धर्म के कार्य - Function of Religion

 धर्म के कार्य - Function of Religion

दुर्खीम के अनुसार धर्म का स्रोत स्वयं समाज है। धार्मिक विचार समाज की विशेषताओं के अतिरिक्त और कुछ नही है। पवित्र अथवा ईश्वर केवल समाज का मानवीकरण है और धर्म का सामाजिक कार्य सामाजिक एकता की उत्पत्ति वृद्धि और स्थिरता में है। अतः दुर्खीम के अनुसार समाज ही वास्तविक देवता है। ईश्वर है। वह स्वयं लिखता है "मैं देवी शक्ति में समाज की प्रतिछाया और प्रतीकात्मक धारणा से अधिक नहीं देखता"। कुछ


दुर्खीम ने धर्म के निम्नलिखित कार्यों का उल्लेख किया है


1. धर्म समाज के लोगों को सार्वजनिक एवं सामूहिक जीवन में भाग लेने तथा अनुशासन में रहने की प्रेरणा देने का काम करता है।


2. जो लोग किसी एक विशेष धर्म को मानते हैं, उससे संबंधित संस्कारों का पालन करते हैं, उसमें विश्वास व्यक्त करते हैं, उन सभी में एकता की भावना पाई जाती है। धर्म सामाजिक एकता को बनाए रखने में मददगार होता है।


3. धर्म समूह को पुनर्जीवन प्रदान करता है क्योंकि समाज में धार्मिक उत्सवों का पालन व्यक्ति सामूहिक रूप से करता है और यह सामूहिकता व्यक्ति में नवीन चेतना को जागृत करती है।


4. धर्म संवेगों और भावनाओं को संतुलन प्रदान करने का कार्य करता है। 


5. धर्म व्यक्ति के जीवन में समाज की उपयोगिता को सिद्ध करता है।


6. धर्म समाज पर एक आदर्शात्मक प्रभाव डालता है।


7. धर्म पवित्र वस्तुओं से संबंधित विश्वासों की संगठित व्यवस्था है और यह व्यवस्था एक धर्म मानने वालों को एक नैतिक समुदाय में बांधती है।


8. सामाजिक जीवन के अस्तित्व को बनाए रखना और उसकी रक्षा करना धर्म का प्रमुख कार्य है।


दुर्खीम ने यह विवेचना करने का प्रयास किया है कि धर्म समाज में इन कार्यों को कैसे पूरा करता है? दुर्खीम ने ज्ञान के समाजशास्त्र के द्वारा यह स्पष्ट किया है कि धर्म केवल नैतिक और धार्मिक नियमों की उत्पत्ति का स्रोत ही नहीं है बल्कि वैज्ञानिक और तार्किक चिंतन की उत्पत्ति भी धर्म से हुई है।


इस तरह दुर्खीम का यह ग्रंथ न केवल धर्म की समाजशास्त्री व्याख्या प्रस्तुत करता है बल्कि ज्ञान नैतिकता एवं मूल्यों को भी स्पष्ट करता है। दुर्खीम ने अपने इस ग्रंथ में आत्मा-परमात्मा एवं देवात्माओ आदि से संबंधित विचारों को भी समूहवादी दृष्टिकोण के द्वारा स्पष्ट किया है। दुर्खीम ने अपने इस पुस्तक के अंतिम भाग में सकारात्मक-नकारात्मक एवं शोकात्मक संस्कारों और धार्मिक क्रियाओं की विवेचना की है। दुखम के अनुसार धर्म संपूर्ण सभ्यता का उद्गम है। दुर्खीम धर्म को एक वास्तविकता के रूप में भी स्वीकार करते हैं क्योंकि समाज भी एक वास्तविकता है। धर्म नैतिक जीवन का जन्मदाता है पर वर्तमान समय में परिवर्तन के कारण धार्मिक विश्वासों और क्रियाओं में बहुत अधिक परिवर्तन हो गया है। जिससे नैतिक सत्ता कमजोर पड़ती जा रही है। यही कारण है कि आजकल सामाजिक एकता खतरे में पड़ गई है। इसलिए दुर्खीम आधुनिक समाज के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए किसी ऐसी व्यवस्था को आवश्यक मानते हैं जो नवीन परिस्थितियों के साथ अनुकूलन कर सकें और व्यक्ति के नैतिक आचरण को नियंत्रित व नियमित कर सके। इसमें धर्म अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।