भारत में औपचारिक समाजशास्त्रीय चिंतन का विकास - Development of formal sociological thought in India

 भारत में औपचारिक समाजशास्त्रीय चिंतन का विकास - Development of formal sociological thought in India


भारत में समाजशास्त्र के औपचारिक विकास को दो भागों में बाट कर आसानी से अध्ययन किया जा सकता है।


1. औपनिवेशिक भारत में समाजशास्त्र का विकास


2. स्वतंत्र भारत में समाजशास्त्र का विकास


औपनिवेशिक भारत में समाजशास्त्रीय चिंतन का विकास 


समाजशास्त्र एक नवीन विज्ञान है। 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अमेरिका, फ्रांस आदि देशो में समाजशास्त्र का एक विज्ञान के रूप में व्यवस्थित विकास प्रारम्भ हो चुका था। इंग्लैंड में एक स्वतंत्र विषय के रूप में समाजशास्त्र का विकास सन् 1907 से प्रारम्भ उस समय भारत इंग्लैंड औपनिवेशिक देश था, जिसके माध्यम से भारत में पाश्चात्य सामाजिक, शैक्षिक एवं वैज्ञानिक मूल्यों को तेजी से विकास हो रहा था।

यही कारण है भारत में प्रारम्भिक समाजशास्त्र के विकास पर इंग्लैंड एवं अन्य पाश्चात्य देशों का प्रर्याप्त प्रभाव दिखाई पड़ता है। भारत में सर्वप्रथम सन् 1914 में बम्बई विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के साथ स्नातक स्तर पर समाजशास्त्र का अध्ययन एवं अध्यापन कार्य प्रारम्भ हुआ। सन् 1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में बृजेन्द्रशील के प्रयत्नों से अर्थशास्त्र के साथ समाजशास्त्र का अध्ययन शुरू हुआ। राधा कमल मुखर्जी, विनय कुमार, डी. एन. मजूमदार तथा प्रो. निर्मल कुमार बोस जैसे प्रतिभाशाली विद्वान बृजेन्द्र शील के ही विद्यार्थी थे। सन् 1919 में बिट्रिश समाजशास्त्री प्रो. पैट्रिक गीड्स के अध्यक्षता में मम्बई विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम स्वतंत्र रूप से समाजशास्त्र विभाग की स्थापना हुई और स्नातकोत्तर स्तर पर समाजशास्त्र का अध्ययन कार्य शुरू हुआ। इसी लिए प्रो. पैट्रिक गीड्स को भारतीय समाजशास्त्र का जनक भी कहा जाता है। सन् 1921 में लखनऊ विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के अन्तर्गत समाजशास्त्र का अध्ययन शुरू हुआ जिसके प्रथम अध्यक्ष राधा कमल मुखर्जी थे। जो मूल रूप से अर्थशास्त्री थे। सन् 1922 में इस विभाग से प्रो. डी.पी. मुखर्जी भी जुड़ गये।

सन् 1928 में प्रमुख मानवशास्त्री एवं समाजशास्त्री डी.एन. मजूमदार भी लखनऊ विश्वविद्यालय से जुड़ गये। सन् 1924 में बम्बई विश्वविद्यालय में प्रो. पैट्रिक गीड्स के बाद उन्हीं के शिष्य डॉ. जी.एस. घुरिये समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष बने। सन् 1934 में इन्हें यही भारत में समाजशास्त्र का प्रथम प्रोफेसर होने का गौरव प्राप्त हुआ। इन्होंने भारत मे समाजशास्त्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया इसीलिए जी.एस. घुरिये को भारत में समाजशास्त्र का जनक (भारतीय समाजशास्त्री) कहा जाता है। एम.एन. निवास, आई.पी. देसाई, के.एम. कपाड़िया, ए.आर. देसाई, एम.एस.ए. राव, वाई. वी. दामले, इरावती कर्बे आदि जैसे प्रमुख समाजशास्त्री इन्हीं के शिष्य रहे। ए. आर. वाडिया के नेतृत्व में सन् 1928 में मैसूर विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर पर भारत में सर्वप्रथम समाजशास्त्र का एक स्वतंत्र विषय के रूप में मान्यता प्राप्त हुआ। सन् 1939 में पूना विश्वविद्यालय में मती इरावती कर्बे की अध्यक्षता में समाजशास्त्र विभाग की स्थापना हुई।


इस तरह औपनिवेशिक भारत में एक विषय के रूप समाजशास्त्र भले ही स्थापित हो चुका था। परन्तु इस पर पाश्चात्य समाजशास्त्रीय चिंतन का स्पष्ट प्रभाव होने के साथ-साथ इसके विकास की गति अत्यन्त धीमी रही। इस काल समाजशास्त्र एक स्वतंत्र एवं प्रचलित विषय के रूप में सामने नहीं आ पाया इसका अध्ययन किसी न किसी रूप में अर्थशास्त्र, मानवशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र से सम्बद्ध रहा।


