समाज व प्राणी में असमानताएं - inequalities in society and life
समाज व प्राणी में असमानताएं - inequalities in society and life
स्पेंसर ने इस विचार का खंडन किया कि समाज व्यक्तियों का साधारण संग्रह नहीं है। यह संपूर्ण व्यक्तियों का संकलन है। उन्होंने कहा है कि सामाज एक जीव नहीं बल्कि महाजीव है। स्पेंसर के अनुसार के समाजों की आंतरिक संरचना में भिन्नता होती है, जैसे कि आदिवासी समाज इस भिन्नता के बावजूद प्रत्येक सामाजिक महाजीव (सुपर ऑर्गेनिक ( है। इसी अर्थ में स्पेंसर ने संस्कृति को अधिसावयवी या सुपरऑर्गेनिक कहा है। संभवत स्पेंसर ने अपने व्यक्तिवादी विचारों के कारण समाज को बार-बार अधिसावयवी अस्तित्व कहा है। स्पेंसर के लिए यह आवश्यक था कि वह समाज और जीव की इन भिन्नताओं को दर्शाए क्योंकि उन्हें जीव को स्वतंत्र प्रथक महत्वपूर्ण एवं विशिष्ट प्रस्तुत करना था। यही कारण है कि उन्होंने सदृश्य शब्द का प्रयोग किया समानता शब्द का नहीं। स्पेंसर ने कॉम्ट का अनेक कारणों से विरोध किया परंतु एक बड़ा कारण कॉम्ट का समूह या सामूहिकतावाद एवं स्पेंसर का व्यक्तिवाद था। इसलिए स्पेंसर ने जीव और समाज में कुछ भिन्नताओं को दर्शाया है
मूर्त एवं अमूर्त स्वरूप
मनुष्य एवं समाज में सबसे पहली विभिन्नता यह है कि मानव अंग मूर्त होते हैं जबकि समाज अमूर्त होता है। मानव अंग को देखा एवं छुआ जा सकता है पर समाज को देखा को छुआ नहीं जा सकता।
शरीर के अंग अभिन्न तथा समाज के अंग भिन्न रह सकते हैं
शरीर और समाज के बीच की समानता स्पष्ट करते हुए स्पेंसर ने बताया है कि शरीर के विभिन्न अंग शरीर से अलग नहीं रह सकते शरीर के विभिन्न अंगों के मिलने से एक सत्ता उत्पन्न होती है। शरीर से अलग अंगों की कोई सत्ता नहीं है। जैसे हाथ और पैर की सत्ता या उसका अस्तित्व तब तक ही है जब तक उसका सीधा संबंध शरीर से है। समाज के विभिन्न अंग मिलकर समाज को बनाते हैं, पर यह समाज से अलग भी अपनी सत्ता रख सकते है। यह सत्य है कि समाज परिवारों समुदायों और समूहों आदि से बनता है पर समाज से भिन्न व्यक्तियों के परिवारों की स्वतंत्र सत्ता बनी रहती है।
केंद्रीय भूत चेतना संबंधी विभिन्नता
शरीर के विभिन्न अंगों में अलग-अलग चेतना अथवा चिंतन शक्ति नहीं होती शरीर की एक केंद्र में चेतना शक्ति होती है।
सारे शरीर की चेतना तथा सारे शरीर का चिंतन एक केंद्र से होता है। इसके विपरीत समाज में चेतना तथा चिंतन का केंद्र किसी एक बिंदु में समाया हुआ नहीं है। समाज में जितने व्यक्ति होंगे, जितने परिवार होंगे, समूह होंगे, उन सब का चिंतन अलग-अलग होगा।
स्पेंसर का कहना है कि शरीर का विकास चूंकि एक केंद्र से होता है। अतः संपूर्ण शरीर का कल्याण व्यक्ति की चेतना करती है। समाज का विकास क्योंकि एक केंद्र से नहीं होता इसलिए व्यक्ति का विकास और उसका कल्याण समाज पर नहीं छोड़ा जा सकता। समाज पर तो सामाजिक कल्याण के कार्य को तब छोड़ा जा सकता है जब समाज के चिंतन का केंद्र बिंदु एक ही होता है। इसलिए व्यक्ति के कल्याण की बात व्यक्ति पर ही छोड़नी चाहिए समाज पर नहीं।
शरीर के अंग शरीर के लिए हैं पर समाज के अंगों के लिए समाज है
समाज और शरीर दोनों ही अवयवी हैं पर समाज और शरीर में भिन्नता यह है कि शरीर अंगों के लिए नहीं अंग शरीर के लिए है। हरबर्ट स्पेंसर का कहना है कि ठीक इसके विपरीत व्यक्ति समाज के लिए नहीं समाज व्यक्ति के लिए है। इस संबंध में अगस्त कॉम्ट एवं हरबर्ट स्पेंसर के विचारों में बहुत अधिक भिन्नता है।
