प्रमुख विद्याशास्त्री एवं उनका अध्ययन - eminent scholars and their studies

 प्रमुख विद्याशास्त्री एवं उनका अध्ययन - eminent scholars and their studies

भारतशास्त्र के प्रमुख समाजशास्त्रियों में जी.एस. घुरिये, के.एम. कपाड़िया, ईरावती कर्बे, पी.एन. प्रभु एवं लुई डयूमा का नाम आता है। जिन्होंने ने भारतीय समाज की संरचना, व्यवस्थाओं एंव संस्थाओं के अध्ययन के लिए इस उपागम का प्रयोग किया। भारतीय समाजशास्त्र की इस उपागम को समझने के लिए प्रमुख विद्याशास्त्रियों एवं उनके अध्ययनों को समझना आवश्यक होगा।


आलोचनात्मक मूल्यांकन


जी.एस. घुरिये - एक समाजशास्त्री के रूप में इस उपागम सर्वप्रथम प्रयोग का श्रेय जी. एस. घुरिये को जाता है। इन्होंने जाति, प्रजाति, परिवार एवं नातेदारी, संस्कृति, विवाह, धर्म, साधू, कला, नृत्य एवं भेष भूषा का विस्तृत वर्णन किया। जिसके लिए इन्होंने भारत विद्याशास्त्र उपागम का प्रयोग करते हुए भारत के पौराणिक एवं धार्मिक ग्रंथों का सहारा लिया। घुरिये जाति को इण्ड्रोआर्यन संस्कृति के बाह्यमणों का शिशु के रूप में मानते हुए इसकी 6 विशेषताओ का उल्लेख किया। घुरिये ने जाति के साथ-साथ जनजातियों का भी अध्ययन किया है

जिन्हें पिछडे हिंदू के रूप मे सम्बोधित किया है। घुरिये ने धार्मिक विश्वास, कर्मकांड, संस्कार तथा भारतीय परंपरा में साधू की भूमिका का भी विस्तृत अध्ययन किया। घुरिये के विचार में सन्यास भूतकाल का अवशेष मात्र नहीं है, अपितु यह हिंदू धर्म का प्राणभूत तत्व है। सन् 1968 में प्रकाशित भारत में सामाजिक तनाव' पुस्तक में घुरिये हिंदू और मुस्लिम सम्प्रदायों के बीच तनाव का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन किया है। इस तरह देखा जाय तो घुरिये का अध्ययन केन्द्र भारतशास्त्रीय उपागम रहा है।


के.एम. कपाड़िया - कपाड़िया घुरिये के शिष्य थे। जिन पर घुरिये के शोध परिपेक्ष्य एवं पद्धति का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। इन्होंने भी घुरिये की भाति अपने अध्ययनों में पौराणिक संस्कृत साहित्य, बौद्ध धर्म और यात्रियों के यात्रा-वर्णन, वृतान्तों एवं दस्तावेजो का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है। इस तरह से घुरिये की भाति इनकें अध्ययनों का स्वरूप भी मुख्य रूप से 'इण्ड्रोलाजिकल' रहा है।

इनके अध्ययन का प्रमुख विषय हिंदू विवाह, परिवार, एवं नातेदारी रहे है। जिसका उल्लेख इन्होंने अपनी पुस्तकें हिंदू नातेदारी (1947) और भारत में विवाह एवं परिवार (1955) में किया है। इन्होंने हिंदू विवाह को एक संस्कार के रूप में निरूपित किया है।


ईरावती कर्बे - ईरावती कर्बे भी जी.एस. घुरिये की शिष्या थी। संस्कृत के ज्ञान में उन्हें प्राचीन शास्त्रों जैसे-धर्म ग्रंथ, न्याय पुस्तकें, और महाकाव्यों के अध्ययन में मदद की। जिसका प्रभाव इनके सामाजिक अध्ययनों पर व्यापक रूप से पड़ा। कर्बे के अध्ययन का प्रमुख विषय भारत की जाति व्यवस्था, नातेदारी व्यवस्था, संयुक्त परिवार, ग्रामीण एवं नगरीय समुदाय है। इन्होंने अपनी पुस्तक किनशिप आर्गेनाइजेशन इन इण्डिया (1952) में भारत में नातेदारी व्यवस्था के अध्ययन के लिए भारत विद्याशास्त्र सम्बन्धी सभी स्त्रोत सामग्री का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया। भारतीय सामाजिक संरचना के अध्ययन के बारें में उनकी यह टिपण्णी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि जाति व्यवस्था, संयुक्त परिवार और ग्रामीण समुदाय भारतीय सामाजिक संरचना के तीन प्रमुख स्तम्भ है।

