समाजशास्त्र के उद्भव में ब्रिटिश समाजशास्त्रियों का योगदान - Contribution of British sociologists in the emergence of sociology
समाजशास्त्र के उद्भव में ब्रिटिश समाजशास्त्रियों का योगदान - Contribution of British sociologists in the emergence of sociology
वर्तमान में हम समाजशास्त्र के अध्ययन के दौरान जिन सिद्धांतों, अध्ययन विधियों ओर अवधारणओं का अध्ययन करते हैं उनमें अधिकांशतः पश्चिमी समाजशास्त्रियों की ही देन है। समाजशास्त्र को एक नवीन विज्ञान के रूप में स्थापित करने और समाज का एक वैज्ञानिक और क्रमबद्ध अध्ययन करने की प्रेरणा हमें ब्रिटिश समाजशास्त्रियों द्वारा ही मिलती है। अतः समाजशास्त्र के उद्भव व विकास में प्रमुख ब्रिटिश समाजशास्त्रियों के योगदान का विश्लेषण अनिवार्य हो जाता है जो कि अग्रलिखित है:-
(1) रेडक्लिफ ब्राउन (1881-1955) सामाजिक मानवशास्त्र के प्रणेता रेडक्लिफ ब्राउन ने सामाजिक संरचना की अवधारणा को स्पष्ट किया तथा अण्डमान द्वीपसमूह के निवासियों के सामाजिक जीवन के अध्ययन में इसे प्रयोग भी किया।
संरचना शब्द का विश्लेषण करते हुए ब्राउन कहते हैं कि “जब भी हम संरचना शब्द का प्रयोग करते हैं तो इससे हमारा अभिप्राय भागो अथवा संघटको के बीच किसी प्रकार के व्यवस्थित क्रम से है अर्थात् सम्बन्धो के इस जटिल रूप को ही ब्राउन सामाजिक संरचना की संज्ञा देते हैं और कहते हैं कि संरचना हमें दो रूपों में दिखाई देती है:
1. वह जो किसी निश्चित समय बिन्दु पर मूर्त यथार्थ के रूप में हमें वास्तव में विद्यमान दिखायी देती है।
2. संरचनात्मक स्वरूप जिसका अवलोकनकर्ता वर्णन करता है। अतः ब्राउन से सामाजिक संरचना की निम्नलिखित विशेषता बतायी:
1. अमूर्त स्वरूप
2. निरन्तरता व स्थायित्व
3. गत्यात्मकता निरन्तरता
4. सामान्य स्वरूपों से सम्बन्धित
5. स्थानीय आयाम
6. सामाजिक व्यक्तित्व की अवधारणा
7. प्रकार्य से भी सम्बन्धित
उपरोक्त विश्लेषण के साथ ही ब्राउन सामाजिक संरचना के तत्वों का उल्लेख भी करते हैं जो निम्नलिखित हैं
समूह
सामाजिक संबंध
सामाजिक भूमिकाओं के अनुसार व्यक्तियों और वर्गों का विभेद किया
संस्थाएँ
हित व मूल्य
संस्कार
जादू व भूत विद्या
इस प्रकार स्पष्ट है कि ब्राउन द्वारा प्रतिपादित सामाजिक संरचना की अवधारणा अपने में एक पूर्ण अवधारणा है जो आनुभविक अध्ययन के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करती है और जिसके प्रयोग द्वारा किसी समाज के सामाजिक जीवन का अध्ययन और विश्लेषण सुगम बन जाता है।
(2) एन्थनी गिडेन्स (1938) ब्रिटिश समाजशास्त्री एन्थनी गिडेन्स ने समाजशास्त्री सिद्धांत के क्षेत्र में अत्यधिक उल्लेखनीय कार्य किये हैं। इनकी रूचि शास्त्रीय सिद्धांत, पूंजीवाद, सामाजिक वर्ग व सामाजिक परिवर्तन में रही है। लेकिन इनकी ख्याति इनके संरचनाकरण सिद्धांत से मिली है।
