संस्था की विशेषताएँ - Features of the organization
संस्था की विशेषताएँ - Features of the organization
गिलिन तथा गिलिन ने अपनी पुस्तक 'कल्चरल सोशिओलाजी' में संस्था की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई है-
1) सांस्कृतिक व्यवस्था में इकाई के रूप में
हैमिल्टन ने संस्था को सामाजिक रीति-रिवाजों का गुच्छा कहा है। मनुष्य के व्यवहार ही समाज द्वारा स्वीकृत होकर जनरीतियों व रूढ़ियों के रूप में स्थापित हो जाते हैं तथा इनका स्थायी रूप ही संस्था के नाम से जाना जाता है। संस्कृति के निर्माण में अनेक विचारों, विश्वासों, कार्यविधियों, परम्पराओं आदि का योगदान होता है तथा ये सब संस्कृति की विभिन्न इकाइयां हैं। इन्हीं इकाइयों की सुव्यवस्थित प्रणाली को संस्था कहा जाता है। इस प्रकार से संस्था को हम सामाजिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण इकाई के रूप में व्याख्यायित कर सकते हैं।
2) नियमों तथा कार्य प्रणालियों की व्यवस्था
संस्था व्यक्तियों का समूह न होकर नियमों व कार्यप्रणालियों की एक व्यवस्था है। समाज द्वारा स्वीकृत नियमों और कार्यप्रणालियों की व्यवस्था को ही संस्था के नाम से जाना जाता है। यह व्यवस्था मनुष्य की जीवन विधियों को व्यवस्थित बनाए रखती है।
3) अमूर्त प्रकृति
चूंकि यह नियमों व कार्यप्रणालियों की व्यवस्था है तथा इन्हें हम देख नहीं सकते और ना ही स्पर्श कर सकते हैं। अतः संस्था की प्रकृति अमूर्त प्रकार की होती है। समाज की ही तरह संस्था भी अमूर्त प्रकृति की है।
4) अधिक स्थायित्व
एक लंबे समय के पश्चात संस्थाओं का विकास होता है तथा यह विकास कार्य के विशिष्ट तरीके की उपयोगिता के प्रमाणित हो जाने के पश्चात होता है।
यही कारण है कि संस्थाएं काफी लंबे समय तक क्रियाशील रहती हैं। उदाहरण के रूप में हम जाति व्यवस्था को ले सकते हैं। यह व्यवस्था भारतीय समाज में सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है तथा यह कई रूपों में मानवीय व्यवहारों को नियंत्रित करती है।
5) स्पष्ट उद्देश्य
प्रत्येक संस्था का विकास किसी न किसी मानवीय आवश्यकता की पूर्ति के प्रयोजन से होता है तथा ये प्रयोजन इतने स्पष्ट रूप में रहते हैं कि इनकी उपस्थिति और उपयोगिता प्रत्यक्षतः परिलक्षित होती है। संस्था द्वारा जब तक मानवीय उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो जाती है, वह निरंतर उसे पूरा करने में लगी रहती है। मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के उद्देश्य तथा संस्था के कार्य दोनों ही पूर्ण रूप से स्पष्ट रहते हैं। प्रत्येक संस्था के एक अथवा अधिक निश्चित उद्देश्य होते हैं तथा इन उद्देश्यों का संबंध मानवीय आवश्यकताओं से रहता है।
6) सांस्कृतिक उपकरण
प्रत्येक संस्था के कुछ भौतिक तथा अभौतिक उपकरण होते हैं तथा ये उपकरण संस्था की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी रहते हैं। विचार, व्यवहार, आदर्श, मूल्य, कार्यप्रणाली आदि संस्था के अभौतिक उपकरण होते हैं तथा मशीन, यंत्र, भवन आदि संस्था के भौतिक उपकरण होते हैं। इन उपकरणों की ही सहायता से संस्था के कार्य सम्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए यदि विवाह संस्था को लें, तो मंडप, कलश, चावल, फूल-माला, मंत्र, संस्कार आदि विवाह के भौतिक तथा अभौतिक उपकरण ही हैं।
7) प्रतीक
प्रत्येक संस्था के अपने पृथक प्रतीक होते हैं तथा यह प्रतिक भौतिक अथवा अभौतिक किसी भी रूप में हो सकता है। उदाहरणस्वरूप, सगाई में प्रतीक स्वरूप अंगूठी भेंट में देना, विवाह के उपरांत प्रतीक स्वरूप सिंदूर लगाना, किसी भी शैक्षिक दस्तावेज़ पर प्रतीक स्वरूप कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय की सील का लगा होना आदि।
8) सुस्पष्ट परंपराएँ
संस्थाओं में परम्पराओं का बड़ा महत्व होता है। इसमें कुछ परंपराएँ लिखित स्वरूप में होती हैं तथा कुछ अलिखित स्वरूप में भी रहती हैं। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि परंपरा लिखित स्वरूप में अथवा अलिखित स्वरूप में; उसका महत्व मानवीय व्यवहारों के निर्धारण में मुख्य ही होता है। इन परम्पराओं का पालन करना संभवतः सदस्यों के लिए अनिवार्य होता है तथा इनका पालन न करने पर सदस्यों को सामाजिक रूप से दंडित किए जाने का प्रावधान भी है। ये परंपराएँ सदस्यों के व्यवहारों में अनुरूपता अथवा समानता लाने में भी आवश्यक भूमिका निभाती हैं।
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