श्रम विभाजन पुस्तक में दुर्खीम के उद्देश्य - Durkheim's Objectives in the book Division of Labor

 श्रम विभाजन पुस्तक में दुर्खीम के उद्देश्य - Durkheim's Objectives in the book Division of Labor

1. श्रम विभाजन के कार्यों को निर्धारित करना अर्थात यह पता लगाना की श्रम विभाजन द्वारा कौन सी आवश्यकताएं पूरी होती हैं। 


2. उन कारणों तथा दशाओं का पता लगाना जिस पर श्रम विभाजन आश्रित है।


3. श्रम विभाजन के प्रमुख असामान्य प्रकारों का पता लगाना


दुर्खीम ने अपनी पुस्तक 'The Division of Labour in society' को उपरोक्त उद्देश्यों के आधार पर 3 भागों में विभाजित किया है.


1. श्रम विभाजन के कार्य (Function of Division of Labour)- प्रथम खंड में श्रम विभाजन के कार्य के बारे में वर्णन किया गया है। जिसमें दुखम कार्य निर्धारण विधि समानता के आधार पर यांत्रिक एकता, श्रम विभाजन के आधार पर सावयवी एकता तथा इन एकता के परिणामों का विस्तार पूर्वक उल्लेख करते हैं।


2. दशा कारण एवं दशाएं (Causes and Condition of Division of Labour) इस पुस्तक के द्वितीय खंड में श्रम विभाजन के कारणों तथा दशाओं के बारे में चर्चा की गई है। जिसमें दुर्खीम विस्तारपूर्वक श्रम विभाजन की प्रकृति का कारण प्रसन्नता न बताकर नैतिक घनत्व बताते हैं तथा इन सबके परिणामों की विवेचना करते हैं।


3. श्रम विभाजन के असामान्य स्वरूप (Abnormal forms of Division of Labour) - पुस्तक के तृतीय खंड में दुर्खीम श्रम विभाजन के असामान्य प्रारूपों का उल्लेख करते हैं। इस खंड में विश्रंखल श्रम विभाजन, (Anomic Division of Labour) आरोपित श्रम विभाजन (Forced Division of Labour) तथा अन्य असामान्य प्रारूप (Another Abnormal Form) का विस्तृत उल्लेख किया गया है। के । पुस्तक अंत में निष्कर्ष दिया गया है। स्वयं दुर्खीम ने अपनी पुस्तक के प्रारंभ में ही इस उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि मुख्य रूप से यह पुस्तक नैतिक जीवन के तत्वों को प्रत्यक्ष विज्ञानों की पद्धति के अनुसार समझने का प्रयास है।


दुर्खीम इस पुस्तक के प्रकाशन से पहले भी 'Utilitarian' Thinker ने 'Happiness Theory को प्रस्तुत किया था। जिसके अनुसार अधिक सुख की प्राप्ति की इच्छा श्रम विभाजन का कारण है। दुर्खीम ने यह विचार दिया कि श्रम विभाजन एक सामाजिक तथ्य है और एक सामाजिक तथ्य किसी दूसरे सामाजिक तथ्य से ही उत्पन्न हो सकता है। उनके अनुसार Happiness Theory' श्रम विभाजन के असली कारणों पर प्रकाश नहीं डालता। क्योंकि यह सामाजिक तथ्य के कारणों को परिवेश में नहीं ढूंढता है। उन्होने विचार दिया था कि यदि सुख की प्राप्ती की इच्छा श्रम विभाजन का कारण होता तो जिन समाजों में जितना अधिक श्रम विभाजन पाया जाता है, वहां के लोगों का जीवन उतना सुखी रहता पर वास्तव में ऐसा नहीं होता। वास्तविक तथ्या इसके विपरित पाए जाते हैं। दुर्खीम के श्रम विभाजन के सिद्धांत को हम निम्न भागों में विभाजित करके आसानी से समझ सकते हैं


4. आदिकाल में श्रम विभाजन (Division of Labour in Early Period) दुर्खीम के अनुसार के प्राचीन समाज में श्रम विभाजन स्त्री और पुरुष के भेद पर आधारित था। आदि काल में मानव समाज शिकारी अवस्था में था। पुरूष शिकार करने या फल एकत्रित करने जाते थे और स्त्रियां घर का कामकाज और बच्चों का पालन पोषण करती थी।