कॉम्ट तो समाजशास्त्र में व्यक्ति का कोई अस्तित्व ही नहीं मानते पर हरबर्ट स्पेंसर चूकि व्यक्तिवादी हैं और उनके व्यक्तिवादी विचारों के अनुसार व्यक्ति का महत्व अधिक है। इसलिए उनका कहना है कि व्यक्ति समाज के लिए नहीं है। समाज व्यक्ति के लिए है।
शरीर नष्ट हो सकता है पर समाज बहुत देर से नष्ट होता है
स्पेंसर ने देह संरचना और समाज की समतुल्यता को बड़े विस्तार से रखा है। इस संबंध में वे एक बात कहते हैं। उनका कहना है कि कोई भी शरीर संरचना, समाज की एक इकाई है। इकाइयों को जोड़ने से ही समाज बनता है। जब हम किसी देश की बात करते हैं तो इससे हमारा आशय है कि राष्ट्र अनेकों शरीर संरचना यानी व्यक्तियों से बना है। व्यक्ति का जीवन अल्प समय का होता है। जैसे 100 या उससे कुछ और वर्ष लेकिन समाज और राष्ट्र का जीवन लंबी अवधि में बंधा होता है सभ्यताएं बनती है और नष्ट होती हैं, लेकिन समाज को नष्ट होने में हजारों साल लग जाते हैं।
शरीर संरचना में शारीरिक व्यापकता नहीं होती
मानव का शरीर निश्चित अंगों से बना होता है जैसे दो हाथ, दो आंख और दो हाथ, पैर व्यक्ति के वयस्क होने पर यह शारीरिक अंग बढ़ते नहीं है आकार में बस बदलाव होता है।
तीन आंखें या तीन हाथ पैर नहीं हो सकते जबकि समाज में दूसरी तरफ पूरी व्यापकता होती है, उदाहरण के तौर पर आदिम समाजों में साहित्य और कला एवं उद्योगों का विकास उतना नहीं था जितना कि आज के विकसित समाजों में हमें देखने को मिल रहा है
विकसित समाज के अंग -हरबर्ट स्पेंसर के अनुसार किसी भी विकसित समाज में समाज के तीन अंग होते है.
समर्थनकारी व्यवस्था (Suppertive System)- यह उन अंगो से बनती है जो जीवित चीजों को
पौष्टिकता प्रदान करते हैं। यह स्वयं भी समाज में महत्वपूर्ण उत्पादकों से पैदा किए जाते हैं।
वितरण की व्यवस्था ( Distributive System)- यह श्रम विभाजन के द्वारा समाज के अलग-अलग अंगों में संबंध स्थापित करती है।
नियंत्रणकारी व्यवस्था (Regulative System)- राज्य की संस्था के रूप में समष्टि के सम्मुख अंगो की कमजोर स्थिति को प्रकट करती है। समाज के स्पष्ट अंग एवं संस्था होती हैं। हरबर्ट स्पेंसर ने 6 प्रकार की संस्थाओं की चर्चा की है
1. घरेलू संस्था- इसमें नातेदारी, परिवार, विवाह आदि सम्मिलित होते हैं।
2. धर्म- यह कर्म एवं कर्मकांड से जुड़ी संस्था है। जिसमें केवल कर्मकांड और धार्मिक क्रियाएं सम्मिलित होती हैं।
3. राजनीतिक संस्था- इसमें राज्य सरकार कानून आदि सम्मिलित होते हैं।
4. चर्च- यह धर्म से अलग संगठन एवं नियमों की व्यवस्था है।
5. पेशेवर अथवा व्यवसायिक संस्था यह संस्थाएं अलग व्यवसाय एवं उसकी विशेषताओं है।
6. औद्योगिक संस्था व्यापार व्यवसाय से जुड़ी होती है। समाजशास्त्र में स्पेंसर ने 1862 में सबसे पहले संस्था शब्द का प्रयोग अपनी पुस्तक फर्स्ट प्रिंसिपल (First Prienciple) में किया। 1885 में प्रिंसिपल ऑफ सोशियोलॉजी (Prienciple of Sociology) में सामाजिक संरचना (Social Structure) शब्द का प्रयोग भी पहली बार किया और स्पष्ट किया कि संस्थाओं के सहयोग से ही सामाजिक संरचना बनती है। हरबर्ट स्पेंसर जीव एवं समाज में समानता स्थापित करके प्रकार्यवाद के अग्रदूत साबित हुए एल.ए.कोजर ने कहा है कि “हरबर्ट स्पेंसर एक ओर साम्यवाद एवं दूसरी ओर व्यक्तिवाद में सैद्धांतिक रूप से तालमेल नहीं बिठा सके ऐसी कठिनाई अगस्त कॉम्ट को नहीं हुई क्योंकि सावयवी दृष्टि के साथ वे समूह वादी थे।" आएगर कॉन ने लिखा है कि सावयवी दृष्टिकोण के द्वारा हरबर्ट स्पेंसर ने स्वतंत्र प्रतियोगिता एवं निजी उद्योगों को बढ़ावा देने की वकालत की।" यह विश्लेषण सिद्धांत पर कम और विचारधारा पर अधिक आधारित है।
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