। कॉम्ट का मत है कि मानव मस्तिष्क के विकास के स्तर क्रमानुसार एक के बाद एक आते हैं पर किसी भी नई व्यवस्था का जन्म उस समय तक संभव नहीं था जब तक की पुरानी समाप्त न हो जाए। कॉम्ट मानते हैं कि यह जरूरी नहीं है कि तीनों स्तरों का अस्तित्व अलग-अलग पाया जाए और यह भी आवश्यक नहीं है कि यह स्तर एक के बाद एक निश्चित क्रम अनुसार ही आए। यह तीनों ही स्तर व्यक्ति के मस्तिष्क में एक साथ उपस्थित हो सकते हैं।

आगस्त कॉम्ट कहते हैं अपने सभी विज्ञानों के सर्वेक्षण में मैंने इस तथ्य को ध्यान में रखने का प्रयास किया है

कि तीनों स्तर धार्मिक, दार्शनिक तथा वैज्ञानिक विभिन्न विज्ञानों में एक ही समय में एक ही मस्तिष्क में रह सकते हैं और रहते हैं।” यद्यपि व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो व्यक्ति का जीवन पूर्ण रूप से वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं चल सकता।

सभी व्यक्ति के जीवन में तर्क कल्पना एवं भावना का स्थान महत्वपूर्ण होता है। स्वयं कॉम्ट भी अपने आपको विज्ञानवाद के स्तर पर स्थिर नहीं रख पाए थे। उनके इस सिद्धांत की अनेक समाजशास्त्रियों ने आलोचना की है।


आलोचना


1. स्पेंसर का मत है कि है कि “ये चिंतन के तीन स्तर नहीं है वरन ये तो चिंतन योग्यता का धरातल है।"


2. लेविस कोजर और जोनाथन टरनर के अनुसार कॉम्ट का तीन स्तरों का नियम मानसिक या आदर्शात्मक है। यह सिद्धांत मानसिक प्रगति की व्याख्या करता है जिसमें तर्क कम भावना अधिक है।


3. सी.ई. वाघन के अनुसार कॉम्ट का तीन स्तरों का नियम नकारात्मक और विघटनकारी चिंतन पर के आधारित है।


4. जॉन फिस्क लिखते हैं ये तीन स्तर समस्या तक पहुंचने की तीन पद्धतियां है। कुछ घटनाओं की व्याख्या धर्म शास्त्रीय दृष्टिकोण से कुछ की तत्व दार्शनिक दृष्टिकोण से और अन्य की वैज्ञानिक दृष्टिकोण से की गई है।


5. जे. एस. मिल का कहना है की सामाजिक पुनर्निर्माण की व्याख्या में कॉम्ट वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं रख सके हैं।

6. तिमासेफ के अनुसार कॉम्ट के इस नियम का क्रम असंगत है। आपने बताया कि किसी भी समाज में चिंतन का तात्विक और वैज्ञानिक स्तर विकसित होने पर भी धार्मिक स्तर का प्रभाव बना रहता है। अतः कॉम्ट का यह नियम सत्य नहीं है।

7. इमाइल दुर्खीम के अनुसार इतिहासवाद तथा उद्विकासवाद के आधार पर हम किसी भी सिद्धांत को वैज्ञानिक रूप नहीं दे सकते हैं।


8. थियोडोरएबल के अनुसार कॉम्ट की गत्यात्मकता का प्रमुख आधार मानव विकास का तीन स्तरों का नियम है। यद्यपि यह नियम ऐतिहासिक अधिक और सामाजिक कम है तथा साथ ही मानव जीवन के सामाजिक पहलुओं की अपेक्षा बौद्धिक पहलुओं को अधिक महत्व देता है।


भारतीय साहित्य में प्रसिद्ध तीन शब्द आधिदैविक, आध्यात्मिक, भौतिक, आधिभौतिक इन तीनों शब्दों का प्रयोग अगस्त कॉम्ट ने जियोलाजिकल मेटा फिजिकल तथा पॉजिटिव के लिए किया है। लोकमान्य तिलक ने अपने गीतारहस्य में लिखा है कि यह तीन प्राचीन पद्धतियां कॉम्ट की निकाली हुई नहीं है बल्कि बहुत पुरानी है और यह भारतीय चिंतन की पद्धतिया हैं। अगस्त कॉम्ट इन पद्धतियों को एक ऐतिहासिक क्रम में बांधकर अधिभौतिक को सर्वश्रेष्ठ बतलाया है और यही उसकी नवीनता है।


उपरोक्त आलोचनाओं एवं कमियों के बाद भी कॉम्ट के तीन स्तरों के नियमों को अस्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि स्वयं मानव जीवन इतिहास भी इन्हीं तीनों स्तरों के समान है। प्रत्येक मानव बचपन में काल्पनिक युवावस्था में भावुक और वृद्ध अवस्था में यथार्थवादी होता है। समाज में पहले काल्पनिक भावात्मक एवं बाद में वैज्ञानिक युग में प्रवेश किया। वास्तव में कॉम्ट अपने इस नियम के द्वारा समाजशास्त्री चिंतन का जो मार्ग प्रशस्त किया वह प्रशंसनीय है और समाजशास्त्रीय सिद्धांत के विकास में इस नियम का महत्वपूर्ण स्थान है।