प्रत्यक्षवाद के स्वरूप - Forms of Positivism
प्रत्यक्षवाद के स्वरूप - Forms of Positivism
प्रत्यक्षवाद जीवन के किन पहलुओं में उपयोगी है इसका जीवन में क्या उपयोग है इस दृष्टि से अगस्त कॉम्ट ने प्रत्यक्षवाद को तीन भागों में विभाजित किया है इसका उद्देश्य मानव का अधिक से अधिक कल्याण करना है कॉम्ट में प्रत्यक्षवाद को तीन भागों में बांटा है
1. विज्ञानों का दर्शन (Philosophy of Science)
इस धारणा के आधार पर मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। उसे अपनी स्थिति में परिवर्तन के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उसे अपनी उन्नति के लिए स्वयं प्रयत्न करते रहना चाहिए। इसके लिए उसे स्वयं की मदद के सिद्धांत को अपनाना चाहिए। प्रत्यक्षवाद का यह भाग स्वयं के प्रयासों में विश्वास करने एवं कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। यह हमें भाग्यवादी नहीं मानता इसके अंतर्गत कॉम्ट में गणितशास्त्र, खगोलशास्त्र, भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र, प्राणीशास्त्र एवं समाजशास्त्र को सम्मिलित किया है।
2. वैज्ञानिक धर्म एवं नीति (Scientific Religion and Ethnic )
अगस्त कॉम्ट के अनुसार प्रत्यक्षवाद मानवतावादी धर्म है और उसका संबंध अलौकिक प्राणियों एवं शक्तियों से नहीं है। मानव कल्याण इसका प्रमुख उद्देश्य है। इसका संबंध मानव मूल्य एवं नैतिकता से है। इसके द्वारा मानव कल्याण के लिए कार्य किए जाते हैं। प्रत्यक्षवाद का नैतिक नियम है दूसरों की भलाई के लिए नैतिक, बौद्धिक एवं भौतिक विकास करना। यह समाज के लिए उच्च आदर्श प्रस्तुत करता है।
3. प्रत्यक्षवादी राजनीति (Positive Politics)
कॉम्ट के अनुसार प्रत्यक्षवादी राजनीति का मुख्य उद्देश्य युद्ध की संभावनाओं को समझना है। युद्ध से मानव का कल्याण नहीं हो सकता। अतः मनुष्य को युद्ध का बहिष्कार करना चाहिए तथा प्रेम एवं स्नेह के सिद्धांत पर काम करना चाहिए। इसी से मानव कल्याण एवं मानव विकास संभव है।
इस सिद्धांत का उद्देश्य था “युद्ध को समाप्त करना एवं समकालीन यूरोप के समस्त राज्यों को मिलाकर एक मित्र राष्ट्र की स्थापना करना।"
अगस्त कॉम्ट का प्रत्यक्षवाद के संबंध में जे.एच.ब्रीजेस (J.H.Bridges) ने लिखा है “अगस्त कॉम्ट घटनाओं की दुनिया के उस पार अव्यवस्थित गूढ़ रहस्य के संबंध में अत्याधिक सचेत थे। इसे वह प्रत्येक पग पर उसी तरह अनुभव करते रहे। जिस प्रकार एक नाविक उस अथाह समुद्र के विषय में सचेत रहता है। जिसके बीच से होकर उसे अपना मार्ग निश्चित करना पड़ता है। उस रहस्य को भेद करना मनुष्य का काम नहीं है। इसलिए उसे अपनी क्रियाओं को उस क्षेत्र की ओर मोड़ना होगा जहां कि उसे उसका फल मिल सके। पृथ्वी का आकर्षण शक्ति का अंतिम स्रोत, पंच महाभूत के अंतिम गठन, विद्युत शक्ति, रासायनिक संबंध आदि की पूर्ण एवं अंतिम व्याख्या यह सभी विषय हमसे सदैव ही छिपे रहे हैं। उसी प्रकार जीवन की उत्पत्ति और प्रेम की पृथम प्रवृत्ति भी कम अंधकार में नहीं है। इसका क्यों? और कहां? से हम नहीं जान सकते यही हमारे लिए पर्याप्त होगा कि हम इनके कैसे को अर्थात इनकी क्रियाशीलता को जान ले।"
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