विकास के चार गौण नियम - Four Secondary Laws of Development

 विकास के चार गौण नियम - Four Secondary Laws of Development


शक्ति पदार्थ एवं गति के संबंध में तीन बुनियादी या प्राथमिक नियम (Three fundamental law) का प्रतिपादन करने के बाद स्पेंसर ने विकास के चार गौण नियमों (Four secondary proposition) का प्रतिपादन किया। यह नियम इस प्रकार हैं


नियमों की एकता का नियम ( Law of uniformity of law)


 स्पेंसर के अनुसार संसार में सभी स्थानों पर एक ही नियम कार्य करते हैं। किन्ही दो नियमों में कभी भी विरोध संभव नहीं है। हमें जो भिन्न भिन्न नियम दिखाई देते हैं। वास्तव में वे विभिन्न नहीं होते ऐसा संभव नहीं है कि एक जगह एक नियम काम करें तो दूसरी जगह उसका विरोधी। अगर कहीं हमें विरोधी नियम दिखाई देते हैं तो अध्ययन के बाद स्पष्ट हो जाता है कि वह नियम विरोधी न होकर उसका रूपांतर होता है। नियम रूपांतरित हो सकता है। पर उसकी आत्मा वही रहती है। इसलिए स्पेंसर ने इसे एकता का नियम नाम दिया है।


रूपांतरण तथा समानता का नियम (Law of Transformation and Equivalence)


यह दूसरा गौण नियम है। इस नियम के अनुसार वस्तु का नाश नहीं होता केवल रूपांतरण होता है। रूपांतरण में उसकी मात्रा उतनी की उतनी ही बनी रहती है। इसलिए स्पेंसर ने इसे रूपांतरण एवं समानता का नियम नाम दिया है। 



अधिकतम आकर्षण तथा न्यूनतम प्रतिरोध का नियम (Law of least Resistance and Greatest Attraction)


विकास की प्रक्रिया का यह तीसरा गौण नियम है। इस नियम के अनुसार विकास की प्रक्रिया में प्रत्येक वस्तु या पदार्थ की गति सदैव अधिकतम आकर्षण की ओर होती है तथा न्यूनतम प्रतिरोध उत्पन्न करती है। उदाहरण के लिए पानी का बहाव उसी दिशा में होता है। जहां वह पहले से बह रहा हो उसका जमाव भी वही होगा जहां पहले से पानी है। उसी तरह हवा का बहाव भी उसी तरह होता है। जहां कम से कम रुकावट हो ।


लय तथा क्रमिक गति का नियम (Freedom or alternation of motion)


यह अंतिम गौण नियम है। स्पेंसर के अनुसार विकास के लिए गति आवश्यक है और गति एक समान नहीं चलती। इसलिए लय का नियम काम करता है। विकास के लिए आवश्यक गति में आरोह के बाद अवरोह आता है। गति में क्रमिक परिवर्तन होता है। गति कभी तीव्र होने के बाद धीमी पड़ जाती है और धीमी के बाद तीव्र हो जाती है। गति के इसी परिवर्तन के द्वारा विकास की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। स्पेंसर का कहना है कि उपरोक्त तीन बुनियादी नियमों एवं चार गुण नियमों को आधार बनाकर भौतिक विज्ञान के विकास की प्रक्रिया आरंभ होती है। विकास की प्रत्येक प्रक्रिया में सातों नियम किसी न किसी रूप में आवश्यक रूप से लागू होते हैं।

स्पेंसर के अनुसार जब यह सातों नियम क्रियाशील होते हैं तो विकास का एक नया नियम क्रियाशील हो जाता है, और वह नियम है कि जैसे-जैसे पदार्थ (Matter) में एकीकरण (Integration) की प्रक्रिया बढ़ती जाती है। वैसे वैसे गति (Motion) मे विकीर्णता ( Dissertation) की प्रक्रिया होने लगती है। जैसे-जैसे पदार्थ में विभेदीकरण (Differentiation) की प्रक्रिया होने लगती है। वैसे वैसे गति में विलीनीकरण (Absorption) की प्रक्रिया होने लगती है। कहने का अभिप्राय यह है कि पदार्थ तथा गति दोनों नष्ट नहीं होते, एक घटता है तो उसी अनुपात में दूसरा बढ़ जाता है। अर्थात विकास की प्रक्रिया में गति और पदार्थ का अनुपात सामान बना रहता है।


स्पेंसर के इस सिद्धांत का सारांश यह है कि भौतिक विकास की जो प्रक्रिया है। उसमें विकास की गति अव्यक्त से व्यक्त की तरफ अनिश्चित से निश्चित की तरफ एक तत्व से बहुतत्व की तरफ तथा सामान्य से विशिष्ट की ओर होती है। स्पेंसर के भौतिक विकास का यह क्रम सांख्य दर्शन में ठीक इसी तरह पाया जाता है। वहां भी यही कहा गया है कि भौतिक विषय भौतिक विकास की दिशा में अव्यक्त से व्यक्त की तरफ प्रकृति से विकृति की तरफ जा रही है। स्पेंसर का भौतिक विकास के संबंध में एक ही सा सोचना यह सिद्ध करता है कि संसार के भिन्नअलग देश तथा काल में रहते हुए भी एक ही दिशा में विचारक अलग भिन्न सोच सकते हैं।