समिति की विशेषताएँ - Features of the Committee

 समिति की विशेषताएँ - Features of the Committee


विद्वानों द्वारा प्रस्तुत की गई परिभाषाओं के आधार पर समिति की कुछ प्रमुख विशेषताओं को निम्न प्रकार से प्रस्तुत किया जा सकता है-


क) व्यक्तियों का समूह


समिति व्यक्तियों का एक समूह होता है तथा इसका निर्माण व्यक्तियों द्वारा स्वयं आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रयोजन से किया जाता है। चूंकि व्यक्तियों को देखा तथा स्पर्श किया जा सकता है, अतः समिति एक मूर्त संगठन है।


ख) एक निश्चित संगठन


प्रत्येक समिति का एक निश्चित तथा निर्धारित संगठन रहता है। संगठन के अभाव में किस भी समिति द्वारा अपने उद्देश्यों तक पहुँच पाना दुष्कर रहता है। यदि समिति में संगठन की भावना नहीं है तो उसे मात्र एक भीड़ की संज्ञा प्रदान की जा सकती है। छात्र समूह, शिक्षक समूह, चिकित्सक समूह, कर्मचारी समूह, विद्यालय आदि समिति के प्रमुख उदाहरण हैं।


ग) विचारपूर्वक स्थापना


समिति एक ऐसा संगठन होता है जिसकी स्थापना मनुष्यों के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु विचारपूर्वक की जाती है। जब कुछ लोग अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के प्रयोजन से सचेतन विचार कर किसी संगठन का निर्माण करते हैं, तो इस प्रकार के संगठन को समिति का नाम दिया जाता है।


घ) निश्चित उद्देश्य


समिति का निर्माण मनुष्यों की आवश्यकताओं अथवा उद्देश्यों को पूरा करने हेतु किया जाता है। मनुष्य द्वारा अपने निजी हितों की पूर्ति हेतु समिति की आधारशिला रखी जाती है। उदाहरणस्वरूप, प्राथमिक शिक्षा की समृद्धि तथा विकास की दृष्टि से प्राथमिक शिक्षा समिति का निर्मित किया जाना। बिना किसी उद्देश्य के व्यक्तियों के समूह को समिति के रूप में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है। 


ङ) नियमों पर आधारित


प्रत्येक समिति के अपने कुछ नियम, उपनियम तथा कार्यप्रणालियाँ होती हैं। ये नियम, उपनियम तथा कार्यप्रणालियाँ मनुष्य के व्यवहारों और आचरण को नियमित व नियंत्रित करने के प्रयोजन से सहायक सिद्ध होती हैं। समिति में सदस्यता संबंधी योग्यता, सदस्यता शुल्क, अनुशासन आदि इन्हीं नियमों के ही उदाहरण हैं। किसी भी समिति में नियमों के स्वीकृत हो जाने के पश्चात उनका अनुपालन समस्त सदस्यों के लिए अनिवार्य हो जाता है। समिति के सदस्यों के मध्य के आपसी संबंध भी इन्हीं नियमों द्वारा निर्धारित व नियोजित होते हैं।


च) एच्छिक सदस्यता


किसी भी समिति में सदस्यता ग्रहण करना अथवा न करना व्यक्ति की इच्छा अथवा अनिच्छा पर निर्भर करता है। व्यक्ति अपने हितों के आधार पर समिति का निर्माण करता है तथा अपनी इच्छा के आधार पर ही किसी समिति का सदस्य बनाता है। साथ ही यदि व्यक्ति चाहे तो किसी भी समिति की सदस्यता से त्यागपत्र दे सकता है। 


छ) अस्थायी प्रकृति


समिति का निर्माण सामान्यतः कुछ उद्देश्यों की पूर्ति हेतु किया जाता है तथा उद्देश्य की पूर्ति के पश्चात समिति को समाप्त कर दिया जाता है। इस कारण समिति की प्रकृति को अस्थायी माना जाता है। उदाहरणस्वरूप, किसी कारखाने में कार्यकर्ता अपने निजी हितों की पूर्ति हेतु आंदोलन करते हैं तथा एक कर्मचारी सेवा समिति का गठन करते हैं। जैसे ही कर्मचारियों के हितों की पूर्ति हो जाती है, उस कर्मचारी सेवा समिति को भंग कर दिया जाता है। 


ज) औपचारिक संबंध


किसी समिति के सदस्यों के मध्य पाये जाने वाले संबंध औपचारिक प्रकार के होते हैं। व्यक्ति अपने निजी उद्देश्यों को पूरा करने हेतु समितियों का नियोजन करता है तथा उद्देश्यों की पूर्ति हेतु व्यक्ति अनेक समितियों का सदस्य रहता है। अनेक समितियों का सदस्य होने के नाते भी वह अन्य सदस्यों के साथ घनिष्ठता स्थापित नहीं कर पाता है। इसके अलावा समितियों का संचालन कुछ नियमों के अनुरूप होता है तथा इस वजह से भी सदस्यों के मध्य औपचारिक संबंध पाये जाते हैं।


झ) साधन के रूप में


समिति का निर्माण किसी उद्देश्य की प्राप्ति हेतु किया जाता है, अतः यह उद्देश्यों के लिए बनाया जाने वाला संगठन है। अर्थात् व्यक्ति के लिए उद्देश्यों तक पहुँचने के लिए समिति एक साधन के रूप में कार्य करती है, न कि यह स्वयं एक साध्य होती हैं।