सांस्कृतिक क्षेत्र - cultural area
सांस्कृतिक क्षेत्र - cultural area
उस भौगोलिक क्षेत्र को संस्कृहित क्षेत्र कहा जाता है जिसमें संस्कृति के तत्व व संकुल समान रूप से पाये जाते है। संस्कृति क्षेत्र की अवधारणा क्लार्क विश्रलर ने दी और बताया कि, "संस्कृति क्षेत्र एक भौगोलिक क्षेत्र है जिसमें समान संस्कृतियों वाले अनेक सापेक्षिक रूपसे स्वतन्त्र समुदाय रहते हैं" हर्स कोविट्स के शब्दों में, ‘‘उस क्षेत्र को जिसमें समान संस्कृतियाँ पायी जाती है, एक संस्कृति क्षेत्र कहलाता है। डा0 एस0सी0 दूबे लिखते हैं क, “कतिपय संस्कृति तत्व और संस्कृत संकुल एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र में फैलकर संस्कृति क्षेत्र का निर्माण करते हैं।
अतः परिभाषाओं की विवेचना से स्पष्ट है कि संस्कृति क्षेत्र का तात्पर्य एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र से है जहाँ पर समान संस्कृति तत्व व संकुल का विकास एवं प्रसार हुआ है। भिन्न-भिन्न संस्कृति क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न संस्कृतियाँ पायी जाती है। लेकिन कुछ ऐसे संस्कृति तत्व व संकुल है जो एक से अधिक संस्कृति क्षेत्रों में पायी जाती हैं।
चूंकि संस्कृति तत्व एवं संकुल में प्रसारित होने का गुण पाया जाता है अतः वह दूसरे संस्कृति क्षेत्रों के सम्पर्क में आकर उसकी विशेषताओं को ग्रहण कर लेती है। लेकिन उनके मूल स्वरूप की पहचान उने मूल संस्कृति क्षेत्र में ही की जा सकती है। बिसकर की मान्तय है कि प्रत्येक संस्कृति क्षेत्र में वह केन्द ढूँढ़ा जा सकता है जहाँ संस्कृति तत्व व संकुल का प्रसार हुआ है।
इसी आधार पर विसलर एवं क्रेबार महोदय ने अमेरिका के आदिवासी क्षेत्रों को 15 स्वतन्त्र संस्कृति क्षेत्रों में विभाजित किया। इसी तरह हर्स कोविट्स ने अफ्रीका को नौ संस्कृति क्षेत्रों में विभाजित किया। संस्कृति तत्वों के प्रसार में जंगल, पर्वत, रेगिस्तान, समुद्र आदि बाधाऐं है। जबकि यातायात के साधन एवं संचार सहायक है।
इस प्रकार संस्कृति क्षेत्र की अवधारणा से उन केन्द्रों को ज्ञात करना सरल हो जाता है। जहाँ संस्कृति तत्व एवं संकुल अपने मूल रूप में पाये जाते है। लेकिन यातायात एवं संचार साधनों के विकास ने संस्कृति तत्व तथा संकुल के प्रसार को इतना तीव्र कर दिया कि इसे किसी निश्चित भू-भाग तक सीमित रख पाना मुश्किल हो गया है।
(1) संस्कृति के प्रकार:
अपने विश्लेषण में भागबर्न ने संस्कृति को दो भागों में विभाजित कर संस्कृति का अध्ययन किया भौतिक संस्कृत एवं अभौतिक संस्कृति ।
(1) भौतिक संस्कृति - भौतिक संस्कृति के अन्तर्गत अगवर्न ने उन वस्तुओं को रखा जिसका निर्माण मानव द्वारा मूर्त रूप में किया गया। जिसे हम देख सकते हैं, छू सकते है तथा जिसका समान्यतः स्थान थी परिवर्तित हो सकता है जैसे- घर, घड़ी, पेन, पंखा, साइकिल, मोबाइल, रोबोट, मानव निर्मित उपग्रह आदि। भौतिक संस्कृति की संख्या आदिम एवं ग्रामीण समाज में कम एवं विकसित एवं नगरीय समाज में अधिक पायी जाती है। इस प्रकार भौतिक संस्कृति में निम्नलिखित विशेषताएँ होती है -
(1) भौतिक संस्कृति शीघ्र परिवर्तनीय होती है।
(2) भौतिक संस्कृति के बिना परिवर्तन के स्थानान्तरण किया जा सकता है।
(3) भौतिक संस्कृति मूर्त होती है इसलिये इसे मापा जा सकता है।
(4) भौतिक संस्कृति अधिक संचयी होती है।
(5) भौतिक संस्कृति को उपयोगिता एवं लाभ को सरलता से मापा जा सकता है।
(2) अभौतिक संस्कृतिः
