धर्म के सिद्धांत की आलोचनाएं - Criticism of Theory of Religion
धर्म के सिद्धांत की आलोचनाएं - Criticism of Theory of Religion
दुर्खीम ने अपने धर्म के सिद्धांत के द्वारा धर्म की विस्तृत तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। फिर भी अनेक विद्वान ऐसे हैं जिन्होंने की दुर्खीम के धर्म के सिद्धांत की आलोचना प्रस्तुत की है। इन विद्वानों में रेमंड ऐरन, सोरोकिन बीरस्टिड, हैरी बार्न्स, बोगाडर्स, वाइन, एवं मार्टिन डेल प्रमुख हैं।
रेमण्ड ऐरन (Raymond Aron) ने दुर्खीम के धर्म के सिद्धांत की आलोचना करते हुए कहा है कि दुर्खीम ने समाज को एक सार्वभौमिक अमूर्त तत्व के रूप में मान्यता देने की बजाय समाजों के आधार पर धर्म की व्याख्या की है। उनका कहना है कि विभिन्न समाज भिन्न-भिन्न प्रकार के धर्म को जन्म देते हैं, यह उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि इससे छोटे-छोटे समूहों के प्रति लोगों में अंधभक्ति की भावना उत्पन्न होती है और दूसरे समूह के प्रति कटुता पैदा हो सकती है।
ऐरन ने लिखा है कि इस स्थिति में धर्म का सार मनुष्यों के छोटे छोटे समूहों के प्रति अंध निष्ठा प्रेरित करना या प्रत्येक व्यक्ति की समूह के प्रति आस्था की और उसके फलस्वरूप अन्य समूहों के प्रति विरोध की शपथ लेना होगा।" ऐरन के अनुसार धर्म का यह कार्य समाजशास्त्र की विषय-वस्तु समाज की वास्तविकता का अपमान करना होगा।
1. सोरोकिन का मत है कि दुर्खीम ने धर्म की उत्पत्ति में सामाजिक संपर्क को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया है और प्राणीशास्त्री कारकों की अवहेलना की है। सामाजिक संपर्क मनुष्य की विशिष्ट शारीरिक संरचना का ही परिणाम है। सोरोकिन कहते हैं कि दुर्खीम ने सामाजिक एकत्रीकरण से उत्पन्न उत्तेजनात्मक कार्यक्रमों से प्रतिनिधि विचारों की उत्पत्ति मानी है और यह सामूहिक कार्यक्रम मौसम के अनुसार होते हैं। इस प्रकार से तो जलवायु एवं भौगोलिक कारक विचारों की उत्पत्ति के लिए उत्तरदाई होते हैं।
2. सोरोकिन के अनुसार सामाजिक संपर्क मनुष्य की विशिष्ट शारीरिक संरचना का ही परिणाम है। उन्होंने लिखा है कि “चूहे और चिड़िया उतनी ही अंतःक्रिया कर सकती हैं जितनी तुम चाहो और फिर भी उनकी अंतःक्रियाएं धार्मिक प्रतिमानों अथवा अवधारणाओं जैसी कोई वस्तु उत्पन्न नहीं कर सकती।"
3. रॉबर्ट बीरस्टेट ने टोटमवाद की व्याख्या के अनावश्यक और उलझे हुए विस्तार की आलोचना की है। उन्होंने लिखा है कि यह अनेक पृष्ठों तक चलता है जिनमें से कुछ यह स्वीकार करना चाहिए,
विश्वास और विचार, संस्कार और अनुष्ठान के विस्तृत विवरण के कारण नीरस हो गए हैं। 4. हैरी एल्मर बार्न्स के अनुसार दुर्खीम की धर्म के संबंध में अनेक मान्यताएं निराधार है। ईश्वर और समाज एक नहीं है। सामूहिक क्रियाएं केवल संपर्क की घनिष्ठ और घनत्व के बढ़ने से पवित्रता को जन्म नहीं दे सकती। बार्न्स के अनुसार अधिकांश धार्मिक अनुभव एकांत चिंतन का परिणाम होते हैं।
5. दुर्खीम ईश्वर को समाज का प्रतिनिधि मानता है किंतु ईश्वर केवल मानव का ही नहीं प्रकृति का भी संचालक और नियंत्रक है। समाज में ईश्वर के तत्व होते हुए भी व्यक्ति ईश्वर के स्थान पर समाज की पूजा और आराधना नहीं करता है।
6. यह सही है कि सामूहिक उत्तेजना सामूहिक एकत्रीकरण के कारण होती है। सामूहिक उत्तेजना ही धार्मिक विचारों को जन्म देती है किंतु एकांत चिंतन और मनन तथा ईश्वर में ध्यान एवं लीन होना भी धर्म का एक अंग है। जिसे दुर्खीम स्वीकार नहीं करते।
उपरोक्त अनेक आलोचनाओं के बाद भी दुर्खीम का यह ग्रंथ उनकी समाजशास्त्री मान्यताओं की विस्तृत विवेचना है। हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि दुर्खीम के धर्म संबंधी विचारों में कुछ कमियां हैं परंतु हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि धर्म के सामाजिक पक्ष को उजागर करके दुर्खीम ने अद्वितीय कार्य किया है। उनका यह ग्रंथ समाजशास्त्रीय साहित्य में एक अनमोल निधि है। उनके द्वाराप्रकार्य वादी दृष्टिकोण की आधारशिला रखी गई है। यह ग्रंथ सामाजिक अनुसंधान के क्षेत्र में पथ प्रदर्शक ग्रंथ है।
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