उद्विकास के स्वरूप - Forms of Evolution

 उद्विकास के स्वरूप - Forms of Evolution

उद्विकासवादियों ने उद्विकास के चार प्रमुख स्वरूपों का उल्लेख किया है। 


समरेखीय उद्विकास (Unlinear Evolution )


प्रारंभिकउद्विकासवादियों की मान्यता थी कि समरेखीय उद्विकास, उद्विकास की वह प्रक्रिया है जिसमें उद्विकास एक सीधी रेखा में और एक निश्चित क्रम में हुआ है। आज हम विश्व के सभी समाजों और संस्कृतियों का अध्ययन करें तो पाते हैं कि यह सभी कुछ निश्चित स्तरों से होकर प्रगति की ओर बढ़ रही हैं और इनका अंतिम उद्देश्य पूर्णता की स्थिति को प्राप्त करना है। समरेखीय उद्विकास में निम्न विशेषताएं पाई जाती हैं -


1. यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें वृद्धि और विकास एक ही दिशा में होता है। जिन चरणों से होकर वह एक बार गुजर जाए पुनः लौटकर वहां नहीं पहुंच सकता। 


2. प्रत्येक समाज विकास के कुछ निश्चित चरणों से गुजरता है।


3. उद्विकास में प्रगति निहित है। प्रत्येक अगला चरण पिछले चरण से उच्च एवं उत्तम समझा जाता है।


4. समरेखीय उद्विकास को मानने वाले विद्वानों में मार्गन, अगस्त कॉम्ट, बैकोफैन, टॉयलर, हेडन, लेबिबुहल, आदि प्रमुख है। समरेखीय विकासवादी समाज, संस्कृति, धर्म, आर्थिक जीवन, परिवार, विवाह, भाषा आदि के विकास के निश्चित स्तरों एवं क्रम का उल्लेख करते हैं।


जैसेमार्गन समाज का विकास जंगली अवस्था, बर्बर अवस्था एवं सभ्य व्यवस्था में मानते हैं। मार्गन ने परिवार के उद्विकास के पांच स्तरों का वर्णन किया हैयह हैं समरक्त परिवार समूह परिवार, सिंडेसिमयन परिवार, पितृसत्तात्मक परिवार तथा एक विवाही परिवार


टायलर धर्म का विकास बहुदेववाद से एकदेववाद की ओर मानते हैं। आर्थिक जीवन का विकास भी शिकारी अवस्था, पशुपालन अवस्था, कृषि एवं प्रौद्योगिक अवस्थाओं के रूप में हुआ है। कला का उद्विकास भी प्राकृतिक, प्रतीकात्मक एवं ज्यामिति स्तरों से हुआ है। कोई भी समाज या संस्कृति विकास के किस स्तर पर है। इसका मूल्यांकन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वे किस अवस्था को पार करके वर्तमान अवस्था में आए हैं।


अगस्त कॉम्ट के अनुसार मानव इतिहास भी सभ्यता के तीन स्तरों से गुजरा हुआ माना जाता है।


1. दैवीय और सैनिक युग -इस युग में सामान्य सैद्धांतिक अवधारणाओं पर ईश्वरी प्रभाव रहता है। इसमें कल्पना को महत्व दिया जाता है। अवलोकन एवं अन्वेषण को स्वीकार नहीं किया जाता सामाजिक संबंधों का प्रमुख आधार सेना होती है तथा विजय प्राप्त करना ही समाज का प्रमुख उद्देश्य होता है।


2. तात्विक और न्यायिक युग यह युग संक्रांति काल माना जाता है। इसमें उद्योगों का विकास प्रारंभ होने


लगता है। पर समाज का स्वरूप न तो पूर्णतः सैनिक होता है और न ही औद्योगिक। 3. विज्ञान और उद्योग का युग इस युग में सभी विशिष्ट एवं सामान्य सैद्धांतिक अवधारणाएं वैज्ञानिक हो जाती हैं। अवलोकन एवं अन्वेषण को महत्व मिलने लगता है। इस युग में वैज्ञानिक और औद्योगिक उन्नति को प्राप्त करना ही प्रमुख उद्देश्य होता है। इस अवस्था में सामाजिक तकनीकी और आध्यात्मिक सभी दृष्टि से प्रगति होती है।

मार्क्स और एंजल्स ने भी समाज के विकास को एक रेखीय रूप में प्रस्तुत किया है। इनके अनुसार भी प्रत्येक


