अर्थशास्त्र के विकास का चरण - Development Stage of Economics
अर्थशास्त्र के विकास का चरण - development stage of economics
समाजशास्त्र समाज का अध्ययन करने वाला एक ऐसा विज्ञान है जो समाज का अध्ययन करता है। जिससे सामाजिक व्यवस्था तथा समाज का विकास, समय, काल, तथा परिस्थति के अनुसार तीव्र गति से हो। सामाजिक वयवस्था के लिए भारत वर्ष में आश्रम व्यवस्था, वर्णव्यवस्था, पुरूषार्थ, धर्म, कर्म, तथा पुर्नजन्म, जाति आदि पर विशेष ध्यान दिया गया। समाज के संगठन एवं विकास के लिए अर्थ की आवश्यकता होती है। लेकिन अर्थ का उपयोग व्यक्ति सही कार्यों के लिए एवं उत्पादन को बढ़ाने में प्रयोग करे इसका अध्ययन हम अर्थ शास्त्र विषय के अन्तर्गत करते है क्योंकि अर्थ शास्त्र धन का विज्ञान है। दोनो ही शास्त्रों में घनिष्ठ संबंध है। हम इस इकाई में समाजशास्त्र का अर्थ शास्त्र से संबंध पर संक्षिप्त विवेचना करेगें ।
प्रथम चरण :- आर्थिक विकास के प्रथम चरण को हम 'बर्बर युग' भी कह सकते है। इस युग का मानव जंगली दशा में एक स्थान से दूसरे स्थान में पेट भरने के लिए आता जाता रहता था। उस समय की सामाजिक व्यवस्था में भी आर्थिक समस्यायें थी। उस आदिम युग की आर्थिक समस्यायें वर्तमान के समान चक्रीय समस्या नहीं थी। पर उस युग में अपनी परम्पराओं व सुविधाओं के अनुसार इन समस्याओं को हल कर लिया जाता था। उस समय जो समाज का मुखिया होता था वह अपने कबीले की सुरक्षा तथा शक्ति व्यवस्था के लिए कबीले के सदस्यों से उन वस्तुओं व सेवाओं की मांग करता था जो व्यवस्था के लिए आवश्यक समझी जाती थी। आज वर्तमान समय की सरकारों का भी यही उद्देश्य है। भले ही प्राचीन व्यवस्था से वर्तमान व्यवस्था अधिक व्यवस्थित है।
द्वितीय चरण:- द्वितीय चरण में पहुँचने में मानव को अनेक संघर्षो का सामना करना पड़ा। अब मानव समाज शिक्षित व सभ्य हो चुका था। धर्म के प्रति लोगों में आस्थायें बढने लगी। इस युग में आर्थिक क्रियाओं का संबंध धर्म के साथ जोड़ा जाने लगा था। इस युग के विचारक धर्मनुसार आर्थिक आचरण को स्वीकार करने तथा धर्म की रक्षा के लिए अर्थ संग्रह को मान्यता देने लगे थे।
तृतीय चरण:- आर्थिक विकास के तृतीय चरण में प्रथम एवं द्वितीय चरण की अपेक्षा बड़े भारी आर्थिक परिवर्तन देखने को मिलते है। तृतीय चरण में आर्थिक क्रियाओं का संबंध राजनीति शास्त्र के साथ जोड़ा जाने लगा था। यूनानी एवं रोमन दास समाजो का स्थान सामन्तवादी समाज ने लिया था। इस युग में नये राज्यों का जन्म व पुराने राज्यों का विकास होने लगा था। इस प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप अर्थ व्यस्था को राज्य की •नीति के अनुरूप चलाने की व्यस्था की जाने लगी थी।
चतुर्थ चरण:- आर्थिक विकास के चतुर्थ चरण में अर्थशास्त्र ने धर्म तथा राजनीति से अपना संबंध विच्छेद कर लिया क्यो कि तब तक अर्थशास्त्र एक स्वत्रंत विषय के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका था। पन्द्रहवी शताब्दी के आस-पास के अनेक विद्वानों के द्वारा स्वतंत्र रूप में अर्थशास्त्र का चिंतन किया जाने लगा था।
पंचम चरण:- अर्थशास्त्र के विकास के पांचवे चरण को हम वैज्ञानिक आर्थिक क्रियाओं के नाम से सम्बोधित कर सकते हैं। इस युग में डेस्कार्ट, काण्ट, लॉक आदि दार्शनिकों ने प्रकृति की जो सारगर्भित व्याख्या की थी उससे मानव समाज के व्यवहार पर नई छाप पडी। परिणाम स्वरूप अर्थशास्त्र को भी एक नयी दिशा मिलने लगी। दार्शनिकों के द्वारा उस समय जो नये विचार दिये जा रहे थे उन विचारों ने इस बात का संकेत दे दिया था कि आर्थिक व्यवहार का भी वैज्ञानिक आधार हो सकता है। इस बात का सूत्रपात्र प्रथम बार विलियम पैटी रिचर्ड कैण्टीलॉन तथा फैरकोई क्वेने आदि ने किया था। इन सब प्रयत्नों व संघर्षो के बाद 1776 में एडमस्मिथ ने राष्ट्रों की सम्पत्ति के स्वभाव और कारणों की खोज नामक पुस्तक की रचना करके अर्थ शास्त्र को व्यवस्थित व वैज्ञानिक रूप प्रदान कर दिया।
वार्तालाप में शामिल हों