सामाजिक प्रतिमान की विशेषताएं , स्वरूप - Features, nature of social model

 सामाजिक प्रतिमान की विशेषताएं , स्वरूप - Features, nature of social model


सामाजिक आदर्श की मुख्या विशेषताओं को हम निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं - 1. सामाजिक आदर्शप्रतिमान से सम्बंधित दबाव के अनुदेश सकारात्मक अथवा नकारात्मक दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं।


2. सामाजिक आदर्शों के अनुशीलन करने की अपेक्षा प्रायः उस समाज के सभी सदस्यों से की जाती है। 


3. सामाजिक आदर्शों का पालन सामाजिक दबाव को ध्यान में रखकर किया जाता है।


4. सामाजिक आदर्श अनेक प्रकार के होते हैं, राजकीय, विधान या कानून, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, और संस्क्रितिकादी संस्थाओं द्वारा निर्मित नियम और जनारितियाँ प्रथाएँ, परम्पराएँ तथा रूढ़ियाँ इत्यादि।


5. सामाजिक आदर्शप्रतिमान मानव व्यवहार को प्रणालीबद्ध करने वाले नियम होते हैं।


6. भिन्न-भिन्न समूहों व समाजों में सामाजिक आदर्शों के स्वरुप भिन्न-भिन्न होते हैं।


सामाजिक प्रतिमान के स्वरूप (Types of Social Pattern) 


आदर्श प्रतिमान चूँकि संस्कृति का विशेष अंग है, अतः यह नानाविधि रूप में समाज में व्याप्त है। कुछ महत्वपूर्ण आदर्श प्रतिमान निम्नलिखित हैं -


1. जनरितियाँ - जनरितियाँ व्यवहार की वे मान्यता प्राप्त कार्यविधिकी है जो वैयक्तिक एवं समाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्वीकारमूलक एवं बाध्यतामूलक होती है तथा जिन्हें प्रत्येक पीढ़ी के लोग उन्हें अधिक या कम मात्र में स्वीकार करते रहते हैं। सभी जनसमूहों में जनारितियों की सत्ता पायी जाती है। जनारितियाँ सर्वत्र और सभी कालों में एक-सी नही रहती। समय और परिस्थिति के अनुसार बदलती रहती हैं।


2. प्रथाएँ - प्रथाएँ समूह व समाज द्वारा मान्यताप्राप्त एवं स्वीकृत कार्य करने व व्यवहार करने की वे प्रणालियाँ हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती हैं और जिसका भंजन करना शायद एक कठिन कार्य है। संक्षेप में कार्य करने व व्यवहार करने के विषय में जो बातें सामाजिक रूप से स्वीकृत होती हैं, उन्हें ही समाज की प्रथाएँ कहा जाता है।


3. रूढ़ियाँ - रूढ़ियाँ वे सामाजिक आदर्शप्रतिमान है जो कि किसी समूह व समाज के लिये व्यवहार के नैतिक मानदण्ड प्रस्तुत करते हैं तथा जिनका उल्लंघन करने पर उल्लंघनकर्ता को समूह व समाज द्वारा कठोर दण्ड दिया जाता है। जब कोई जनरीती व प्रथा मानव समूह में इतनी बद्धमूल हो जाती है कि वह उनके आचरण व व्यवहार को नियंत्रित करने लगती है तो वह रूधि कहलाने लगती है।