गिडेन्स के विचारों में समीक्षा का पुट तथा तर्कपूर्ण विश्लेषण अभिव्यक्ति का समावेश होता था। आपका विचार है कि सामाजिक क्रियाएं समय व स्थान में घटती है इसलिए गिडेन्स ने अपने संरचनाकरण सिद्धांत को अप्रकार्यवादी घोषणापत्र कहा है। इनका मत है कि मानव इच्छाओं से मानव इतिहास का पलायन तथा उस पलायन के परिणामो की मानव क्रिया पर कारणात्मक प्रभावों के रूप में वापसी सामाजिक जीवन की प्रमुख विशेषता है किंतु प्रकार्यवाद उस वापसी की समीक्षा पुनरूत्पादित सामाजिक तत्वों के अस्तित्व के लिए समाज के तर्क के रूप में करता है।
गिडेन्स के संरचनाकरण सिद्धांत की मान्यता है कि सामाजिक व्यवस्थाओं का उद्देश्य कारण या आवश्यकता नहीं होती है केवल व्यक्ति ही संरचनाकरण करता है। संरचनावादी विचारों में गिडेन्स ने काल इतिहास तथा समकालीन ऐतिहासिक विकासशील विभाजन पर प्रकार्यवादी चिंतन की तुलना में अधिक जोर दिया है।
गिडेन्स का मानना है कि सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को जिस सामाजिक व्यवस्था का वे निर्माण करते हैं या पुनरूत्पादन करते हैं, उसका ज्ञान होता है। यह संरचना की द्वैत अवधारणा की एक आवश्यक विशेषता है। इस सन्दर्भ में वह व्यावहारिक चेतना जिस पर कर्ता सामाजिक क्रिया की रचना में विवेचनात्मक चेतना से अंतरव्यक्त करता है। कर्ताओं में पाये जाने वाले विमर्शात्मक या तर्कमूलक अन्तःप्रवेश की प्रकृति एवं विषय क्षेत्र को गिडेन्स ने काफी महत्वपूर्ण माना है और इसे सामूहिकता में नियंत्रण का द्वन्द कहा है।
गिडेन्स ने संरचनात्मक सिद्धांत की मान्यताएँ
1. संरचनावादी सिद्धांत में भाषा व समाज दोनों की संरचना में पार्थक्य द्वारा अंतरल का महत्वपूर्ण स्थान है।
2. संरचनाकरण कालिक आयाम को अपने विश्लेषण के केन्द्र में रखने की कोशिश करता है।
3. संरचनावाद सामाजिक पुनरूत्पादन सिद्धांत पर जोर देता है।
4. संरचनावाद वस्तु व विषय के द्वैत का अतिक्रमण करने का प्रयत्न करता है।
(3) डेहरेनडॉर्फ (1928)- ब्रिटिश समाजशास्त्री डेहरेनडॉर्फ का प्रमुख योगदान वर्ग सिद्धांत (वर्ग संघर्ष) के क्षेत्र में है। आपका संघर्ष सिद्धांत मूलतः सत्ता के सम्बन्धो पर आधारित है सत्ता संरचना जो प्रत्येक सामाजिक संगठन का अभिन्न अंग होती है, अनिवार्य रूप से सेवार्थ समूह को संगठित करती है और उन्हें निश्चित स्वरूप प्रदान करती है और इस रूप में संघर्ष की सम्भावनाओं को जन्म देती है। वास्तव में समाज में सत्ता का बंटवारा समान नहीं होता इसलिए संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार डेहरेनडॉर्फ का संघर्ष सिद्धांत मूलभूत रूप से शक्ति व सत्ता के सिद्धांत पर आधारित है। डेहरेनडॉफ ने शक्ति की असमानता को ही संघर्ष का कारण माना है। डेहरेनडॉफ ने मार्क्स के वर्ग संघर्ष सिद्धांत की आलोचना की है। आपने भी संघर्ष को समन्वयकारी व संरचनात्मक प्रकार्यवादी दृष्टि से देखा है।
आपने संघर्ष सिद्धांत को संक्षेप में निम्नलिखित प्रकार से विश्लेषित किया है:
1. किसी भी आदेशसूचक समन्वित समाज के लोगों में वास्तविक समाज के बारे में जितनी अधिक चेतना होगी उतनी ही अधिक उनकी संघर्ष करने की संभावना होगी।
2. जितनी आर्थिक, तकनीकि, राजनैतिक व सामाजिक दशाओ की आवश्यकताओ की पूर्ति संगठन में होगी उतना ही संघर्ष अधिक तीव्र होगा।
