स्पेंसर के सामाजिक उद्विकास के सिद्धांत की आलोचना - Criticism of Spencer's theory of social evolution
स्पेंसर के सामाजिक उद्विकास के सिद्धांत की आलोचना - Criticism of Spencer's theory of social evolution
हरबर्ट स्पेंसर अपनी उद्विकास के सिद्धांत के कारण काफी प्रसिद्ध है। उनका यह सिद्धांत काफी प्रचलित है। फिर भी इस सिद्धांत में कुछ कमियां पाई गई हैं -
1. उद्विकासवादियों का कथन है कि सभी समाजों का उद्विकास एक ही प्रक्रिया द्वारा हुआ है। यह कथन सही नहीं है। क्योंकि सभी समाजों पर एक सा नियम लागू करना ठीक नहीं है। प्रत्येक समाज अलग अलग परिस्थितियों की देन होता है। अतः सभी समाजों का उद्विकास एक ही प्रक्रिया से मानना तर्कसंगत नहीं है।
2. स्पेंसर का सामाजिक उद्विकास के सिद्धांत का तीन स्तरों में वर्णन वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित नहीं है। क्योंकि अगस्त कॉम्ट ने 3 स्तरों एवं उपस्तरों मार्गन ने सात एवं कन्डोरसेट दस स्तरों एवं उप स्तरों में सामाजिक उद्विकास का वर्णन किया है।
3. स्पेंसर के अनुसार समाज का विकास कुछ स्तरों पर होता है तथा हर समाज में इन स्तरों का आगमन का क्रम भी एक जैसा ही होता है, यह सही नहीं है। जैसा कि जिसबर्ट ने कहा है- स्तरो का तथाकथित क्रम यह आशा प्रकट नहीं करता कि आवश्यक रूप से यह काल क्रम था। कुछ जनजातियां शिकारी अवस्था में है। तो हम यह नहीं जानते कि वह कृषि स्तर में जाएंगी अथवा वे हमेशा शिकारी अवस्था में ही बनी रहेंगी। जैसा कि श्रीलंका की बेड्डा जनजाति जो कि इन स्तरों पर नहीं आ पाई है और प्रायः समाप्त होती जा रही है।
4. स्पेंसर का कथन है कि उद्विकास के कारण समाज में हमेशा ही प्रगति होती है। सर्वमान्य नहीं है। सोरोकिन ने इस संबंध में बताया है कि समाज में हमेशा प्रगति नहीं होती। ऐतिहासिक घटनाएं इस बात की साक्षी हैं कि समाज में प्रगति और अवनति दोनों होती है।
5. उद्विकास समाज की कुछ इकाइयों पर लागू तो होता है। किंतु संपूर्ण समाज पर नहीं, क्योंकि संपूर्ण समाज में अनेक विभिन्नताएं होती है। जिसबर्ड के अनुसार संपूर्ण समाज का कोई वास्तविक अस्तित्व भी नहीं है। वह कहते हैं इस सामाजिक विकास से संबंधित कठिनाई जिसका समाधान खोजना है। वह विकसित होने वाले विषय के संदर्भ में है। क्या विषय संपूर्ण समाज सामान्य रूप में है। या हर समाज विशिष्ट रूप में सामान्य समाज' वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं रखता है।
6. गोल्डन वीजर का मत है कि उद्विकासवादियों ने प्रसार के महत्व को भुला दिया है। जब दो समाज व संस्कृति संपर्क में आती हैं तो वह सांस्कृतिक तत्वों का आदान प्रदान करती है। जिससे संस्कृति समृद्ध होती है।
7. मेकाइवर और पेज का मत है कि समाज का उद्विकास जीवोंकी भांति नहीं होता है।
सामाजिक उद्विकास में मानव का प्रयत्न महत्वपूर्ण होता है। जबकि जीवों के उद्विकास में प्राकृतिक शक्तियां ही सब कुछ होती है।
8. उद्विकासवादियों ने अविष्कार के महत्व को भुला दिया है। सामाजिक उद्विकास स्वतः कम ही होता है, अविष्कार उसे गति प्रदान करते हैं।
9. गिंसबर्ग का कथन है कि यह धारणा कि उद्विकास सरल स्थिति से जटिल स्थिति की ओर होने वाला परिवर्तन है। एक गंभीर विवाद का विषय है। क्योंकि यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक परिवर्तन के साथ सामाजिक जीवन जटिल ही होगा। मानव अपने ज्ञान और विज्ञान के सहारे जटिलता को सरल बनाने का भी प्रयास करता है। जटिलता की संभावना हो सकती है पर यह अनिवार्यता नहीं है।
10. उद्विकासवादियों की अध्ययन पद्धति भी दोषपूर्ण है। क्योंकि उन्होंने प्रत्यक्ष अवलोकन के स्थान पर अनुमान एवं यात्रियों के वर्णन व अनुभव को ही सही माना है।
11. स्पेंसर का कहना है कि उद्विकास आंतरिक शक्तियों के कारण होता है। किंतु वे आंतरिक शक्तियां कौन सी है? उनमें से कौन सी शक्ति उद्विकास के लिए उत्तरदाई है? उन शक्तियों का उल्लेख उद्विकासवादियों ने कहीं नहीं किया है।
12. उद्विकास के कोई स्पष्ट नियम नहीं है। उद्विकास विकास अवधारणाओं में से है। जिनको प्रयोग द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता उद्विकास की अवधारणा की आवश्यकता सिर्फ इसलिए है क्योंकि यह हमारी दार्शनिक अंतरात्मा की संतुष्टि करती है।
13. आगबर्न ने उद्विकास की अवधारणा को अधिक महत्वपूर्ण नहीं मानते उनके अनुसार विकास में वंशानुक्रम के नियम की उपलब्धि के प्रयास सामाजिक संस्थाओं के विकास एवं परिवर्तन तथा चयन में थोड़े से ही सार्थक और महत्वपूर्ण परिणाम प्रस्तुत किए हैं।"
उपर्युक्तकमियों के बाद भी उद्विकास की अवधारणा ने समाज एवं संस्कृति में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया है। मैकाइवर कहते हैं कि विभिन्न अवस्थाओं को एक दूसरे से पृथक करने में इस सिद्धांत ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह सिद्धांत यह भी स्पष्ट करता है कि समाज कोई आकस्मिक घटना नहीं है। वरन् यह लंबे एवं क्रमिक विकास का परिणाम है। किंतु समकालीन समाज वैज्ञानिकों ने समाज परिवर्तनों का अध्ययन उद्विकासीय ढंग से करना लगभग त्याग दिया है। क्योंकि इसमें एक महत्वपूर्ण कठिनाई ऐतिहासिक प्रमाण को जुटाने की भी हमेशा से ही रही है। स्पेंसर के सामाजिक उद्विकास के नियम में अनेक कमियां हैं। इस कारण उनकी उपरोक्त आलोचनाएं भी की गई है। इसके बावजूद स्पेंसर के विचार अतुलनीय है।
वार्तालाप में शामिल हों