संस्कृति का दूसरा पक्ष अभौतिक का है। अभौतिक संस्कृति के अन्तर्गत ऐसी संस्कृति आती है जिसे हम देख नहीं सकते, छू नहीं सकते यह अमूर्त होती है, जैसे-धर्म, रीति-रिवाज रूढ़ियां, आचार-विचार आदि। हालाकि मैकाइवर जैसे कुछ विद्वान अभौतिक पक्ष को ही वास्तविक संस्कृति मानते हैं। सोरोकिन ने इसे भावात्मक संस्कृति कहा। अतः अभौतिक संस्कृति की निम्नलिखित विश्लेषताएँ है -
1. यह अमूर्त होती है; अतः इसे मापना कठिन होता है;
2. अभौतिक संस्कृति जटिल होती है;
3. इसमें परिवर्तन बहुत कम व धीमी गति से होता है।
4. अभौतिक संस्कृति का संबंध मानव के आध्यात्मिक तथा आन्तरिक जीवन से होता है।
5. संस्कृति प्रसार के दौरान अभौतिक संस्कृति को उसी रूप में स्थानान्तरण व ग्रहण नहीं किया जा सकता।
6. अभौतिक संस्कृति की उपयोगिता एवं लाभ को मापा नहीं जा सकता।
इस प्रकार आगर्बन ने भौतिक एवं अभौतिक विवरण के माध्यम से एक सम्पूर्ण संस्कृति को व्याख्या करने का प्रयास किया और अपने पुस्तक वबपंस बदहम (1922) में सांस्कृतिक विलम्बना का सिद्धांत प्रतिपादित किया। जिसके अनुसार जब भौतिक संस्कृति की तुलना में अभौतिक संस्कृति परिवर्तन के दौड़ में पीछे रह जाती है तो ऐसी दशा सांस्कृतिक विलम्बना कहलाती है। सन् 1947 में अपनी पुस्तक में आगबर्न ने सांस्कृतिक विलम्बना की परिभाषा में कुछ परिवर्तन करते हुये कहा कि सांस्कृतिक विलम्बना वह तनाव है जो तीव्र और असमान गति से परिवर्तित होने वाली संस्कृति की दो परस्पर सम्बन्धित भागों में विद्यमान होता है।” इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि भौतिक संस्कृति की अपेक्षा अभौतिक संस्कृति में कम परिवर्तन होने की स्थिति को ही हम सांस्कृतिक विलम्बना नहीं कहते बल्कि संस्कृति के दो भागों में से किसी एक के आगे निकल जाने की स्थिति को सांस्कृतिक विलम्बना कहा जाता है।
अमरीकी मानवशास्त्री विद्वान लिटन ने अपनी पुस्तक में संस्कृति के तीन प्रकारों की चर्चा की जो इस प्रकार है -
(1) सांस्कृतिक सार्वभौमः
समाज में कुछ ऐसे सांस्कृतिक तत्व होते है जो समाज के सभी सदस्यों के लिए समान रूप से आवश्यक होते हैं, जिसमें समाज के सभी लोग सहभागी होती है तथा सभी के लिए समान महत्व के होते हैं, उन्हें ही सांस्कृतिक सार्वभौम कहा जाता है। जैसे-झूठ न बोलना, बड़ों का सम्मान करना, चोरी न करना गरीबों की मदद करना आदि।
(2) सांस्कृतिक विकल्प:
जब कभी समाज में किसी आचरण व कार्य व्यवहार के लिएएक से अधिक आचरणों को स्वीकृति प्राप्त होती है तो उसे सांस्कृतिक विकल्प कहते है। सांस्कृतिक विकल्प प्रायः उस समाज की संस्कृति की विशेषता होती है जो, भिन्न-भिन्न संस्कृतियों को पराश्रय देता है। जैसे अमेरिका की संस्कृति एवं भारत आदि की संस्कृति। यहाँ पर किसी को सम्मान देने के लिए हिन्दू हाथ जोड़कर प्रणाम करता है, मुस्लिम हाथ उठाकर सलाम करता है।
यहाँ विवाह चाहे कोर्ट में हो, मंदिर में हो या गिरजाघर में हो समाज सभी को बराबर मान्यता देता है। इस प्रकार व्यक्तियों को जब सांस्कृतिक तत्वों के चयन की आजादी होती है तो लिटन ने उसे ही सांस्कृति विकल्प कहा।
(3) सांस्कृतिक विशिष्टताएँ
वृहद संस्कृति के अन्तर्गत छोटी-छोटी उप संस्कृतियाँ पायी जाती है जिसमें समाज के सभी लोग समान रूप से भागीदारी नहीं करते, उन्हीं उप संस्कृतियों को लिटन ने सांस्कृतिक विशिष्टाएँ कहते हैं। जैसे एक ही समाज में रहने वाले हिन्दू, मुस्लिम एवं सिक्ख, ईसाई आदि की पूजा, उपासना तथा इबादत का तरीका अलग-अलग होता है। जो इनकी उप-संस्कृतियों के आधार पर होता है।
इस प्रकार स्थिरता, परिवर्तनशीलता, प्रसार तथा प्रकार्य के आधार संस्कृतियों का विभाजन विभिन्न विद्वानों ने किया जो हमारे संस्कृति सम्बन्धी अध्ययन को आधार प्रदान करते हैं।
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