प्रत्यक्षवाद की परिभाषाएं , प्रत्यक्षवाद के आधार - Definitions of Positivism, Basis of Positivism
प्रत्यक्षवाद की परिभाषाएं , प्रत्यक्षवाद के आधार - Definitions of Positivism, Basis of Positivism
प्रत्यक्षवाद को निम्नलिखित विद्वानों ने इस प्रकार परिभाषित किया है। अगस्त कॉम्ट के अनुसार "निरीक्षण, परीक्षण, वर्गीकरण आदि पर आधारित वैज्ञानिक विधियों के द्वारा सामाजिक घटनाओं का अध्ययन कर उनका विश्लेषण करना एवं उन घटनाओं को संचालित एवं निर्देशित करने वाले निश्चित नियमों का पता लगाना ही प्रत्यक्षवाद कहलाता है।"
रेमंड एरन (Raymond Aron) के अनुसार प्रत्यक्षवाद का संबंध घटनाओं के निरीक्षण उसके विश्लेषण तथा उसके परस्पर संबंधों को विनियमित करने वाले नियमों की खोज करने से है।”
चैम्बलीस (Chamblis) के अनुसार कॉम्ट का प्रत्यक्षवाद अत्यंत अमूर्त धारणा है। धर्म, लोकतंत्र, रूढ़ियां आदि अन्य ऐसी ही अमूर्तताओं की भांति इससे अधिक स्पष्ट अर्थ नहीं हो सकता है।”
“प्रत्यक्षवाद का संबंध काल्पनिक की अपेक्षा वास्तविक जगत से है। समस्त ज्ञान की अपेक्षा उपयोगी ज्ञान से है। उन तथ्यों से है जिनका अवलोकन निश्चित रूप से संभव हो सके।
यह विस्तृत अस्पष्ट भावों की अपेक्षा संक्षिप्त ज्ञान से निरपेक्ष की अपेक्षा सापेक्ष से संबंधित है।”
एम. डब्लू. वाने (M.W.Vine) के अनुसार प्रत्यक्षवाद का वैज्ञानिक अर्थ होता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि निरीक्षण, परीक्षण एवं वर्गीकरण आदि पर आधारित वैज्ञानिक विधियों के द्वारा घटनाओं का अध्ययन एवं विश्लेषण करना तथा उन घटनाओं को प्रचलित एवं निर्देशित करने वाले निश्चित नियमों का पता लगाना ही प्रत्यक्षवाद है।"
अगस्त कॉम्ट ने अपने सिद्धांत में बताया कि तथ्यों के बाहर किसी भी घटना का विवेचन नहीं करना चाहिए। उन्हीं घटनाओं को अपने अध्ययन में शामिल करना चाहिए जिनका परीक्षण करना संभव हो। कॉम्ट के अनुसार स्वर्ग-नर्क, आत्मा-परमात्मा ऐसे तथ्य हैं। जिसकी सत्यता को न तो सिद्ध किया जा सकता है और न ही अस्वीकार किया जा सकता है। प्रत्यक्षवाद ऐसी घटनाओं से दूर रहने की प्रेरणा देता है। कॉम्ट के अनुर प्रत्यक्षवाद वैज्ञानिक विचारधारा ही नहीं बल्कि वह एक धर्म भी है।
अगस्त कॉम्ट ने प्रत्यक्षवाद को धर्म के रूप में भी परिभाषित किया है। कॉम्ट के अनुसार प्रत्यक्षवाद मानवता का एक धर्म है।
कॉम्ट का प्रत्यक्षवाद को मानवता का धर्म कहने के पीछे तर्क यह है कि जो धर्म का उद्देश्य है वही प्रत्यक्षवाद का उद्देश्य है। धर्म का सबसे महत्वपूर्ण कार्य या उद्देश्य जनता के सम्मुख कुछ नैतिक नियमों को प्रस्तुत करना है। जिसके आधार पर समाज के सदस्य एक सूत्र में बंध जाए तथा समाज में नैतिकता पनप सके। यह एकता या नैतिक विकास तभी संभव होगा। जब जनता का बौद्धिक स्तर या ज्ञान का स्तर ऊंचा होगा। जनता का बौद्धिक स्तर तब ऊंचा होगा। जब प्रत्यक्षवाद के आधार पर लोग घटनाओं का वर्णन करेंगे तथा प्रत्यक्षवाद के सिद्धांत में विश्वास करेंगे। अतः प्रत्यक्षवाद लोगों में ज्ञान की वृद्धि कर उन्हें एकता के सूत्र में बांधने में सहायक होगा।”
कॉम्ट के अनुसार प्रत्यक्षवाद हमारी प्रगति का आधार है। इनके अनुसार मानव की प्रगति के लिए यह आवश्यक है कि लोग एकता के सूत्र में बंध जाएं।
जब मानव के ज्ञान के स्तर में वृद्धि होगी। लोगों के ज्ञान के स्तर में वृद्धि प्रत्यक्षवाद के आधार पर ही हो सकती है। प्रत्यक्षवाद एक वैज्ञानिक विचारधारा के साथ ही साथ मानवता का धर्म भी है। इसका उद्देश्य मनुष्य का अधिक से अधिक कल्याण करना है। कॉम्ट ने संपूर्ण मानव समाजों के विकास एवं विशिष्ट रूप में यूरोप के राष्ट्रों के सर्वांगीण विकास के लिए प्रत्यक्षवाद की अवधारणा को विकसित किया। प्रत्यक्षवाद यह बताता है कि केवल भौतिक प्रगति से ही मानव का कल्याण नहीं हो सकता बल्कि मानव के कल्याण के लिए भौतिक, बौद्धिक एवं नैतिक विकास आवश्यक है।
प्रत्यक्षवाद के आधार
अगस्त कॉम्ट समाजशास्त्र को प्रत्यक्षवादी विज्ञान की तरह स्थापित किया है। उनके अनुसार प्रत्यक्षवाद के निम्न आधार होते हैं
1. समाज में जिस तरह प्राकृतिक घटनाओं की गतिविधियों के अध्ययन के लिए प्राकृतिक विज्ञान है। ठीक उसी तरह सामाजिक घटनाओं को समझने के लिए भी समाजशास्त्र जैसा विज्ञान होना चाहिए । मानव समाज की आदिम अवस्था से वर्तमान सभ्य अवस्था तक की प्रगति के नियमों की खोज प्रत्यक्षवाद ही करता है।
2. सामाजिक घटनाओं को हम ईश्वर परक विधियों से नहीं समझ सकते एवं तात्विक सिद्धांत भी इन्हें समझने में पूर्णता सफल नहीं होते हैं। इसलिए सामाजिक घटनाओं के विश्लेषण में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग ही लाभदायक हो सकता है इसलिए समाजशास्त्र का प्रत्यक्षवादी होना आवश्यक है।
3. प्रत्यक्षवाद कभी भी तथ्यों से अलग नहीं होता इसके लिए किसी भी विश्लेषण में तथ्यों का स्थान महत्वपूर्ण होता है। सिद्धांत कभी भी तथ्यों के अनुगामी नहीं होते सिद्धांत गौण होते हैं और तथ्य प्राथमिक होते हैं।
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