विवाह विच्छेद - divorce

 विवाह विच्छेद - divorce


चाणक्य राजद्रोही, हत्यारा, जाति और धर्म से पतित तथा नंपुसक पति से स्त्री को विवाह विच्छेद की अनुमति देते है। यदि पति-पत्नी के बीच द्वेष-वैमनस्य उत्पन्न हो जाये तो भी विवाह विच्छेद सम्भव है। लेकिन चाणक्य प्रथम चार प्रकार के धर्म विवाह में किसी भी दशा में विवाह विच्छेद की अनुमति नही देते।


चाणक्य कुछ परिस्थितयों में स्त्री और पुरूष पुनर्विवाह का भी अधिकार देते है जैसे किसी स्त्री के संतान न होती हो या वह बॉझ हो तो पति आठ वर्ष तक प्रतिक्षा करने के पश्चात पुनर्विवाह कर सकता है। वहीं कुछ समय के लिए विदेश गये पति की पुत्रहीन स्त्रियों के लिए चाणक्य एक वर्ष की प्रतिक्षा के बाद विवाह की अनुमति देते है। जिस स्त्री का पति संयासी हो गया हो या मर गया हो, उसकी स्त्री सात मासिक धर्म तक दूसरा विवाह न करें। यदि उसकी कोई संतान हो तो वह एक वर्ष तक ठहर जाय। इसके बाद वह अपने पति के सगे भाई के साथ विवाह कर लें, यदि पति के सगे भाई न हो तो समान गोत्र वाले उसी के किसी पारिवारिक भाई के साथ विवाह कर सकती है। इस प्रकार कौटिल्य देवर विवाह का भी समर्थन करते है।