3. अधिकोटि और अधीनस्थ समूहों में जितनी कम गतिशीलता होगी संघर्ष उतना ही तीव्र होगा।
4. संघर्ष जितना अधिक गहरा, सघन व हिंसात्मक होगा, उतना ही अधिक सामजिक परिवर्तन होगा।
(4) स्टुअर्टहॉल (1932)- ब्रिटिश समाजशास्त्री स्टुअर्टहॉल का प्रमुख कार्य राष्ट्रीय संस्कृति, आधुनिकता व वैश्वीकरण से जुड़े हुये विषयो पर है। वैश्वीकरण के विषय में हॉल का कहना है कि यह अभी भी कोई नहीं प्रघटना नहीं है वास्तव में आधुनिकता में वैश्विकता अन्तर्निहित है। वैश्वीकरण की जड़े गहरे रूप में आधुनिकता में विद्यमान है। वैश्वीकरण से उत्पन्न सांस्कृतिक पहचान की समस्या के तीन संपादित रूप हो सकते हैं
(1) सांस्कृतिक समाजीकरण के विकास के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय पहचान खत्म होती जा रही है और वैश्विक उत्तर आधुनिकता का विकास हो सकता है।
(2) राष्ट्रीय तथा अन्य स्थानिक या विशिष्ट पहचान वैश्वीकरण के प्रतिरोध के कारण अधिक मजबूत हो सकती है।
(3) राष्ट्रीय पहचान कमजोर पड़ सकती है किंतु इसका स्थान वर्णसंकरता की नवीन पहचान ले सकती है।
वैश्विक पहचान के समाजीकरण के कुछ परिणाम हो सकते हैं।
(1) वैश्वीकरण स्थानिक पहचान को मजबूत करने के साथ-साथ चल सकता है यद्यपि यहसब कुछ समय और स्थान पर निर्भर करता है।
(2) वैश्वीकरण एक असमान ऊबड़-खाबड़ प्रक्रिया है ओर इसकी अपनी राजनीतिक रेखागणित है।
(3) वैश्वीकरण - पश्चिमी प्रभुत्व के कुछ लक्षणो को बनाये रखता है किंतु सभी जगह सांस्कृतिक पहचान समय व स्थान के दायरे में आपेक्षिक रूप से विद्यमान रहती है।
(5) सर पैट्रिक गिड्स (1854-1932)- भारत में बम्बई विश्वविद्यालय में सन् 1919 में समाजशास्त्र के प्रथम विभाग की स्थापना करने वाले सर पैट्रिकगिड्स मूलरूप में एक जीवविज्ञानी व नगर नियोजक तथा नगरीय सामाजिक समस्याओं के प्रख्यातज्ञाता थे उन्होंने नगर नियोजन के लिए एक समाज वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत किया। यही नहीं, उन्होंने सर्वेक्षण करने व संकलित तथ्यों का विश्लेषण करने को एक नवीन पद्धति विकसित की जो बाद में सर्वेक्षणकर्ताओ द्वारा एक गाइड के रूप में प्रयोग की गई। नगरीय समाजशास्त्र को उनकी .." उपनगरीय समूहन ' की अवधारणा को उन्होंने अपनी पुस्तक 'सिटिज इन इवोल्यूशन' में प्रस्तुत की है, एक प्रमुख देन है। जी. एस. घूर्ये व राधाकमल मुकर्जी के लेखनो में इनके प्रभाव का स्पष्ट अवलोकन किया जा सकता है।
(6) इवान्स प्रिचार्ड (1902-1973)- यह एक अग्रणी ब्रिटिश सामाजिक मानवशास्त्री थे इन्होंने अफ्रीकी समाजो में मुख्य रूप से अजेन्डे व न्यूर जनजातियों में कई नृजातीय अध्ययन किये हैं। आपने सामाजिक मानवशास्त्र को समाज का एक प्राकृतिक अध्ययन मानने के स्थान पर इसे एक मानवतावादी अध्ययन माना
इवान्स प्रिचार्ड का अध्ययन केंद्र बिंदु यह जानना होता है कि किसी भी समाज के सदस्य रीति रिवाजो का क्या अर्थ लगाते हैं, इनकी दृष्टि में इन रिवाजों और कर्मकाण्डो का क्या अर्थ है। उन्होंने कहा कि मानवशास्त्र का मुख्य कार्य एक संस्कृति का इस प्रकार भाषान्तर करना है ताकि दूसरी संस्कृति के सदस्य उन शब्दो, अवधारणाओं को आसानी से समझ सके।
