सामाजिक व्यवस्था की अवधारणा - Concepts of Social Organization

 सामाजिक व्यवस्था की अवधारणा - Concepts of Social Organization


समाजशास्त्रीय अध्ययन में सामाजिक व्यवस्था की अवधारणा का एक महत्वपूर्ण स्थान है। मानव जीवन के प्रारंभ से ही समाज मनुष्य के साथ जुड़ा हुआ है और शायद कभी ऐसा समय नहीं आएगा जब मानव और समाज एक दूसरे से अलग होंगे मानव और समाज के इस स्थायित्व एवं निरंतरता का मुख्य कारण है। सामाजिक संगठन और व्यवस्था समाज की विभिन्न अंग एवं इकाइयां होती हैं लेकिन इनमें से कोई भी पृथक या अलग रह कर कार्य नहीं करती। इन इकाइयों एवं अंगों के बीच हमेशा समन्वय और व्यवस्था देखने को मिलती है। इसलिए समाज अपना अस्तित्व बनाए रखे हुए हैं। सामाजिक व्यवस्था के अर्थ को समझने से पहले आवश्यक है कि हम व्यवस्था के अर्थ को समझें।


 व्यवस्था का अर्थ (Meaning of Organization)


व्यवस्था का तात्पर्य एक संरचना के अंतर्गत एकाधिक निर्माणक इकाइयों या तत्वों की उस निश्चित प्रतिमानात्मक संबद्धता से है जो कि एक प्रकार्यात्मक संबंध के आधार पर इन इकाइयों को एक सूत्र में बांधती है तथा उन्हें क्रियाशील और गतिशील करती हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि व्यवस्था एक गतिशील एवं परिवर्तनशील अवधारणा है।


व्यवस्था की विशेषताएं (Characteristics of Organization)


 1. व्यवस्था की अवधारणा एक अखंड सत्य नहीं है। व्यवस्था के अंतर्गत एकाधिक तत्व या इकाइयां होती हैं, जो कि सम्मिलित रूप में उस व्यवस्था का निर्माण करती है।


2. एकाधिक तत्वों या इकाइयों के योग मात्र से ही व्यवस्था का निर्माण नहीं होता, जब तक कि इन इकाइयों में नियमितता क्रमबद्धता और संबद्धता न हो।


3. व्यवस्था के अंतर्गत आने वाली विभिन्न निर्माणक इकाइयों के बीच में इस तरह से संबद्धता होना चाहिए जिससे की एक निश्चित प्रतिमान का निर्माण हो।


4. व्यवस्था की निर्माणक इकाइयों के बीच में प्रकार्यात्मक संबंध भी होना चाहिए। 5. परिवर्तनशीलता एवं गतिशीलता व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।


सामाजिक व्यवस्था का अर्थ (Meaning of Social Organization)


समाजशास्त्र में सामाजिक व्यवस्था एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। सामाजिक व्यवस्था सामाजिक संरचना से घनिष्ठ रूप से संबंधित है। सामाजिक व्यवस्था सामाजिक संरचना के कार्यात्मक स्वरूप को निर्दिष्ट करती हैं। वस्तुतः सामाजिक व्यवस्था एवं सामाजिक संरचना आपस में इतनी घनिष्ठ रूप से अंतर संबंधित है कि इन्हें एक दूसरे से प्रथक करना कठिन काम है। समाज सामाजिक संबंधों का जटिल जाल है और इसे हम एक अखंड व्यवस्था नहीं मानते। प्रत्येक समाज की अपनी एक संरचना होती है और इस संरचना का निर्माण विभिन्न इकाइयों के द्वारा होता है और इनमें से प्रत्येक इकाई का समाज में अपना एक विशेष स्थान होता है। प्रत्येक इकाई का अपना एक कार्य होता है। इन इकाइयों में एक प्रकार्यात्मक संबंध होता है, जिससे कि यह एक संतुलित अवस्था का निर्माण करती हैं और इस गतिशील संतुलित अवस्था को सामाजिक व्यवस्था कहा जाता है।


सामाजिक व्यवस्था सामाजिक संरचना की विभिन्न निर्माणक इकाइयों की संस्कृति द्वारा निर्धारित प्रकार्यात्मक संबंध के फलस्वरुप उत्पन्न होने वाली वह गतिशील स्थिति अवस्था है। जिसके कारण मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति तथा सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति संभव होती है। समाजशास्त्र में सामाजिक व्यवस्था उस व्यवस्था को कहा जाता है जिसमें समाज की विभिन्न नियामक इकाइयां एक सांस्कृतिक व्यवस्था के अंतर्गत एक दूसरे से प्रकार्यात्मक संबंध के आधार पर संबद्ध समग्रता की एक ऐसी संतुलित स्थिति को बनाए रखती हैं, जिसके फलस्वरूप अपने स्वीकृत अथवा उपलक्षित उद्देश्यों के अनुसार होती है। विभिन्न संस्थाओं और सामाजिक अंतर क्रियाओं की क्रियाशीलता निर्धारित एवं नियमित