कर्बे ने इस तथ्य का खंडन कि वैदिक आर्यों की चातुर्वर्ण व्यवस्था ही आगे चलकर जातियों में बट गयी। कर्बे के मतानुसार जाति व्यवस्था या इस तरह की कोई सामाजिक व्यवस्था आर्यों के भारत में आगमन के पहले से यहां पर प्रचलित थी। कर्बे ने जाति को एक विस्तारित नातेदारी समूह या विस्तारित परिवार मानते हुए इसकी दो विशेषताएँ बतायी: अन्तः विवाही समूह और जाति का परम्परिक या पुस्तैनी व्यावसाय। संयुक्त परिवार का विश्लेषण करते हुए कर्बे ने सहनिवास, सहभोज, सहउपासना, साझा सम्पत्ति और नातेदारी संबंधों में आबद्धता को इस प्रकार के परिवार की प्रमुख विशेषताएँ बताई है।


पी.एन. प्रभू - इन्होंने हिंदू सामाजिक संगठन पर किये गये अपने अध्ययन में इस उपागम का प्रयोग करते हुए कर्म एवं पुनर्जन्म का सिद्धांत, पुरुषार्थ, आश्रम व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था, ऋण व यज्ञ, संस्कार आदि को हिंदू सामाजिक संगठन के दार्शनिक एवं संस्थागत आधार के रूप में प्रस्तुत किया। और वर्तमान समाज में इसकी निरन्तरता एवं इसकी प्रकार्यात्मक भूमिका को स्पष्ट किया।


लुई डयूमा फ्रांसीसी मानवशास्त्री लुई डयूमा भारतीय समाजशास्त्र के क्षेत्र में जाति व्यवस्था, नातेदारी, धर्म, एवं विवाह का अध्ययन का सराहनीय योगदान दिया है। इन्होंने जाति व्यवस्था और भारत की गांवो की सामाजिक सरंचना के अध्ययन के लिए भारत विद्याशास्त्रीय उपागम का व्यापक प्रयोग किया। उन्होंने जाति व्यवस्था को भारतीय समाज की आधारभूत संस्था माना है। उन्होंने जाति व्यवस्था को पवित्रता और अपवित्रता के आधार पर समझने का प्रयास किया है। डयूमा ने हिंदू समाज को समझाने के लिए इण्ड्रोलाजी खोतो (पौराणिक धार्मिक ग्रन्थों) का सहारा लेते हुए बाह्मणवादी दृष्टिकोण से समाज को समझने का प्रयास किया। जिसकी बाद में आलोचना भी हुई। “ भारत में समाजशास्त्र की पीठ " की स्थापना के अवसर पर हेग विश्वविद्यालय में डयूमा ने भाषण देते हुए कहा कि भारतीय समाजशास्त्र एक विशिष्ट ज्ञान की शाखा है जो भारत विद्याशास्त्र और समाजशास्त्र के संगम स्थल पर स्थित है। सन् 1970 में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'होमोहाईररकी' ने अन्तर्राष्ट्रीय जगत में उन्हें अग्रणी समाजशास्त्री के रूप कर दिया। आलोचात्मक मूल्यांकन


भारत विद्याशास्त्र अध्ययन की इस परम्परा पर बल देता है कि किसी समाज का अध्ययन उसके परमपरागत मूल्यों एवं साहित्यों के आधार किया जाना चाहिए। यहीं कारण है कि यह परिपेक्ष भारतीय समाज के अध्ययन में वेदो, पुराणो, स्मृतियों आदि जैसे प्राचीन ग्रन्थों को महत्व देता है जिनके अध्ययन का आधार अनुभाविक न होकर के धार्मिक एवं दार्शनिक होते है। इन्हीं कमियों के कारण भारतीय विद्याशास्त्रीय परिपेक्ष्य की कड़ी आलोचना होती है। यहा हम भारत विद्याशास्त्र की प्रमुख कमियों को रेखांकित कर रहे हैं जो निम्न है:


