सामाजिक एकता की अवधारणा एवं आलोचना -Concept and Criticism of Social Integration

 सामाजिक एकता की अवधारणा एवं आलोचना -Concept and Criticism of Social Integration


दुर्खीम के द्वारा प्रस्तुत सामाजिक एकता की अवधारणा एवं उसके स्वरूपों की अनेक आलोचना हुई हैं। विभिन्न विद्वानों के द्वारा की गई आलोचनाएं इस प्रकार हैं


1. दुर्खीम का कहना है कि आदिम समाजों में केवल दमनकारी कानूनों की भूमिका होती है। जबकि


वास्तव में ऐसा नहीं होता वहां पर अनेकों प्रायश्चित करने की या क्षति पूर्ति के नियम भी प्रचलित होते हैं। इस आधार पर दुर्खीम की यांत्रिक एकता एवं सावयवी एकता अनुभविक तथ्यों के आधार पर खरी नहीं उतरती। 


2. प्राचीन आदिवासी समाजों में या अल्पविकसित समाजों में व्यक्ति और समाज के बीच के संबंधों को मशीन के समान मानना यथार्थता से परे है।


3. आधुनिक विकसित समाजों में जहां पारस्परिक आत्मनिर्भरता बढ़ती है वहां पर परस्पर मतभेद और विवाद के अवसर भी बढ़ते हैं। आधुनिक समाजों में समूह के बीच में प्रतिस्पर्धा और संघर्ष बढ़ जाते हैं।


4. दुर्खीम का कहना है कि उन्नत समाजों में दमनकारी कानून की भूमिका नगण्य है यह गलत है क्योंकि आज के औद्योगिक समाजों में दमनकारी कानून की सामाजिक नियंत्रण में भूमिका निरंतर बढ़ती जा रही है।


5. दुर्खीम ने उन दशाओं और शक्तियों का वर्णन भी नहीं किया जो सावयवी एकता को एक बार स्थापित हो जाने के बाद बनाए रखेंगी।


दुर्खीम ने अपने सिद्धांत के प्रतिपादन के बाद स्वयं इस बात को स्वीकार किया है कि आधुनिक समाज में बड़ी तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं और इस परिवर्तन के कारण समाज में एकता के स्थान पर विघटन की शक्तियां अधिक क्रियाशील दिखाई देती हैं। यही कारण है कि दुर्खीम के द्वारा अपनी बात की रचनाओं में इन अवधारणाओं का प्रयोग कहीं नहीं किया गया है।