श्रम विभाजन के सिद्धांत की आलोचना - Criticism of the Theory of Division of Labour
श्रम विभाजन के सिद्धांत की आलोचना - Criticism of the Theory of Division of Labour
‘डिवीजन ऑफ लेबर इन सोसाइटी' श्रम विभाजन पर दुर्खीम का प्रथम ग्रंथ था। इसलिए इस ग्रंथ में कुछ कमियों का पाया जाना स्वाभाविक है। हालांकि दुर्खीम ने इस पुस्तक में अपने पूर्ववर्ती कुछ विचारकों के विचारों का खंडन करके एक ऐसे सिद्धांत को प्रस्तुत करने का प्रयास किया जो श्रम विभाजन के कारणों एवं परिणामों पर प्रकाश डाल सके। फिर भी दुर्खीम के इस सिद्धांत में कुछ कमियां हैं इसलिए उनके श्रम विभाजन के सिद्धांत की आलोचना की गई। जो इस प्रकार है
1. दुर्खीम के श्रमविभाजन के सिद्धांत की पहली आलोचना यह है कि इन्होंने जनसंख्या के आकार एवं घनत्व में वृद्धि को श्रम विभाजन की वृद्धि का निर्णायक कारक बताया है। जो उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि श्रम विभाजन की स्थिति विभिन्न कारणों से उत्पन्न होती है।
2. जिन्सबर्ग (Ginsberg), सोरोकिन (Sorokin) एवं बोगार्डस (Bogardus) आदि विद्वानों ने कहा है कि दुर्खीम ने श्रम विभाजन का एकमात्र कारण जनसंख्या को बताने की भूल की है।
3. दुखम का यह विचार की श्रम विभाजन ही सामाजिक परिवर्तन का निर्णायक कारण है उचित प्रतीत नहीं होता। जिन्सबर्ग के अनुसार सामाजिक परिवर्तन एक जटिल प्रक्रिया है तथा सामाजिक परिवर्तन किसी एक कारक का परिणाम नहीं है बल्कि विभिन्न कारक सामाजिक परिवर्तन की स्थिति को उत्पन्न करने में योगदान देते हैं।”
4. दुर्खीम ने लक्ष्य या उद्देश्य के स्थान पर प्रकार्य' शब्द का प्रयोग क्यों किया? यह स्पष्ट नहीं है।
5. मर्टन (Merton) ने दुर्खीम के उद्विकास के सिद्धांत की भी आलोचना की है। आपके अनुसार दुर्खीम ने प्राचीन आदिम समाज को एक छोर पर रखा है और आधुनिक समाजों को दूसरी छोर पर इस प्रकार सामाजिक जीवन के उद्विकास की रेखीय विवेचना कर दी है जो कि असंगत है।
6. मर्टन (Merton) के अनुसार दुर्खीम ने श्रम विभाजन तथा सामाजिक संरचना के अध्ययन में भौतिक विज्ञान की पद्धति का मनमाना प्रयोग किया है।
7. मर्टन (Merton) ने दुर्खीम के समूहवादी दृष्टिकोण की भी आलोचना की है। मर्टन कहते हैं कि दुर्खीम ने नैतिकता की विवेचना भी गलत ढंग से की है। उन्होंने कहीं भी व्यक्तिगत नैतिकता और सामाजिक नैतिकता के अंतर को स्पष्ट नहीं किया। मर्टन के अनुसार नैतिकता, नैतिकता होती है व्यक्तिगत और सामाजिक नहीं।
8. बार्न्स (H-E-Barnes) ने लिखा है कि दुर्खीम व्यक्तिगत नैतिकता एवं सामाजिक नैतिकता के अंतर को स्पष्ट करने में असफल रहे हैं।
9. मर्टन के समान बार्न्स ने भी कहा है कि दुर्खीम ने भौतिक विज्ञान की पद्धति का मनमाना उपयोग किया है।
10. बार्न्स, दुर्खीम के इस कथन पर भी आपत्ति करते हैं कि सुख की अभिलाषा ने सभ्यताओं को जन्म नहीं दिया। बार्न्स के अनुसार ऐसी कल्पना कर लेना वास्तविक एवं सत्य के विपरीत है और मानव प्रकृति का एक तरफा अनुमान है।
11. रेमण्ड ऐरन दुखम के श्रम विभाजन की जीवशास्त्री व्याख्या की आलोचना करते हैं। उनके अनुसार यह दुर्खीम की पद्धति के प्रतिकूल है।
उपरोक्त आलोचनाओं को देखने के बाद भी श्रम विभाजन के सिद्धांतो से पर यह स्पष्ट है कि दुखम का यह सिद्धांत श्रम विभाजन की अत्यंत विशद व्याख्या करता है। व्यक्ति और समाज का संबंध सामूहिक अस्तित्व की प्रमुखता व्यक्तिवादी मनोवृति के साथ-साथ आधुनिक समाजों में उभरती हुई अनेकानेक औद्योगिक एवं सामाजिक समस्याओं की व्याख्या समाज के वैज्ञानिक अध्ययन की व्यवहारिक उपयोगिता है। जॉर्ज पंचम ने उचित ही लिखा है “उस व्यक्ति की प्रथम महान कृति जिसमें लगभग चौथाई शताब्दी तक की फ्रांस की विचारधारा पर नियंत्रण किया और जिसका प्रभाव अब भी घटने की अपेक्षा बढ़ रहा है। ऐतिहासिक तथा प्रसंग की दृष्टि से आज भी एक ऐसी पुस्तक है, जो उन सभी के द्वारा पढ़ी जाना चाहिए, जो सामाजिक विचारधारा के ज्ञान और सामाजिक समस्याओं में रुचि रखते हैं।"
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