संस्था के प्रकार्य तथा महत्व - Functions and Importance of Organization
संस्था के प्रकार्य तथा महत्व - Functions and Importance of Organization
संस्थाएं निम्नलिखित महत्वपूर्ण कार्य करती हैं -
1. मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति
जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि प्रत्येक संस्था का निर्माण किसी न किसी मानवीय आवश्यकता की पूर्ति के उद्देश्य से होता है। यही कारण है कि संस्थाओं को मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने वाले साधन के रूप में भी व्याख्यायित किया जाता है।
2. सदस्यों के कार्य को सरल बनाना
संस्था का एक महत्वपूर्ण कार्य यह है कि यह समाज के सदस्यों द्वारा किए जाने वाले कार्यों को सरल बनती है। संस्था मानव व्यवहार के सभी आचरणों को एक सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत कर यह स्पष्ट करती है कि समाज के अंतर्गत सदस्यों के कार्य क्या होने चाहिए ? अथवा उनके द्वारा किए जाने वाले कार्यों की दिशा क्या होनी चाहिए? इस प्रकार संस्था कार्य करने हेतु एक निश्चित प्रणाली अथवा विधि प्रदान कर सदस्यों के लिए कार्यों को करना अपेक्षाकृत सरल बना देती है।
3. व्यवहारों में अनुरूपता
प्रत्येक संस्था की एक निश्चित कार्यप्रणाली तथा नियमावली होती है तथा समाज के सदस्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु इन्हीं की सहायता लेते हैं। किसी समाज के सदस्य जब किसी आवश्यकता की पूर्ति हेतु संस्था की कार्यप्रणाली तथा नियमावली का सहारा लेते हैं तो स्वाभाविक है कि उनके व्यवहारों में समानता होगी। अतः संस्था मानवीय व्यवहारों में अनुरूपता लाती है।
4. मानवीय व्यवहारों पर नियंत्रण
सामाजिक संस्थाएं मानवीय व्यवहारों को नियंत्रित करने का प्रमुख साधन समझी जाती हैं। ये संस्थाएं मनुष्यों द्वारा किए जाने वाले कार्यों के लिए एक दिशा प्रदान करती हैं, उनके व्यवहार करने के तरीकों को एक प्रारूप प्रदान करती हैं तथा प्रदान किए गए प्रारूप व दिशा के अनुरूप ही सदस्य को कार्य करने का आदेश देती हैं।
हमारे समाज में नियंत्रण के प्रमुख साधन के रूप में दो शक्तिशाली संस्थाएं हैं – परिवार तथा जाति व्यवस्था हजारों सालों से मानवीय व्यवहारों को नियंत्रित करने के महत्वपूर्ण साधन के रूप में विद्यमान रही हैं।
5. संस्कृति का वाहक
संस्थाओं का एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित करना है। संस्थाओं की सहायता से संस्कृति का संरक्षण होता है तथा संस्कृति के स्थायित्व में भी संस्थाओं की भूमिका उल्लेखनीय होती है। संस्कृति के प्रमुख वाहक के रूप में हम परिवार नामक संस्था को समझ सकते के हैं।
6. भूमिका तथा प्रस्थिति का निर्धारण
संस्था समाज के सदस्यों के लिए भूमिका तथा प्रस्थिति का निर्धारण भी करती है। विवाह संस्था द्वारा पुरुष को पति की प्रस्थिति प्रदान की जाती है तथा महिला के लिए पत्नी की प्रस्थिति निर्धारित की जाती है। इसी निर्धारित की गई प्रस्थिति के आधार पर वे अपनी भूमिका का निर्वाह करते हैं।
7. सामाजिक परिवर्तन में सहायक
हालांकि संस्थाएं रूढ़िवादी प्रकृति की होती हैं तथा इनमें परिवर्तन शीघ्र नहीं होते हैं। परंतु परिस्थितियों में परिवर्तन होने के पश्चात सामाजिक संस्थाएं भी परिवर्तित होती हैं। जिस प्रकार से मानवीय आवश्यकताओं परिवर्तित होती हैं, उसी के अनुरूप संस्थाओं का परिवर्तित होना स्वाभाविक है। यदा-कदा समय के साथ-साथ सामाजिक संस्थाओं को परिवर्तित करने के प्रयत्न भी किए जाते हैं तथा सामाजिक संस्थाओं के परिवर्तन से सामाजिक परिवर्तन की संभावनाएं भी तेज हो जाती हैं।
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