स्वतंत्र भारत में समाजशास्त्रीय चिंतन का विकास


सन् 1947 के बाद स्वतंत्र भारत में समाजशास्त्र का विकास अन्य सामाजिक विषयों से अलग तेजी से हुआ। प्रो. नार्मदेश्वर प्रसाद के अध्यक्षता में सन् 1953 में पटना विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग की स्थापना हुई। सन् 1959 में दिल्ली विश्वविद्यालय में स्वतंत्र रूप से समाजशास्त्र विभाग की स्थापना भारत के प्रसिद्ध समाजशास्त्री एम.एन. निवास की अध्यक्षता में हुई इसी तरह देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में एक व्यवस्थित स्वतंत्र विषय के रूप में समाजशास्त्र का विकास हुआ। वर्तमान समय में भारत के लगभग सभी महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्र का अध्ययन एवं अध्यापन कार्य हो रहा है।


भारत में समाजशास्त्र के उद्भव एवं विकास के संबंध में अनेक समाजशास्त्रीयों ने अपना-अपना विचार रखा। जिसका प्रारिम्भक प्रयास डी.पी. मुखर्जी तथा विनय कुमार सरकार ने किया। डी.पी. मुखर्जी के अनुसार भारत की परंपराएं इतनी समृद्धि है कि उनका अध्ययन करके पश्चिमी देशों से कहीं अधिक प्रभावशाली सिद्धांत विकसित किये जा सकते है। विनय कुमार सरकार भी भारत के लिए पृथक समाजशास्त्र चाहते थे क्योंकि इनका मानना था कि भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के प्रति पश्चिमी विचारको के विचार हमेशा पक्षपातपूर्ण रहे है। इसके साथ-साथ निवास, इरावती कर्वे, टी. एन. मदान, योगेन्द्र सिंह, लुई ड्यूमा, आंद्रे वेत्तई, डी. एन धनागरे आदि समाजशास्त्रीय ने इस मत का समर्थन किया है कि भारत में प्रभावशाली समाजशास्त्रीय सिद्धांत तभी बनाये जा सकते है जब वे विशेष रूप से भारतीय सामाजिक परिपेक्ष्य के अध्ययन पर आधारित हो। लुई ड्यूँमा एवं डी. एफ पोकाक ने कन्ट्रीव्यूशन टू इंण्डियन सोशियोलाजी नामक अकादमिक जनरल प्रकाशित किया। रामकृष्ण मुखर्जी ने 'सोशियोलाजी ऑफ इण्डियन सोशियोलाजी' योगेन्द्र सिंह ने सन् 1986 में इण्डियन सोशियोलाजी, टी.के. उमेन तथा पार्थनाथ मुखर्जी ने इण्डियन सोशियोलॉजी नामक पुस्तक लिखी जिसमें भारत में समाजशास्त्र के विकास को समझाने का प्रयास किया गया है।

इन विद्वानों के विचारों से यह मत उभर कर सामने आया कि क्या अमेरिका का समाजशास्त्र, फ्रांस का समाजशास्त्र, इंग्लैंड का समाजशास्त्र की तरह भारत का एक अलग समाजशास्त्र होगा अथवा सार्वभौमिक समाजशास्त्र की तरह भारतीय संस्करण होगा। टी. के. एन. उन्नीथान ने ए न्यू सोशियोलाजी फार इण्डिया' नामक पुस्तक लिखकर इस मुद्दे पर अपना विचार रखा कि भारत का एक अलग समाजशास्त्र होना चाहिए। भारत में सन् 1994 में विश्व समाजशास्त्र परिषद का सम्मेलन हुआ जिसमें टी. के. ऊमन को अध्यक्ष बनाया गया। वर्तमान समय में समाजशास्त्र केवल अध्ययन अध्यापन के दृष्टि से ही एक महत्वपूर्ण विषय नहीं है बल्कि इसके शोध कार्यों को भी व्यापक रूप से मान्यता मिलने लगी है। भारत में वर्तमान समाजशास्त्रीय विकास का माडल इंग्लैंड की तुलना में अमेरिका से अधिक प्रभावित है। वर्तमान समय में समाजशास्त्र के नयीं-नयीं शाखाओं का तेजी से विकास ही नहीं हो रहा बल्कि उन अध्ययनों को भी महत्व दिया जाने लगा है जो व्यावहारिकता पर आधारित है। सरकारें अपनी योजनाओं को चलाने के लिए समाजशास्त्रीय अध्ययन का सहारा ले रहे है। देश के विविध प्रविधिक संस्थाओं में भी समाजशास्त्र विषय को इस कारण मान्यता दी गयी है जिससे प्रविधिक शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थी अपने समाज तथा संस्कृति से परिचित हो सके इस तरह वर्तमान समय में समाजशास्त्र विषय की लोकप्रियता एवं उपयोगिता तेजी के साथ बढ़ती जा रही है।