समाजशास्त्र का विकास , development of sociology

 समाजशास्त्र का विकास , development of sociology

समाजशास्त्र भले ही एक नया विज्ञान है। लेकिन इसका इतिहास काफी पुराना है, बीरस्टीड इस कथन के आधार पर समाजशास्त्र के विकास का अध्ययन किया जाय तो समाजशास्त्र के विकास के दो स्वरूप सामने आते है। पहला समाजशास्त्र का अनौपचारिक विकास दूसरा समाजशास्त्र औपचारिक विकास। 


समाजशास्त्र का अनौपचारिक विकास 

जब से सामाजिक घटनाओं का अध्ययन व्यस्थित ढंग से शुरू हुआ तभी से समाजशास्त्र के अनौपचारिक विकास का प्रारम्भ हो गया था। प्राचीन यूरोपीय समाजिक विचारक प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपाब्लिक (427-347 ई0 पूर्व) तथा अरस्तु ने इथिक्स एंड पॉलिटिक्स (384-322 ई0 पू0) में सामाजिक करते हुए जीवन से सम्बन्धित विभिन्न समस्याओं एवं घटनाओं का व्यवस्थित विवरण प्रस्तुत परिवारिक जीवन, रीति-रिवाजे, परम्पराओं, स्त्रियों की स्थिति, सामाजिक संहिताओं (कानून) एवं राज्य आदि का विस्तृत वर्णन किया है।

परन्तु उनका यह प्रयत्न वैज्ञानिक कम धार्मिक एवं दार्शनिक अधिक था। सामाजिक चिंतन में लम्बे समय तक धर्म एवं दर्शन का प्रभाव रहा लेकिन 13 वीं शताब्दी तक सामाजिक समस्याओं को तार्किक ढंग से समझने का प्रयत्न किया जाने लगा और धीरे-धीरे सामाजिक घटनाओं के अध्ययन में तर्क का महत्व बढ़ता गया। थामस एक्यूनस तथा दान्ते ने मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी माना और समाज का व्यवस्थित ढंग से संचालित करने की सरकार के आवश्यकता पर जोर दिया। एक्यूनस ने सामाजिक सहयोग, न्याय, ईश्वर, श्रद्धा, एकता आदि का अध्ययन किया। इस काल में यह माना जाने लगा कि सामाजिक घटनाओं एवं सामाजिक परिवर्तन के पीछे कुछ निश्चित नियम कार्य करते है लेकिन इन नियमों को समझने के लिए किसी वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग इस सामाजिक काल तक नहीं हो पाया। 15 वीं शताब्दी तक यूरोपीय समाज में सामाजिक घटनाओ के अध्ययन में तार्किक एवं वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग प्रारम्भ हुआ जिससे सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षो सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि से स्वतंत्र रूप से चिंतन किया जाने लगा। परिणाम स्वरूप विशिष्ट सामाजिक विज्ञानों जैसे अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीतिशास्त्र, इतिहास आदि का विकास हुआ। प्रबोधन काल के समय बौद्धिक चिंतन में प्रबलता आयी हाब्स, लॉक, तथा रूसो ने सामाजिक समझौते का सिद्धांत दिया

वाल्टेयर तथा मान्टेस्क्यू ने तार्किक, सामाजिक एवं राजनीतिक मूल्यों पर बल दिया। सर थामस मूर ने अपनी पुस्तक यूटोपिया' में दिन प्रतिदिन की सामाजिक समस्याओं को समझने का प्रयत्न किया। मालथस ने जनसंख्या सिद्धांत दिया जिसमें जनसंख्या से सम्बन्धित समस्याओं पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला। इस तरह इन विद्वानों के बौद्धिक चिंतन ने समाजशास्त्र के विकास के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि को तैयार किया जिसे समाजशास्त्र का अनौपचारिक विकास भी कहा जा सकता है।


समाजशास्त्र का औपचारिक विकास


औपचारिक रूप से समाजशास्त्र के विकास का प्रारम्भ 1838 में आगस्ट कॉम्ट (1798 से 1857 ई.) द्वारा समाजशास्त्र की निर्माण के साथ शुरू होता है। आगस्ट कॉम्ट ने ही सर्वप्रथम सामाजिक दर्शन और समाजशास्त्र में अंतर स्पष्ट करते हुए समाजशास्त्रीय प्रणाली का विकास किया। प्रारम्भिक समाजशास्त्र के विकास में कॉम्ट के साथ दुर्खीम, स्पेंसर, बेबर आदि ने व्यापक योगदान दिया। जिन्हें संस्थापक समाजशास्त्री भी कहा जा सकता है। कॉम्ट को समाजशास्त्र का जन्मदाता भले ही कहा जाता हो लेकिन समाजशास्त्र के व्यवस्थित एवं अन्य सामाजिक विज्ञानों से पृथक एक स्वतंत्र एवं वैषयिक विज्ञान बनाने का श्रेय फ्रांसीसी समाजशास्त्री ईमाइल दुर्खीम (1858-1917 ई0) को जाता है। ब्रिटिश समाजशास्त्री हरबर्ट स्पेंसर (1820 1903 ई0) भी समाजशास्त्र के प्रमुख संस्थापक समाजशास्त्री हैं।

इन्होंने अपनी पुस्तक 'सिन्थेटिक फिलॉसफी’ के एक भाग ‘प्रिसिंपल्स ऑफ सोशियोलॉजी' में कॉम्ट के विचारो को मूर्तरूप देने का प्रयत्न किया। जीव विज्ञान से प्रभावित होकर इन्होनें समाजशास्त्र में सामाजिक सावयव एवं सामाजिक उद्विकास का सिद्धांत दिया। जर्मन समाजशास्त्री मैक्स बेबर (1864-1920 ई0) ने भी समाजशास्त्र को विज्ञानो की श्रेणी में स्थापित करने में प्रमुख योगदान दिया। इन्होंने अपने सिद्धांतों के निर्माण में वृहद् के साथ-साथ सूक्ष्म पद्धतियों का भी प्रयोग किया। मैक्स बेबर समाजशास्त्र में वैज्ञानिक पद्धतियों के साथ विषयनिष्ठ अध्ययन के लिए बर्सटेहन जैसी मानविकी पद्धती का भी प्रयोग किया। इटली के समाजशास्त्री विल्फ्रेड परेटो ने समाजशास्त्र को व्यवस्थित बनाने में काफी योगदान दिया।