समाज तीन स्तरों से गुजरता है


1. सामंतवादी समाज


2. पूंजीवादी समाज


3. साम्यवादी समाज


सभ्यता के प्रत्येक स्तर में इनकी विनाश के बीज भी मौजूद होते हैं, जो उसे आगे के स्तर के लिए तैयार करते हैं। एक स्तर से दूसरे स्तर में संक्रमण ऐतिहासिक दृष्टि से आवश्यक एवं अनिवार्य है। 


बहु रेखीय उद्विकास (Multilinear Evolution)


जूलियन स्टीवर्ट ने उद्विकास के समरेखीय सिद्धांत के स्थान पर बहुरेखीय सिद्धांत को प्रस्तुत किया है। इनका मानना है कि विश्व के सभी समाज और संस्कृति उद्विकास के समान स्तरों से नहीं गुजरे हैं बल्कि अलग अलग रहा है।-अलग क्षेत्रों में उनके विकास का क्रम अलग-स्टीवर्ट ने अमेरिका, मेसोपोटामिया, मिस्र और चीन की संस्कृतियों और समाज का अध्ययन करने के बाद बताया कि यह सभी विभिन्न क्रमों से उद्विकसित होकर सामान्य अवस्था में पहुंचे हैं।

सिद्धांत के इस विचारधारा के समर्थकों का मत है कि उद्विकास का कोई एक क्रम न होकर अनेक क्रम होते हैं। उदाहरण के तौर पर एक समाज पहले पशुपालन अवस्था में रहकर फिर शिकारी, कृषि, औद्योगिक अवस्था को प्राप्त करता है। उसी तरह परिवार भी बहु पत्नी विवाह, बहुपति विवाह, समूह विवाह से एक विवाह की स्थिति में पहुंचता है। इस विचारधारा का जन्म समरेखीय उद्विकास की आलोचना के रूप में हुआ है।


चक्रीय उद्विकास (Cyclic Evolution )


इस प्रकार के उद्विकास में विश्वास रखने वाले विद्वानों का मत है कि उद्विकास कभी भी एक सीधी रेखा में नहीं होता है। बल्कि यह चक्र के रूप में पेंडुलम की तरह होता है। यह उतारचढ़ाव के रूप में- होता  है। उद्विकास का यह मत सबसे बाद में आया है। इसलिए इसे नव उद्विकासवादी विचारधारा भी कहते हैं। लेसली व्हाइट, ओसवाल्ड, स्पैंगलर, सोरोकिन, टॉयनवी, आदि इस विचारधारा का समर्थन करते हैं। इसके समर्थकों का कहना है कि कोई भी सामाजिक संस्था एक विशिष्ट रूप में प्रारंभ होती है। पर वह धीरेधीरे इसके विपरीत दिशा की ओर भी विकसित हो सकती है। और आगे चलकर वह पुनः अपने रूप में भी आ सकती है।

इसे हम उदाहरण के द्वारा समझ सकते हैं कि प्रारंभ में समाज में सामूहिक संपत्ति का महत्व था पर धीरेधीरे व्यक्तिगत संपत्ति का महत्व बढ़ने लगा।


पुनः सामूहिक अधिकार और सामूहिक स अबपत्ति की अवधारणा पनपने लगी है। स्पैंगलर ने सभ्यताओं के उत्थान और पतन के चक्र को प्रस्तुत किया और उद्विकास का चक्रीय रूप समझाया। टायनबी ने अपनी पुस्तक 'ए स्टडी ऑफ हिस्ट्री' (A study of History) में विश्व की अध्ययन संस्कृतियों का 20 कर उनमें वृद्धि के समान प्रतिमानो को ढूंढा तथा उनके उद्विकास के इतिहास का उल्लेख किया। सोरोकिन ने भी समाज के उद्विकास के चक्रीय स्वरूप को व्यक्त किया है।


सार्वभौमिक उद्विकास (Universal Evolution)


उद्विकास की इस विचारधारा के अनुसार मानव समाज का विकास सरलता से जटिलता की ओर हुआ है। यह उद्विकास के निश्चित चरणों में या सम रेखीय उद्विकास में विश्वास नहीं रखता और न ही इस बात को मानता है कि सभी समाजों के विकास सामान स्तरों से गुजरते हैं। सार्वभौमिक उद्विकास का सिद्धांत ही मानता है कि संपूर्ण मानव समाज का उद्विकास हुआ है और इसके परिणाम एवं स्वरूप अलग-अलग रहे हैं। इस विचारधारा के समर्थक स्पेंसर हैं जो उद्विकास को समानता से असमानता की ओर और समरूपता से बहुरुपता की ओर परिवर्तित होना मानते हैं।