सामाजिक संविदा का सिद्धांत - The Contract Theory of Society

 सामाजिक संविदा का सिद्धांत - The Contract Theory of Society


इसे समाज की व्यक्तिवादी विचारधार (Tomistic view of Society) भी कहते हैं ईशा से 5 शताब्दी पूर्व के अनेक दार्शनिकों का मानना है कि मनुष्य ने अपने कुछ लक्ष्यों की पूर्ति के लिए जानबूझकर समाज के संगठन का निर्माण किया है जैसा कि टॉमस हॉब्स का कहना है कि वीं 17 शताब्दी के लेखकों के अनुसार समाज वह साधन है, जिसे मनुष्य ने अपनी अनियमित प्रतिक्रियाओं के परिणामों के विरुद्ध अपनी रक्षा के लिए बनाया है। जबकि एडम स्मिथ जैसे अर्थशास्त्री आर्थिक दर्शन के आधार पर यह मानते हैं कि समाज पारस्परिक अर्थ व्यवस्था के लिए मनुष्यों के द्वारा निर्मित एक योजना है। इस तरह 18 वीं शताब्दी तक के व्यक्तिवादियो ने यह घोषित किया था कि मनुष्य प्राकृतिक अवस्था में स्वतंत्र और सामान पैदा हुआ, उसने सामाजिक संबंधों की स्थापना केवल सुरक्षा व्यवस्था और सामाजिक सुविधाओं को पाने के लिए किया है। सामाजिक संविदा के सिद्धांत के अनेक प्रतिपादकों में तीन नाम प्रमुख रूप से उल्लेखनीय है- हॉब्स, लॉक और रूसो।

हॉब्स की धारणा थी कि मनुष्य मूलतः प्राकृतिक अवस्था में रहता था, उस समय न समाज था और न ही राज्य अपने जीवन की रक्षा करना उनके सभी कामों के मूल में मुख्य प्रेरणा थी। हॉब्स ने प्रकृति का नकारात्मक वर्णन प्रस्तुत किया है। हॉक्स का कहना है कि प्राकृतिक व्यवस्था में मनुष्य निर्मम, स्वार्थी, एकांकी, दीन-हीन एवं पाशविक थे। प्रत्येक मनुष्य को एक दूसरे से भय था। उस समय जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला सिद्धांत प्रचलन में था, न कोई कानून था न ही लोगों में उचित और अनुचित अथवा न्याय और अन्याय की चेतना थी। उनमें प्रतिस्पर्धा, एक दूसरे का भय और वैभव की आकांक्षा बलवती थी। केवल शक्ति और छल कपट का बोलबाला था। मनुष्य का जीवन एकांकी, दरिद्रता पूर्ण, पशुवत, और अल्प था। उस समय बुद्धि का स्थान गौण और भावना एवं इच्छा को महत्वपूर्ण माना जाता था।


हॉब्स ने जिस अराजकता और प्राकृतिक अवस्था की कल्पना की थी, उसकी ऐतिहासिकता पर अनेक आलोचकों ने संदेह व्यक्त किया है।

समाजशास्त्रियों की मान्यता है कि आदिकालीन मानव जीवन में भी किसी न किसी प्रकार का सामाजिक जीवन अवश्य रहा होगा।


इस तरह हॉब्स ने मनुष्यों की पाशविक प्रकृति का दर्शन किया जबकि लॉक ने मनुष्यों के मानवीय गुणों पर अधिक बल दिया और कहा कि मनुष्य एक नैतिक व्यवस्था को स्वीकार करने वाला एवं उसके अनुसार आचरण करने वाला प्राणी है। लॉक का कहना है कि प्राकृतिक अवस्था का समाज लगातार युद्धरत समाज नहीं था, पर एक ऐसा समाज अवश्य रहा जिसमें की शांति की पूर्ण व्यवस्था नहीं थी। इसलिए अपनी सुविधाओं का अंत करने के लिए मनुष्यों के द्वारा सामाजिक समझौता किया गया और सामाजिक संविदा द्वारा व्यवस्था का निर्माण किया गया। हॉब्स एवं लॉक के विचारों के आधार पर रूसो ने कहा कि मनुष्य स्वभाव से एक सदाशय और श्रेष्ठ प्राणी है किंतु दूषित एवं सामाजिक संस्थाओं के कारण वह बुरा बन जाता है। रूसो का कहना है

कि प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य बिल्कुल भय मुक्त होकर जीवन यापन करता था और सहज वृति एवं सहानुभूति की भावना से प्रेरित होकर ही एक दूसरे के साथ गठबंधन किया। रूसो का कहना है कि प्राकृतिक अवस्था के अंतिम चरण की अराजकता से जब व्यक्ति दुखी हो गया था, तब उसने स्वयं को एक ऐसी संस्था में संगठित कर लेने की आवश्यकता को महसूस किया जिसके द्वारा प्रत्येक व्यक्ति की जान माल की रक्षा हो सके तथा व्यक्तियों की स्वतंत्रता भी बनी रहे।


कसामाजि समझौते के सिद्धांत को हालांकि बाद में अस्वीकार कर दिया गया था। इसके कुछ महत्वपूर्ण कारण थे क्योंकि यह सिद्धांत मिथ्या मान्यता पर आधारित था। मनुष्य समाज में प्रवेश करने से पूर्व व्यक्ति, संपत्ति, अधिकार, जीवन की सुरक्षा और अन्य किसी इच्छित उद्देश्य की पूर्ति के लिए सामाजिक व्यवस्था की स्थापना करते हैं।