वर्ग का निर्धारण आर्थिक आधार पर - Determination of class on economic basis
वर्ग का निर्धारण आर्थिक आधार पर - Determination of class on economic basis
वर्ग की अवधारण से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण व सहज प्रश्न यह है कि क्या वर्ग केवल आर्थिक आधारों पर ही निर्धारित किए जाते हैं? कार्ल मार्क्स जैसे समाजशास्त्रियों ने आर्थिक आधारों को ही वर्ग के निर्धारण में मूलभूत तथा अकेला आयाम माना है। मार्क्स के अनुसार वर्ग के निर्माण व निर्धारण में उत्पादन प्रणाली तथा उत्पादन के साधन उत्तरदायी होते हैं। जिन व्यक्तियों का उत्पादन के साधनों व प्रणाली पर आधिपत्य रहता है वे लोग ही पूंजीपति तथा अमीर वर्ग से संबन्धित रहते हैं तथा जिन लोगों का उत्पादन प्रणाली व उत्पादन के साधनों पर आधिपत्य नहीं रहता है वे लोग अपना श्रम बेचकर जीवनयापन करने को विवश रहते हैं तथा श्रमिक और गरीब वर्ग में शामिल रहते हैं। हालांकि कार्ल मार्क्स ने एक तीसरे वर्ग; कृषक वर्ग की अवधारणा को भी प्रस्तुत किया है।
किन्तु मार्क्स ने आर्थिक दृष्टि से केवल दो वर्गों को ही स्पष्ट किया है - बुर्जुआ तथा सर्वहारा वर्ग। ये दोनों वर्ग क्रमशः शोषक तथा शोषित वर्ग होते हैं। सर्वहारा वर्ग में वर्ग चेतना के जन्म लेने के पश्चात वह इस शोषण के विरुद्ध आवाज उठाता है तथा बुर्जुआ वर्ग के विरुद्ध वर्ग संघर्ष का संखनाद करता है। मार्क्स का मानना है कि अंततः सर्वहारा वर्ग इस वर्ग संघर्ष में विजयी होता है तथा एक नए वर्गविहीन राज्य की स्थापना होती है।
हालांकि इस इकाई के आरंभ में ही यह स्पष्ट किया जा चुका है कि वर्ग की अवधारणा मात्र आर्थिक आधारों पर ही सीमित नहीं है। इसके निर्धारण में सामाजिक-सांस्कृतिक आधार भी उतने ही सहभागी हैं जितने कि आर्थिक आधार बिसेंज तथा बिर्सेज द्वारा मकान के प्रकार, पड़ोस, आय के स्रोत आदि आधारों को भी वर्ग के निर्माण में आवश्यक माना गया है। आधुनिक समाजों में व्यक्ति अपने उपयोग से अधिक विलासिता व दिखावे की वस्तुओं की ओर अधिक आकर्षित हुआ है
तथा ये वस्तुएँ उसके जीवन व्यवहार तथा रहन-सहन को अभिव्यक्त करती हैं, जैसे- टेलीविज़न, मोबाइल, रेडियो, फ्रिज, ए.सी. कर, मोटर गाड़ी आदि। ये सभी वर्ग के निर्धारण में उल्लेखनीय भूमिका निभाते हैं।
उक्त वर्णित भौतिक वस्तुओं के इतर व्यक्ति के स्वनिर्धारित मापदंड भी आवश्यक होते हैं। अर्थात् व्यक्ति स्वयं को किस वर्ग में रखना चाहता तथा किस वर्ग से दूर रहना चाहता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी शिक्षक से पूछा जाय कि वह किस वर्ग में स्वयं को रखना चाहेगा तो संभवतः वह मध्य वर्ग में रहना सहज समझेगा। भले ही उस शिक्षक कि आय 30 हजार हो तथा उसकी मूलभूत आवश्यकताएँ बमुश्किल ही पूरी हो रही हों। इसके विपरीत यदि किसी छोटे दुकानदार से यही सवाल पूछा जाय तो संभवतः वह स्वयं को निम्न वर्ग में ही रखना उचित समझेगा, भले ही वह महीने में एक लाख कमा लेता हो तथा विभिन्न प्रकार की सुख-सुविधाओं का लाभ लेता हो।
प्रत्येक वर्ग की एक सामाजिक प्रस्थिति तथा विशिष्ट संस्कृति होती है तथा उसी प्रस्थिति के अनुरूप उसे सुविधाएं तथा जीवन अवसर प्राप्त होते हैं। ये जीवन अवसर ही उस वर्ग से जुड़े व्यक्ति की वृद्धि अथवा हानि को तय करते हैं। मैक्स वेबर ने इसी प्रस्थिति समूह को वर्ग के निर्धारण में अत्यंत आवश्यक माना है। वेबर ने स्पष्ट कहा है कि जीवन अवसर तथा जीवन शैली ही वर्गों को निर्धारित करते हैं तथा इन्हीं आधारों पर एक वर्ग का अस्तित्व तथा पहचान दूसरे वर्ग से पृथक रहता है।
हार्टन तथा हंट ने वर्ग को निर्धारित करने वाले कारकों में आय, संपत्ति, शिक्षा, व्यवसाय तथा वर्ग प्रस्थिति आदि से संबन्धित व्यक्ति विशेष के अभिज्ञान को आवश्यक मानते हैं। वही वार्नर का मत है कि यदि मात्र आर्थिक कारकों द्वारा वर्गों का निर्धारण होता तो संभवतः कई वर्गों का जन्म ही नहीं होता। वार्नर ने कुल छः प्रकार के वर्गों का उल्लेख किया है
1. उच्च उच्च वर्ग
2. उच्च निम्न वर्ग
3. मध्य उच्च वर्ग
4. मध्य निम्न वर्ग
5. निम्न उच्च वर्ग
6. निम्न निम्न वर्ग
पश्चिमी समाजों के अध्ययन के आधार पर एंथोनी गिडेंस ने तीन वर्गों की व्याख्या की है
1. उच्च वर्ग
2. मध्य वर्ग
3. निम्न वर्ग
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