प्रिचार्ड शायद पहले व्यक्ति थे जिन्होंने जादू टोना टोनागिरी व भूतप्रेत सम्बन्धी विश्वासो और इनकी विधियों का सविस्तार वर्णन विश्लेषण किया है। द. सूडान के अजेण्डे लोगो का अध्ययन कर बताया कि ये लोग किसी व्यक्ति से सम्बन्धित किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना की व्याख्या जादू टोने के आधार पर करते हैं। वे सभी प्रकार की मृत्यु का कारण टोनागिरी को मानते हैं इसी तरह न्यूर जनजाति के अध्ययन के दौरान प्रिचार्ड ने राज्यविहीन समाजो में राजनीतिक एकीकरण के सिद्धांत को प्रतिपादित किया।
(7) लिऑनार्द ट्रिलाने हॉबहाउस (1864-1929)- हॉबहाउस एक प्रारम्भिक ब्रिटिश समाजशास्त्री थे। ब्रिटेन में वैज्ञानिक समाजशास्त्र की नींव रखने वाले हॉबहाउस की रचनाओं का आकार विश्वकोशीय प्रकृति का है। साथ ही नीतिशास्त्र और सामाजिक दर्शन में तर्कवाद को सूक्ष्म व्याख्या भी दिखती है।
स्पेन्सर के समान ही हॉबहाउस भी समाज को एक स्थानिक एकता माना है। आपने अपने सिद्धांत में सहसंबंध और समन्वय की प्रक्रियाओं को रेखांकित किया है। और सामाजिक प्रगति में सामाजिक मन की भूमिका स्वीकार की।
हॉबहाउस ने सामाजिक दर्शन और समाजशास्त्र के अतिरिक्त राजनीतिक विषयो पर लिखा। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक नियंत्रण करने वाले राज्य के बीच सम्बन्धो को लेकर उन्होंने सामाजिक न्याय के तत्व के नाम से भी पुस्तक लिखी। राज्य की सकारात्मक भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा है कि किसी भी राज्य को सार्वजनिक कल्याण कार्यों को करते समय व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए।
(8) ब्रॉनिस्लॉ केस्पर मेलिनोस्की (1884-1942) मानवशास्त्र में प्रकार्यवादी सिद्धांत के प्रमुख हस्ताक्षर पोलैण्ड निवासी मेलिनोस्की प्रख्यात मानव वैज्ञानिक रेडक्लिफ ब्राउन के समकालीन थे। सन् 1915 व 1918 के बीच आपने न्यूगिनी के उत्तर पश्चिम में स्थित ट्रोबिएंड द्वीप के मातृवंशीय निवासियो का लगभग दो वर्षों तक अध्ययन किया। इस समाज में उत्तराधिकार व दायाधिकार स्त्रियों से स्त्रियों को होता था। इस शोध के दौरान मेलिनोस्की ने सहभागिक अवलोकन विधि का प्रयोग किया।
मेलिनोस्की प्रकार्यवादी सिद्धांत के प्रणेताओं में से एक रहे हैं। इस सिद्धांत का उल्लेख इनकी पुस्तक ‘‘संस्कृति के एक वैज्ञानिक सिद्धांत (1944) में किया। इनके अनुसार समस्त मानव संस्कृति का कार्य मूलतः मानव की मौलिक एवं आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। सभी सांस्कृतिक तत्व किसी न किसी रूप में किसी समाज में व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। उन्होंने कहा कि कर्मकाण्डो, नातेदरी प्रतिमानो और आर्थिक विनिमय (प्रसिद्ध कूलाप्रथा सहित) की व्याख्या उनकी उत्पत्ति के आधार पर किये जाने की अपेक्षा उनकी वर्तमान उपयोगिता के आधार पर की जानी चाहिए। आपने किसी भी समाज के समरस संतुलन को एक आदर्श के रूप में स्वीकार किया है।
