दुर्खीम का प्रत्यक्षवाद - Durkheim's Positivism
दुर्खीम का प्रत्यक्षवाद - Durkheim's Positivism
दुर्खीम ने समाजशास्त्र को एक पृथक एवं स्वतंत्र विषय के रूप में स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक एवं अनुभववादी पद्धति से दुर्खीम ने दर्शनशास्त्र के दरवाजे बंद कर दिए। दुर्खीम ने समाजशास्त्र की प्रकृति और उसके क्षेत्र को निर्धारित करने पर विशेष जोर दिया। 1898 तक दुर्खीम ने प्रत्यक्षवादी पद्धति को पूरी तरह स्वीकार कर लिया था। दुर्खीम के अनुसार समाजशास्त्र स्वयं को एक विज्ञान के रूप में अपने आपको तब तक प्रतिष्ठित नहीं कर सकता जब तक की वह वैज्ञानिक पद्धतियों का अनुसरण न करें। समाजशास्त्र में प्रयुक्त होने वाली वैज्ञानिक पद्धति ही प्रत्यक्षवाद है। अनुभवाश्रित अवलोकन वर्गीकरण व्याख्या एवं सामान्यीकरण इसके अनिवार्य अंग है। इन्ही वैज्ञानिक कार्यप्रणाली को प्रत्यक्षवाद में दृढ़ता से अपनाया जाता है।
दुर्खीम ने अपनी पुस्तक समाजशास्त्री पद्धति के नियम में समाजशास्त्र में प्रत्यक्षवादी उपागम का प्रयोग करने की बात कही है। इस संबंध में दुर्खीम का कहना था कि प्रथम और सर्वाधिक मौलिक नियम यह है कि सामाजिक तथ्यों को वस्तुओं के रूप में देखा जाए। जिस प्रकार प्राकृतिक जगत में घटनाओं और वस्तुओं को तथ्यों के रूप में माना जाता है उसी रूप में विश्वासों की व्यवस्थाओं, प्रथाओं तथा समाज की संस्थाओं को सामाजिक जगत के तथ्यों या वस्तुओं के रूप में समझा जाना चाहिए। जिससे इनका प्रत्यक्ष अवलोकन किया जा सकेगा और इन्हें वैषयिकता के साथ मापा भी जा सकेगा। हालांकि यह स्पष्ट है कि सामाजिक तथ्य की जागरूकता से ही समाज में प्रवेश करते हैं फिर भी सामाजिक तथ्य व्यक्तियों से बाहर है। यह तथ्य बाहरी वस्तु है अतः इनका वैषयिकता के साथ अध्ययन किया जा सकता है। उनका कहना है कि समाज व्यक्तियों का एकत्रीकरण मात्र नहीं है।
व्यक्ति अपने विशेष मनोविज्ञान मानसिक स्तर के आधार पर स्वतंत्रता पूर्वक क्रिया करता है। समाज के सदस्य सामूहिक विश्वासों, मूल्य तथा नियमों का अर्थ सामाजिक तथ्यों द्वारा निर्देशित होते हैं। जिनका अपना स्वयं का अस्तित्व है। ए सामाजिक तथ्य ही व्यक्तियों को विशेष तरीके से व्यवहार करने से रोकते हैं। इसलिए यह परीक्षण करना आवश्यक हो जाता है की सामाजिक तथ्य मानव व्यवहार की किस प्रकार व्याख्या करते हैं। जिस प्रकार का तथ्य हमारी प्रेरणा की प्रतिक्रिया के रूप में होता है ठीक उसी प्रकार से मानव व्यवहार को सामाजिक तथ्यों की बाहरी उत्तेजना की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा सकता है। मनुष्य और समाज की प्रकृति का विश्लेषण सामाजिक तथ्यों के आधार पर प्राकृतिक विज्ञानों की पद्धतियों के अनुसार किया जा सकता है।
एमाइल दुर्खीम ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ आत्महत्या समाजशास्त्र में एक अध्ययन में प्रत्यक्षवाद के उपागम की उपयोगिता की प्रमाणिकता को सिद्ध करने का प्रयास किया। इस अध्ययन में दुर्खीम ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि “वास्तविक नियम पता लगाए जाने योग है।
