भारत में समाजशास्त्रीय चिंतन का विकास - Development of Sociological Thought in India

 भारत में समाजशास्त्रीय चिंतन का विकास - Development of Sociological Thought in India


समाजशास्त्र समाज का तार्किक अध्ययन करने वाला विज्ञान है। भारत में इस चिंतन के औपचारिक उद्भव एवं विकास को समझने के लिए आवश्यक है कि भारत के सामाजिक चिंतन की उस प्रणाली को ठीक ढंग से समझा जाय जो परंपरागत रूप से भारतीय समाज में विद्यमान रहा है पर लागू करते हुए कहा जा सकता है कि भारत में समाजशास्त्र का उद्भव भले ही नया हो लेकिन इसका इतिहास काफी पुराना है। इस तरह भारत में समाजशास्त्र के उद्भव एवं विकास को दो अवस्थाओं में बाट कर असानी से समझा जा सकता है। पहला अनौपचारिक अवस्था दूसरा में औपचारिक अवस्था । 4.1.3.1. भारत में अनौपचारिक सामाजिक चिंतन का विकास मनुष्य प्रकृति रूप से एक बौद्धिक प्राणी है।

बुद्धि मनुष्यों में जिज्ञासा उत्पन्न करती है, जिज्ञासा विचार और चिंतन को जन्म देता है। यह चिंतन शून्य में ना होकर किसी न किसी परिवेश में घटित होता है। यह परिवेश प्राकृतिक, अप्राकृतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि कुछ भी हो सकता है। सामाजिक चिंतन के लिए विशेष रूप में सामाजिक परिवेश का होना आवश्यक है। जो मनुष्य के सामाजिक प्राणी बनने के साथ ही निर्मित हो चुका था। इस तरह सामाजिक चिंतन का विकास समाज के विकास के साथ ही शुरू हो गया था। भारत एक प्रचीनतम सभ्यता वाला देश है जहां प्राचीन काल से ही सामाजिक चिंतन प्रारम्भ हो गया था। प्रारम्भिक अवस्था में यह चिंतन लोक कथाओं, लोक वार्ताओं, लोक गाथाओं आदि के रूप में था। लेकिन जैसे-जैसे समाज आगे बढा सामाजिक चिंतन अधिक व्यवस्थित होता गया। भारत में सामाजिक चिंतन के विकास का इतिहास लम्बा और विविधतापूर्ण है।

जिसको समझने में सरलता की दृष्टि से निम्न प्रमुख भागों में बाट कर अध्ययन किया जा सकता है। 

1. प्राचीनतम सामाजिक चिंतन


2. वैदिक कालीन सामाजिक चिंतन


3. मध्यकालीन सामाजिक चिंतन


4. आधुनिक सामाजिक चिंतन