इस समय जनसंख्या कम थी और व्यक्तियों की आवश्यकताएं भी सीमित होती थी। इसलिए आर्थिक कार्य भी सीमित था और उत्पादन नाम मात्र का था। इसी कारण आर्थिक जीवन में कोई विशेष श्रम विभाजन की आवश्यकता अनुभव नहीं की गई। भोजन लाना और प्राप्त करना उस समय की मूल समस्या और आवश्यकता थी। शेष कार्यों को मिलजुल कर पूरा किया जाता था। क्योंकि श्रम विभाजन नहीं था, इसलिए विशेषीकरण का भी कोई प्रश्न नहीं था। प्रत्येक व्यक्ति सभी प्रकार के सामाजिक व आर्थिक कार्यों को कर सकता था। संपूर्ण समाज एक सूत्र में बंधा हुआ था। व्यक्तियों के विचार प्रणाली एवं व्यवहारों में एकरूपता थी। दुखम के अनुसार इस प्रकार के समाजों में यांत्रिक एकता थी। इसका कारण भी स्पष्ट है क्योंकि सभी लोग सामूहिक इच्छा से बने होते थे। समाज में लोग परंपरा और राजा के दबाव में आंख मूंदकर यंत्रवत कार्य करते रहते थे और समाज यांत्रिक एकता में बंधा था।


5. सभ्य समाज में श्रम विभाजन (Division of Labour in Civilized Society)- दुर्खीम का कहना है जैसे-जैसे सभ्यता का विकास हुआ। वैसे-वैसे आर्थिक जीवन के विभिन्न पहलू विकसित होते गए मनुष्य की आवश्यकताएं बढ़ी और आवश्यकताओं में विविधता का विस्तार हुआ।

इसके फलस्वरुप सामाजिक उत्पादन कार्यों में श्रम विभाजन की आवश्यकता महसूस की गई और श्रम विभाजन की प्राचीन समाज में पाई जाने वाली यांत्रिकी एकता सावयवी एकता में बदल गई। सावयवी एकता उस अवस्था को कहते हैं जब समाज की विभिन्न इकाइयों में कार्यों का विभाजन होते हुए भी उनमें अंतःसंबंध और अंतः निर्भरता बनी रहती है। वे एक दूसरे से स्वतंत्र नहीं होते हैं। इसी ने श्रम विभाजन को उत्पन्न किया। समाज में विभिन्न तरह के व्यक्ति विभिन्न प्रकार के कार्यों का संपादन करने लगे अधिक श्रम विभाजन और विशेषीकरण के कारण प्रत्येक व्यक्ति को एक ही प्रकार का कार्य करना पड़ रहा था। विविध आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्तियों पर निर्भर रहना पड़ रहा था। समाज में जनसंख्या वृद्धि हुई और जनसंख्या वृद्धि के परिणामस्वरुप समाज में श्रम विभाजन और विशेषीकरण का महत्व बढ़ने लगा। एक निश्चित कार्य को बार बार करने से योग्यता प्राप्त व्यक्तियों के महत्त्व में वृद्धि होने लगी और व्यक्ति के कार्य में भी मूल्यों का समावेश हुआ। विकास की परंपरा में समाज जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया समाज कई भागों में विभक्त होता गया। समूह के हितों और स्वास्थ्य में वृद्धि होती गई। इसके परिणामस्वरुप विभिन्न उद्योगों का जन्म हुआ और समाज में यांत्रिकी एकता समाप्त हो गई तथा विविधता का विकास हुआ। दुर्खीम के अनुसार इस तरह श्रम विभाजन एक सामाजिक घटना है और इस घटना ने सामाजिक एकता को समाप्त करके सामाजिक संघर्ष को जन्म दे दिया।


6. श्रम विभाजन के कारण (Causes of Division of Labour) अर्थशास्त्रियों के अनुसार श्रम विभाजन का कारण हमारी बढ़ती हुई प्रसन्नता है। दुर्खीम इस प्रकार के तर्क से सहमत नहीं थे, दुर्खीम ने श्रम विभाजन की व्याख्या समाजशास्त्रीय आधार पर की है। इसलिए उन्होंने श्रम विभाजन के कारणों की खोज सामाजिक जीवन की दशाओं तथा उनसे उत्पन्न सामाजिक आवश्यकताओं में की है।