समाजशास्त्र के उदय की बौद्धिक परंपरा (यूरोपीय) - The intellectual tradition of the rise of sociology (European)
समाजशास्त्र के उदय की बौद्धिक परंपरा (यूरोपीय) - The intellectual tradition of the rise of sociology (European)
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आज समाजशास्त्र की जिस बौद्धिक परंपरा को हम देखते हैं। उसकी शुरूआत 19वीं शताब्दी में फ्रेन्च दार्शनिक एवं समाजशास्त्री ऑगस्त कोत की बौद्धिक परंपरा है, जिसने समाजशास्त्र को बहुआयामी स्वरूप प्रदान किया। कोत का विश्वास था कि विज्ञान एक निश्चित एवं तार्किक क्रम में अनुशीलन करते हैं और सभी अन्नवेषण वैज्ञानिक स्तर पर पहुंचने तक कुछ अवस्थाओं से होकर गुजरते हैं। कोत का मत है कि सामाजिक घटनाओं और समस्याओं से संबंधित अन्नवेषणों के लिए अब इस अंतिम अवस्था पर आ जाने का समय आ गया है और इसलिए उसने यह सिफारिश की कि समाज के इस अध्ययन को समाज का विज्ञान माना जाय। कोंत ने इसी नवीन विज्ञान को समाजशास्त्र का नाम दिया और 1838 में इस विषय को एक शब्द के रूप में संबोधित किया, वही शब्द वैश्विक परिदृश्य में समाजशास्त्र के रूप में स्थापित हुआ। इसी कारण परंपरागत् रूप से आगस्त कोंत को समाजशास्त्र की बौद्धिक परंपरा का पिता भी स्वीकार किया जाता है। कोंत ने समाजशास्त्र की विवेचना करते हुए कहा कि समाजशास्त्र का काम सामाजिक संबंधों का विश्लेषण करना है, किंतु इसकी प्रकृति पूर्णतया वैज्ञानिक है। इसीलिए उनकी दृष्टि में समाजशास्त्र विज्ञानों का विज्ञान है। आगस्त कोंत ने समाजशास्त्र को सृजन करते समय एक समाजशास्त्रीय प्रणाली का भी निर्माण किया, जिसके द्वारा सामाजिक दर्शन तथा समाजशास्त्र में अंतर स्थापित किया जा सकता है।
इस आधार पर हम कह सकते हैं कि कोंत के बहुत पहले भी समाजशास्त्रीय विचार हो सकते हैं, किंतु समाजशास्त्रीय प्रणाली की बौद्धिक परंपरा को आगस्त कोंत द्वारा ही विश्लेषित व परिवेक्षित किया गया। ये कोंत ही थे जिन्होंने यह स्वीकार किया कि प्राकृतिक घटनाओं की भांति ही सामाजिक प्रघटनाओं का अध्ययन वैषेयिक रूप में प्रत्यक्षवादी विधि बनाकर या अपनाकर किया जा सकता है। इस प्रकार समाजशास्त्र की बौद्धिक परंपरा का नेतृत्व आगस्त कोत द्वारा किया गया, जिन्होंने शुरूआत में इसे सामाजिक भौतिकी कहा किंतु बाद में इसका नाम बदलकर समाजशास्त्र कर दिया। उन्होंने यह परिवर्तन इसलिए किया कि वेल्जियम के एक वैज्ञानिक एडोल्फ क्वेटलेट ने सामाजिक भौतिकी का प्रयोग सरल सांख्यिकी को व्यक्त करने के लिए किया था। इसलिए बाध्य होकर कोत को समाजशास्त्र शब्द अपनाना पड़ा, जो एक लैटिन तथा ग्रीक भाषा के समन्वय से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है अत्यधिक सामान्यीकृत या अमूर्त स्तर पर समाज का अध्ययन। कोत समाजशास्त्र को मात्र विज्ञान तक ही बनाने के पक्षधर नहीं थे, अपितु उनका विचार था कि समाजशास्त्र का प्रयोग समाज के पुर्नगठन के सन्दर्भ में भी होना चाहिए। वे समाज के प्रकृति संबंधी विज्ञान विकसित करने के पक्षधर थे, एक ऐसा विज्ञान जो मानव जाति के मात्र ऐतिहासिक प्रघटनाओं की व्याख्या ही नहीं करेगा अपितु वह उनका भविष्य भी निर्धारित करेगा। इनके अनुसार मानव जाति का अध्ययन भी ऐसे ही किया जाना चाहिए कि जैसे प्रकृति का अध्ययन किया जाता है।
कोत का यह भी मानना है कि समाज का यह नया विज्ञान परंपराओं की अपेक्षा तर्क और अवलोकन पर निर्भर होना चाहिए, तभी समाज को विज्ञान के रूप में देखा जा सकता है। कोंत का समाज विज्ञान जिसे उन्होंने समाजशास्त्र कहा, निश्चित रूप से प्राकृतिक विज्ञानों की तरह ही था। जिस तरह प्राकृतिक विज्ञान तर्क, निरीक्षण और परीक्षण पर केन्द्रित थे, वैसे ही समाजशास्त्र में भी निरीक्षण और परीक्षण की पद्धति का विकास कोत की बौद्धिक परंपरा में निहित था।
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