भ्रष्टाचार , न्याय एवं दण्ड व्यवस्था , दण्ड व्यवस्था - Corruption, Justice and Penal System, Penal System
भ्रष्टाचार , न्याय एवं दण्ड व्यवस्था , दण्ड व्यवस्था - Corruption, Justice and Penal System, Penal System
कौटिल्य ने अपनी पुस्तक 'अर्थशास्त्र में तत्कालीन शासन व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार का उल्लेख करते हुए 40 प्रकार के भ्रष्टाचार पर चर्चा की है। शाब्दिक अर्थ में भ्रष्टाचार दो शब्दों से मिलकर बना है, भ्रष्ट आचार अर्थात समाज में प्रचलित मानक मूल्यों के विरूद्ध मानवीय व्यवहार भष्टाचार है। सामान्य रूप में भष्टाचार को आर्थिक प्रतिमानों के उल्लघंन से जोड़ा जाता है। कौटिल्य ने राज्य कर्मचारियों के आर्थिक भष्टाचार को उल्लेख करते हुए कहा कि जिस प्रकार जिहवा पर पड़ा मधु या विष का स्वाद लिये बिना जिहवा नहीं रह सकती उसी प्रकार अर्थ का देख-रेख करने वाले राजकर्मचारी अर्थ का स्वाद (भष्टाचार) अर्थ का स्वाद न ले संभव नहीं है। इस प्रकार कौटिल्य भष्टाचार को एक जटिल समस्या मानते हुए स्वीकार करते है कि इसका पूर्णता समाप्त होना असंभव है। जिसका उल्लेख उन्होंने अपनी पुस्तक 'अर्थशास्त्र' के एक अन्य श्लोक में भी किया है जिसमें उन्होंने कहा कि “आकाश में उड़ते विचरते पक्षियों की गति को समझना संभव है, किंतु राजकर्मचारियों के मन में छिपे भावों को समझ पाना संभव नही"।
कौटिल्य मानते थे कि भष्टाचार को भले ही पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता है परन्तु प्रभावी नियमों और दण्ड प्रावधानों द्वारा पर्याप्य नियंत्रण लगाया जा सकता है। जिसका उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा है कि राजा का कर्तव्य है कि भष्ट राजकर्मी की सम्पत्ति छीन ले और उसे निम्नतर पदो पर अवनत कर दें। ताकि वो राज्य के अर्थ का गबन न कर पावें तथा गबन की हुई सम्पत्ति पुनः राज को प्राप्त हो सके। साथ ही कौटिल्य ने ऐसे कर्मचारियों की नियुक्ति पर बल दिया है। जो ईमानदार रहें, अर्थ का गबन न करते हो, राजा के हित में कार्य करने वाले हो ।
न्याय एवं दण्ड व्यवस्था
कौटिल्य राज्य में शान्ति स्थापित करने तथा शासन को सुचारू से चलाने के लिए दण्ड व्यवस्था को आवश्यक बताया है। कौटिल्य का मत है कि स्वधर्म पालन से मनुष्य का लोभ एवं परलोक दोनो ही सुधरते है। प्रजा अपने-अपने स्वधर्म पालन में तत्पर रहें इसके लिए राजा का कर्तव्य है कि न्याय एवं दण्ड़ व्यवस्था का प्रबंध करें। न्याय एवं दण्ड़ एक दूसरे से अन्तः संबंधित है। राज्य में न्याय की स्थापना दण्ड बिना संभव नहीं है। कौटिल्य ने न्याय एवं दण्ड व्यवस्था का विस्तार पूर्वक वर्णन किया है।
न्याय व्यवस्था
कौटिल्य के अनुसार राजा को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्याय की व्यवस्था करनी चाहिये जिसके लिए उसे अलग से एक अधिकारी को नियुक्ति करना चाहिए जो ब्रह्ममण हो तथा धर्मशास्त्र एवं विधिशास्त्र का ज्ञाता हो। राजा को न्यायपूर्वक प्रजा की रक्षा करनी चाहिए, उसे न्याय के मामले में पक्षपात नही दिखाना चाहिए, शत्रु हो या मित्र उसे न्याययुक्त दण्ड देना चाहिए। कौटिल्य ने न्याय व्यवस्था को दो भागो में विभाजित किया है।
1. धर्मस्थ या व्यवहार न्यायालय इस न्यायालय के अन्तर्गत साधारण समझौते सम्बन्धी विवाद, दम्पत्य समन्धी विवाद, सम्पत्ति के उत्तराधिकार सम्बन्धी विवाद आदि का निपटारा किया जाता था।
2. कण्टक शोधक न्यायालय इस न्यायालय के अन्तर्गत राज्य के नागरिकों के द्वारा नियम भंग करना, अवैधानिक रूप से धनार्जन, कन्याओं एवं स्त्रियों के साथ दुर्व्यव्यवहार एवं बालात्कार आदि सम्बन्धी विवादों का निपटारा किया जाता था।
कौटिल्य ने इस प्रकार के विवादों को सुनने और उस पर निर्णय देने के लिए न्यायालयों को तीन स्तरों में विभाजित किया। जनपद संधि न्यायालय जनपदों या गांवों की सीमा पर निर्धारित किये जाते थे, जहां दो या दो से अधिक जनपद की सीमाएं मिलती थी। संग्रहण न्यायालय दस ग्रामों के लिए होता था। द्रोणमुख न्यायालय चार सौ ग्रामों के केंद्रीय स्थानों पर होते थे।
दण्ड व्यवस्था
कौटिल्य के अनुसार दंड नीति ही अप्राप्त वस्तुओं को प्राप्त करती है, प्राप्त वस्तुओं की रक्षा करती है. एवं रक्षित वस्तुओं की वृद्धि करती है। उसी पर संसार की सारी लोकयात्रा निर्भर है। इसलिए संसार को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए राजा सदा ही दंड के लिए प्रस्तुत रहें। कौटिल्य लचीले एवं सुधारात्मक दंड के समर्थक है लेकिन उनका मानना है कि दंड में आवश्यकता से अधिक ढिलाई दे देने पर भी लोभ राजा की अवहेलना करने लगते है। वहीं कठोर अथवा प्रतिशोधात्मक दंड से प्रजा दुखी एवं राजा से असंतुष्ट होने लगती है। इसलिए राजा को संतुलित वा समुचित दंड देने वाला होना चाहिए। कौटिल्य ने कई प्रकार के दंड चर्चा की है। अर्थदंड, कायदंड, कार्यदंड, बंधनागारदंड तथा अर्थशास्त्र के 11वें अध्याय में कौटिल्य ने मृत्यु दंड का भी विस्तार पूर्वक वर्णन किया है।
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