दुर्खीम के सामाजिक आलोचना - Durkheim's Social Criticism
दुर्खीम के सामाजिक आलोचना - Durkheim's Social Criticism
दुर्खीम ने समाजशास्त्र की अवधारणा की विस्तृत व्याख्या करके समाजशास्त्रीय अध्ययन एवं विश्लेषण को वैज्ञानिक मार्ग दिखाया है। फिर भी अनेक समाजशास्त्रियों ने दुर्खीम के सामाजिक तथ्य की आलोचना की है
1. दुर्खीम सामाजिक तथ्यों में समाज व समूह को अधिक महत्व देकर व्यक्तियों की उपेक्षा की है। जबकि वास्तविकता यह है कि व्यक्ति के बिना समूह व समाज का अस्तित्व ही संभव नहीं है। इस सम्बंध में गेवरल टार्डे ने लिखा है "मैं यह मानता हूं कि मेरे लिए यह समझना कठिन है कि व्यक्तियों को निकाल देने के बाद समाज जैसी कोई वस्तु शेष रह जाएगी। यदि किसी विश्वविद्यालय के छात्रों तथा अध्यापकों को अलग कर दिया जाए तो मैं नहीं समझता की वहा नाम के अतिरिक्त कुछ भी और शेष रह जाएगा।"
2. हेनरी बॉर्न्स सामाजिक तत्व को वस्तु माने जाने पर अपनी आपत्ति प्रकट करते हुए लिखा है कि दुर्खीम के इस सूत्र का अभीष्ट अर्थ कभी स्पष्ट नहीं हुआ है। क्योंकि दुर्खीम ने वस्तु शब्द का प्रयोग चार विभिन्न और घनिष्ठ संबंध रहित अर्थों में किया है।
3. सामाजिक तथ्यों की बाध्यता की विशेषता सभी प्रकार की घटनाओं पर खरी नहीं उतरती। कानून तथा नैतिक नियम व्यक्तियों को बाध्य कर सकते हैं लेकिन अन्य स्थितियों में सामाजिक तथ्य की यह विशेषता लागू नहीं होती।
4. गेबरल टार्डे एवं रेमण्ड ऐरन ने भी बाध्यता की आलोचना की हैं। रेमण्ड ऐरन ने भी दुर्खीम की बाध्यता का विरोध किया है। “दुर्खीम ने बाध्यता शब्द का प्रयोग अत्यंत दोषपूर्ण रूप में किया है। कभी-कभी तो यह समझने में कठिनाई उत्पन्न होने लगती है कि क्या केवल बाध्यता ही सामाजिक घटनाओं या तथ्यों का सार तत्व है या केवल यह उनकी बाध्य विशेषता है, जो कि उन्हें समझने में सहायता करती है।”
5. दुर्खीम ने असमान्य एवं व्याधकीय तथ्यों के बीच कोई भेद नहीं किया है। यह दुर्खीम के सिद्धांत की एक प्रमुख कमजोरी है क्योंकि अनेक असामान्य घटनाएं गैरव्याधिकीय भी हो सकती है।
6. दुर्खीम सामाजिक तथ्य में यह स्पष्ट करने में असफल रहे हैं कि कौन सा सामाजिक तथ्य अधिक प्रभावशाली एवं नियंत्रणकारी है तथा कौन सा कम।
अनेक आलोचनाओं का केंद्र रहने के बाद भी दुर्खीम के सामाजिक तथ्य की अवधारणा काफी महत्वपूर्ण है। दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों के आधार पर ही श्रम विभाजन सामाजिक एकता धर्म आत्महत्या जैसे सिद्धांतों का विश्लेषण एवं विवेचन किया है।
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