डार्विन का उद्विकासीय सिद्धांत - Darwin's Theory of Evolution

  डार्विन का उद्विकासीय सिद्धांत - Darwin's Theory of Evolution


सामाजिक उद्विकास का सिद्धांत डार्विन के उद्विकासवाद पर आधारित है। समाजशास्त्र में उद्विकास की अवधारणा प्राणीशास्त्र से ग्रहण की गई है। 1859 में डार्विन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज का प्रकाशन किया इसमें उन्होंने जीवो की उत्पत्ति के बारे में उद्विकासीय सिद्धांत का प्रतिपादन किया। अब तक यह धारणा चली आ रही थी कि पेड़ पौधे और जीव-जंतुओं की सृष्टि ईश्वर ने की है। किंतु डार्विन ने अपने लंबे समय के अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष दिया कि प्राणियों का उद्विकास सरलता से जटिलता एवं समानता से भिन्नता की ओर हुआ है। प्रारंभ में पृथ्वी पर कोई भी जीव नहीं थे। विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के कारण जीवो का जन्म हुआ। आरंभिक अवस्था में जीव एक कोशिकीय थे।

धीरेधीरे उनकी शरीर संरचना में परिवर्तन हुआ, उनमें भिन्नता आती गई और विभिन्न अंग पृथक हुए। डार्विन का मत है कि प्रारंभ में जीव बहुत सरल कोटि का होता है। उसके विभिन्न अंगों में अनिश्चित संबद्धता होती हैं। जिसे पहचाना नहीं जा सकता और न ही पृथक किया जा सकता है। पर उसमें धीरेधीरे परिवर्तन दिखाई देने लगता - है। उद्विकास का यह प्रथम चरण है जिसमें सरलता, अस्पष्टता एवं अभिन्नता धीरेधीरे जटिलता स्पष्टता एवं संबद्धता में बदल जाती है। जीव के उद्विकास के दूसरे चरण में विभिन्न अंग अलग-अलग कार्य करने लगते हैं और उनमें श्रम विभाजन भी पैदा हो जाता है। यह अंग एक दूसरे पर पड़ने वाले प्रभाव को भी प्रभावित करते हैं। उद्विकास की यह प्रक्रिया निरंतर एवं धीमी गति से विभिन्न चरणों में होती है। इसलिए नया रूप सामने आने पर ही परिवर्तन ज्ञात होता है। उद्विकास के दौरान वस्तु के आंतरिक गुणों में भी परिवर्तन आ जाता है।


उद्विकास की विचारधारा से संबंधित डार्विन के सिद्धांत को समझने से स्पष्ट होता है कि इसमें 5 बातों की प्रधानता होती है।


1. प्रत्येक जीवित प्राणी सरलतम प्रारंभिक अवस्था से जटिलतम अवस्था की ओर बढ़ता जाता है।


2. विभिन्नीकरण की प्रक्रिया द्वारा जैसेजैसे स्वरूप निश्चित होता जाता है। वैसे ही उन अंगों के कार्य भी निश्चित होते जाते हैं।


3. विभिन्नता होने पर भी सभी अंग परस्पर संबंधित रहते हैं। इनमें अंतर्संबंध और आत्मनिर्भरता बनी रहती है।


4. निरंतरता उद्विकास का प्रमुख आधार है।



5. प्रत्येक पदार्थ एक निश्चित स्तर से होता हुआ अपनी पूर्व अवस्था को प्राप्त करता है। जैसे मनुष्य जन्म के पश्चात शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था को प्राप्त करता हुआ अंत में मृत्यु को प्राप्त करता है।