मेलिनोवस्की ने ट्रोबियंड द्वीप समूह वासियों के विभिन्न पक्षो का अध्ययन कर कई शोध प्रबंध लिखे हैं उन्होंने उसके यौन व्यवहारो का अध्ययन कर “असभ्य समाज में यौन व्यवहार और दमन (1927) पुस्तक लिखी। 'असभ्य समाज में अपराध और प्रथा" (1926) में उन्होंने आदिवासी समाजो में अपराध का विश्लेषण किया है। मेलिनोस्की ने समाज के ताने बाने की व्याख्या करने में मिथको का भी विश्लेषण किया है। इस प्रकार इनके उपरोक्त योगदानो की परिणति यह है कि आज विश्वासो, रीति रिवाजो, नातेदारी, प्रतिमानो, राजनीतिक संगठन और आर्थिक कार्यकलापो आदि प्रत्येक विषय का अध्ययन अलग न किया जाकर उनके पारम्परिक सम्बन्धो और सम्पूर्ण समाज के सन्दर्भ में किया जाने लगा है।
यूरोप में समाजशास्त्र के उद्भव एवं विकास यात्रा का सामरिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है, जिसमें यूरोपीय सामाजिक संरचना के उन समस्त कारकों की विवेचना की गयी है, जिनसे समाजशास्त्र की उद्भव परंपरा को संजीवनी प्राप्त हुई। साथ ही वैश्विक स्तर पर समाजशास्त्र को जिन यूरोपीय विचारकों ने आयाम प्रदान किया है उनके दृष्टिकोणों एवं सैद्धांन्तिक परिप्रेक्ष्य को केन्द्रित करते हुए अध्याय की श्रृंखला में समाहित करने का प्रयास हुआ है। यूरोपीय समाजशास्त्र न केवल एक वैचारिक प्रघटना है, अपितु इसके जन्म एवं क्रियान्वयन में उस समाज में व्याप्त क्रांतियों ने भी इस विषय की स्थापना के दर्शन को आयाम प्रदान किया है।
आगस्त कोत की वैचारिक केंद्रीयता किस प्रकार सामाजिक जीवन की व्याख्या करने वाले एक प्रत्यक्षवादी दर्शन को आत्मसात् करती है और किस प्रकार वह इस विचारधारा को या दर्शन को 1838 ई. में एक सैद्धांतिक विज्ञान के परिप्रेक्ष्य के रूप में नामानीकृत करते हुए पुष्पित और पल्लवित करती है। इसकी व्याख्या करना इस ईकाई का प्रमुख उद्देश्य है। यूरोपीय सामाजिक संरचना में पुर्नजागरण, वैज्ञानिक क्रांति,वाणिज्यिक क्रांति के परिणाम स्वरूप उत्पन्न सामाजिक प्रभावों और चुनौतियों का मूल्यांकन भी इस ईकाई का केंद्रीय लक्ष्य रहा है।
यूरोपीय समाजशास्त्र प्रबोधन की परंपरा से विकसित एक विचारधारा है, जिसमें बौद्धिक आन्दोलनों ने भी अपना केंद्रीय सहयोग प्रदान किया है, जैसे इतिहास का दर्शन, विकास का जीव शास्त्रीय सिद्धांत, सामाजिक सर्वेक्षण इत्यादि बौद्धिक नवीनताओं ने समाजशास्त्र को एक ऐसा अक्षय वृक्ष बनाया जिसके छांव में आज संपूर्ण विश्व के सामुदायिक समाज अपनी चुनौतियों और समस्याओं के समाधान के मार्ग को ढूंढने का प्रयास करते हैं। वस्तुतः यह ढूंढने का प्रयास ही उन्हें सामाजिक अनुसंधान की विभिन्न क्रिया-विधियों की ओर बढ़ने की ओर जागरूक करता है और क्रियाविधियों और परिप्रेक्ष्यों के समन्वित संकुल द्वारा वह समाज वैज्ञानिक अपने समाज हेतु नवीन सम्भावनाओं के लक्ष्य को प्राप्त करता है।
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