1. भारत विद्याशास्त्र के अध्ययन का आधार प्राचीन ग्रन्थ एवं साहित्य है। ये मूल रूप से धर्म एवं दर्शन पर आधारित होते है जिनमें तार्किता एवं वैज्ञानिकता की प्रयाप्त कमी दिखाई पड़ती है। जिस कारण इस परिपेक्ष्य की समाजशास्त्रीय ने कड़ी आलोचना की।


2. समाज परिवर्तनशील है समय के साथ समाज की प्रकृति भी बदलती रहती है भारतीय समाज एवं सामाजिक संस्थाओं में समय के साथ व्यापक परिवर्तन हुए है। प्राचीन ग्रंथ एवं साहित्य के अधार पर वर्तमान भारतीय समाज का अध्ययन संभव नहीं।


3. कई समाजशास्त्रियों के अनुसार आनुभाविकता का अभाव इस परिपेक्ष्य की प्रमुख कमी है। प्रमुख भारतीय समाजशास्त्री एम.एन. निवास भी इस परिपेक्ष्य की आलोचना करते हुए कहते है कि यह परिपेक्ष्य 'बुक ब्यू' पर आधारित है जिसकी सहायता से समाज का आनुभाविक अध्ययन संभव नही । उनका मानना था कि भारतीय समाजशास्त्र अनुमानात्मक विषय नही बल्कि अनुभावात्मक विषय है। ऐसे विषय का आधार 'बुक ब्यू' नही फील्ड ब्यू' होना चाहिए और भारतीय समाज के क्षेत्रीय अध्ययन के आधार पर समाज का विश्लेषण किया जाना चाहिए।


4. यह परिपेक्ष्य वर्तमान समाज के अध्ययन में प्राचीन ग्रंथों एंव साहित्यों के विश्लेषण पर बल देता है और क्षेत्रीय अध्ययन की उपेक्षा करता है इसलिए आलोचको का कहना है कि यह परिपेक्ष्य भारतीय समाज के केवल परमपरागत स्वरूप, धार्मिक एवं दार्शनिक आधारों के विश्लेषण में ही प्रांगिक रह जाता है। जब भारतीय समाज एवं संस्थाएं स्थिर नहीं रही है बल्कि निरंतर परिवर्तनशील रही है तो यह परिपेक्ष्य परिवर्तनशील भारतीय समाज का विश्लेषण कर पाने में अक्षम दिखाई पड़ता है।


5. उपर्युक्त कमियों के बाद भी भारतीय समाज के अध्ययन में भारत विद्याशास्त्र परिपेक्ष्य के महत्व को अस्वीकार नही किया जा सकता। भारतीय समाज मूल रूप से परमपरिक एवं प्राचीन संस्कृति वाला देश है जिसका प्रभाव वर्तमान भारतीय सामाजिक संस्थाओं पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। भारतीय सामाजिक परमपराएं कभी समाप्त नहीं हुए ये परम्पराऐं कुछ स्वरूप परिवर्तन के बाद भी वर्तमान समाज में अपनी निरंतरता बनाये हुए है जिनकों समझे बिना भारतीय समाज का व्यवस्थित अध्ययन संभव नहीं है। जिस कारण यह परिपेक्ष्य भारतीय समाज के अध्ययन में महत्वपूर्ण है। भारतीय समाजशास्त्रियों ने भी इस परिपेक्ष्य की कमियों को स्वीकार किया है और भारतीय समाज के अध्ययन में इसके साथ-साथ क्षेत्र कार्य को भी महत्व दिया है। इस परिपेक्ष्य का प्रयोग भारत के लगभग सभी प्रमुख समाजशास्त्रियों ने किया है। जिसमें जी.एस. घुरिये, ईरावती कर्बे, कपाड़िया, एम. एन. शाह आदि है। जिन्होंने अपने अध्ययन में भारत विद्याशास्त्र के साथ साथ क्षेत्रकार्य को भी महत्व दिया।