सामाजिक घटना पर नियम उसी रूप में लागू होते हैं, जिस रूप में प्राकृतिक घटना पर लागू होते हैं।" प्रत्यक्षवादी उपागम की ओर अधिक स्पष्टता से जांच करने की दृष्टि से दुर्खीम ने आत्महत्या के कुछ पहलुओं को लिया। उन्होंने इसके विभिन्न प्रकारों की विवेचना की जांच की और उसके कारणों को ढूंढने का प्रयास किया। इसलिए दुर्खीम का आत्महत्या संबंधी अध्ययन समाजशास्त्र में अनुसंधान पद्धति के एक आदर्श के रूप में माना जाता है। बाद में इसी प्रकार की मान्यताओं के आधार पर समाजशास्त्र में अनेक अनुसंधान किए गए हैं। यह अनुसंधान उन तथ्यों पर आधारित है जिनका अवलोकन किया जा सकता है और उन्हें मापा जा सकता है। इन अनुसंधानों के निष्कर्ष में यह बताया गया है कि मनुष्य का व्यवहार उसके स्वयं के बाहर की शक्तियों के द्वारा निर्धारित होता है। दुर्खीम के अनुसार “मानव व्यवहार सामाजिक तथ्यों द्वारा निर्धारित होता हैं और वे सामाजिक तथ्य मनुष्य के बाहर के होते हैं, जिनका प्रत्यक्ष अवलोकन किया जा सकता है, और मापा जा सकता है,
यही दुर्खीम का प्रत्यक्षवाद है। धर्म का अध्ययन करते समय दुर्खीम ने यह अनुभव किया कि समाजशास्त्रीय यथार्थ के रूप में प्रत्यक्षवाद को पूरी तरह लागू करना कठिन है। प्रत्यक्षवाद के तीनों आधार 'विज्ञान का दर्शन', 'प्रत्यक्षवादी पद्धति' एवं 'विज्ञान की शक्ति को स्वीकार करना सरल था पर अध्ययनों में इसका प्रयोग कठिन था। इसलिए दुर्खीम ने इसमें संशोधन किया इसके दो प्रमुख कारण बताए
1. प्रत्यक्षवादी अध्ययन पद्धति के उपयोग से सामाजिक घटनाओं एवं सामाजिक संरचना का अध्ययन करने से ऐसे निष्कर्ष सामने आ रहे थे जो सामान्य वृद्धि के विपरीत थे। प्रत्यक्षवाद सामान्य बुद्धिवाद के विपरीत प्रतीत हो रहा था।
2. सामाजिक घटनाओं की जटिलता के कारण प्रत्यक्षवादी तकनीकों को लागू करना मुश्किल था।
बोगार्डस ने दुर्खीम के प्रत्यक्षवाद को स्पष्ट करते हुए लिखा है “दुर्खीम अपने पद्धतिशास्त्र में इस बात पर जोर देते हैं, कि भावना से जुड़े सभी विचारों से दूर रहा जाए, व्यक्तिगत गलतियों को पनपने न दिया जाए, से अध्ययन के उद्देश्यों को पहले से ही सावधानी पूर्वक परिभाषित कर लिया जाए, तथा स्वाभाविक तथ्य जैसा है' और तथ्य जैसा की होने चाहिए' में स्पष्ट भेद कर लेना चाहिए।"
दुर्खीम ने कॉम्ट के प्रत्यक्षवाद का अनुकरण करते हुए समाजशास्त्र का लक्ष्य अनुभव सिद्ध ज्ञान की प्राप्ति को बताया। अर्थात वह ज्ञान जो सामाजिक तथ्यों के अवलोकन, वर्गीकरण, विश्लेषण और परीक्षण आदि वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के आधार पर प्राप्त किया गया हो। गस्त कॉम्ट ने समाजशास्त्र की पद्धति का प्रत्यक्षवादी विचार देकर मानवता के धर्म का आदर्शात्मक प्रारूप प्रस्तुत किया था। वही दुर्खीम सामाजिक तथ्यों को वस्तु के रूप में अध्ययन करने की सलाह देकर समाजशास्त्र को एक विशुद्ध विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते थे। दुर्खीम के समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रत्यक्षवादी पद्धति के सफल प्रयोग को प्रमाणित करते हैं। दुर्खीम ने समाजशास्त्र के जिस व्यवहारिक पक्ष पर बल दिया है। वह प्रत्येक विज्ञान पर लागू होता है। इस तरह वैज्ञानिक प्रक्रिया के आधार पर इंद्रियों के द्वारा अनुभव की जाने वाली घटनाओं का अध्ययन करना दुखम का मुख्य उद्देश्य था यही दुर्खीम की पद्धतिशास्त्र का आधार स्तंभ है यही दुर्खीम का प्रत्यक्षवाद है।
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