एक विषय के रूप में समाजशास्त्र का उद्भव - Emergence of Sociology as a Subject

एक विषय के रूप में समाजशास्त्र का उद्भव - Emergence of Sociology as a Subject

समाजशास्त्र को समझने के लिए उसकी पृष्ठभूमि, उद्भव, परिचय (परिभाषा, प्रकृति, विषय क्षेत्र) विकास एवं महत्व पर विस्तृत चर्चा की गयी है। सामाजिक चिंतन में तार्किता के स्थापना के बाद समाजशास्त्र जैसे विशेष सामाजिक विज्ञान की आवश्कयता को बल मिला। सामाजिक चिंतन में स्थापित यह तार्किता दीर्घगामी मानवीय चिंतन के परिणाम थी, जो पुनर्जागरण काल से शुरू होकर प्रबोधन काल तक परिपक्वता को प्राप्त कर लेता है। इस तरह यह काल अनौपचारिक रूप से समाजशास्त्र का विकास करता है। इस इकाई के भाग 4.4 में समाजशास्त्र के इस अनौपचारिक विकास के साथ-साथ 1838 में समाजशास्त्र के उद्भव के बाद औपचारिक समाजशास्त्र के विकास की विस्तृत चर्चा की गयी है। भाग 4.5 में वर्तमान समय में विषय के रूप में समाजशास्त्र की आवश्यकता एवं महत्व को समझाने का प्रयास किया गया है।

एक विषय के रूप में समाजशास्त्र भले ही नया है लेकिन इसकी पृष्ठभूमि काफी पुरानी है। सामान्य रूप से देखा जाय तो सामाजिक घटनाओं का अध्ययन मनुष्य के सामाजिक प्राणी बनने के साथ ही शुरू हो गया था। बौद्धिक प्राणी होने के कारण मनुष्य में जिज्ञासा की प्रवृत्ति मूल रूप से पायी जाती है। जिसके कारण वह अपने आस-पास घटने वाली घटनाओं को समझने का प्रयास करता है उसके बारे में चिंतन करता है, अध्ययन करता है। सामाजिक प्राणी होने के नाते सामाजिक अन्तः क्रिया और तानो-बानो का अध्ययन मनुष्य के इसी मौलिक प्रवृत्ति का नतीजा था जो समय के साथ व्यवस्थित और परिपक्व होता गया। देखा जाय तो प्लेटो एवं अरस्तु जैसे सामाजिक विचारकों ने प्राचीन काल के यूरोपीय समाज का व्यापक रूप से अध्ययन किया। लेकिन इनका अध्ययन एवं सामाजिक चिंतन तर्क बजाय धर्म एवं दर्शन पर आधारित था। समाजशास्त्र की जड़े उस सामाजिक चिंतन पर आधारित है। जो तर्क द्वारा किया जाता है। जिसकी शुरूवात पुनर्जागरणकाल से होती है। जहाँ यूरोपीय समाज में प्राकृतिक एवं भौतिक घटनाओं के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक घटनाओं का भी तार्किक चिंतन का प्रयास किया जाने लगा। प्राकृतिक एवं भौतिक घटनाओं के तार्किक चिंतन के परिणाम स्वरूप विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक आविष्कार एवं खोजे हुई जिससे समाज में अमूल-चूल परिवर्तन आया इसे वैज्ञानिक क्रान्ति कहा गया। वैज्ञानिक क्रान्ति के बाद यूरोप में वैज्ञानिक ज्ञान के व्यावहारिक पक्ष का तेजी से विकास हुआ जिसके कारण यूरोप में मशीनीकरण की प्रक्रिया आरम्भ हुई। जिसका सर्वाधिक लाभ ब्रिटेन को मिला।

क्योकि ब्रिटेन में अनुकूल भौगोलिक परिस्थित, कोयले एवं खनिज के रूप मे प्रर्याप्त प्राकृतिक संसाधन थे। साथ-साथ उसे भारत जैसे कई औपनिवेशिक देशों से अपरिमित पूँजी एवं व्यापारिक क्षेत्र प्राप्त हुए। इस तरह मशीनीकरण, पूँजी, बाजार एवं व्यावस्थित वाणिज्यिक प्रणाली का ब्रिटेन में तार्किक समन्वय हुआ। परिणाम स्वरूप इंग्लैंड में औद्योगिक क्रान्ति की शुरूआत होती है। वहीं दूसरी ओर पुनर्जागरण काल के समय साहित्य, कला, दर्शन में स्थापित तार्किक मूल्य 18 वीं शताब्दी में वाल्टेयर, मान्टेस्क्यू, हॉब्स, लॉक, रूसो आदि जैसे सामाजिक विचारकों के माध्यम से फ्रांस में अधिक परिपक्व एवं प्रभावशाली हो रहे थे परिणाम स्वरूप फ्रांस की जनता में जागरूकता आ रही थी। वें अपने अधिकारों के प्रति अधिक मुखर हो रहे थे। राजा, पादरी, सामन्त वर्ग के अत्याचार शोषण कि खिलाफ जनता का अंसतोष 14 जुलाई 1789 को क्रान्ति का रूप धारण कर लेती है। ब्रिटिश समाजशास्त्री बाटोमोर का यह कथन अत्यन्त सार्थक सिद्ध होता है कि 18 वीं शताब्दी की बौद्धिक परिस्थितियां समाजशास्त्र के उदय में सहायक बनी। फ्रांसीसी क्रान्ति एवं औद्योगिक क्रान्ति ने फ्रांस के समाज में अनेक सकारात्मक एवं नकारात्मक परिवर्तन लाएं। जिसने फ्रांसीसी समाज में नवीन सामाजिक समस्याओं एवं आवश्यकताओं को जन्म दिया। परिणाम स्वरूप फ्रांसीसी चिंन्तको द्वारा समाज के तार्किक अध्ययन पर बल देना शुरू किया जिससे फ्रांस में इन परिवर्तनों को ठीक तरह से समझकर सामाजिक नियमों एवं सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जा सके। कॉम्ट एवं सेंटसाइमन ऐसे प्रमुख विचारक थे.

जिन्होंने सर्वप्रथम सामाजिक घटनाओं को भी प्राकृतिक एवं भौतिक घटनाओं की तरह तार्किक एवं व्यावस्थित शुरू किया। कॉम्ट पर बेन्जामिन फ्रांकलिन एवं सेंट साइमन के विचारों का व्यापक प्रभाव पड़ा। 1818 में कॉम्ट सेंट साइमन के संपर्क में आये 1822 में कॉम्ट एवं सेंट साइमन ने मिलकर A Plan of the scientific operation necessary for reorganization of society. पुस्तक में एक नये सामाजिक विज्ञान की रूपरेखा प्रस्तुत की 1824 में कॉम्ट ने इस नये सामाजिक विज्ञान को सामाजिक भौतिकी' नाम दिया। इसी बीच बेल्जियम के भौतिक शास्त्री एडोल्फ क्वेटलेट ने An essay on social physics नाम से पुस्तक प्रकाशित कर दी। जिसके कारण आगस्ट कॉम्ट ने 1838 ई0 में समाज के इस नये विज्ञान का नाम सामाजिक भौतिकी के स्थान पर सामाजशास्त्र कर दिया। जो लैटिन भाषा के शब्द सोसियस और ग्रीक भाषा के शब्द लोगस से मिलकर बना है। इस तरह 1838 में समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन करने वाले विज्ञान के रूप में स्थापित हुआ लेकिन इसके अकादमिक विषय के रूप में स्थापित होने में समय लगा।