भारत विद्याशास्त्र का परिचय , विशेषताएँ - Introduction to Indology, Features

 भारत विद्याशास्त्र का परिचय , विशेषताएँ - Introduction to Indology, Features


भारतीय विद्याशास्त्र अध्ययन का वह परिपेक्ष्य है जो भारतीय समाज एवं संस्कृति का अध्ययन भारत की प्राचीन ग्रन्थों (वेद, उपनिषद, पुराण, ब्रह्ममण ग्रंथ, स्मृतिग्रंथ आदि) भाषाओं, ऐतिहासिक तथ्यों, परंपराओं एवं मूल्यों आदि के आधार पर करता है। यह विद्याशास्त्र इस मान्यता पर आधारित है कि भारतीय समाज का अध्ययन उसकी परमपरात्मक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर करके समाज की वास्विकता को असानी से समझा जा सकता है। भारतीय समाज के अध्ययन में इस परिपेक्ष्य की शुरूवात ईरानी इतिहास कार्य अलबरूनी से माना जाता है जिसने तहकीक-ए-हिन्द' (भारत की खोज) नामक पुस्तक में भारतीय समाज एवं संस्कृति का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया हैं अलबरूनी को भारतीय विद्याशास्त्र का जनक भी माना जाता है। आधुनिक विचारकों ने इसकी शुरूवात सर विलियम्स जोन्स ने की। सर जोन्स को संस्कृत सहित कई भारतीय भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। जिसके कारण इन्होंने भारत के साहित्य, संस्कृति एवं दर्शन पर अनेक पुस्तकें लिखी और अनुवाद किये। सन् 1984 में इन्होंने एशियाटिक सोसायटी आफ बंगाल' की स्थापना की। जिससे यहां पर भारतीय धर्म ग्रन्थों, साहित्य, इतिहास, परंपरा, मूल्यों के अध्ययन की नीव पड़ी।

और यही से भारत विद्याशास्त्र की व्यवस्थित अध्ययन की शुरू हुई। सन् 1849 से 75 के मध्य मैक्समूलर जैसे विद्वान ने संस्कृत सीखकर (ऋग्वेद का अनुवाद) महाकाव्यों और साहित्यिक कृत्यों के अनुवाद में सहायता की जिसे भारतवासी करीब-करीब भूल चुके थे। इस तरह सस्कृत के ज्ञान में भारत की महान सास्कृतिक और दार्शनिक परंपरा को समझने में सहायता दी। उस समय जब अधिकाश शिक्षित भारतीयों का अंग्रेजी शासकों द्वारा उपहास किया जा रहा था संस्कृत के इस ज्ञान ने उनके स्वभिमान को फिर से जगाया। दयानन्द सरस्वती जैसे भारतीय चिंतको ने तत्कालीन भारतीय समाज की रूढ़ियों, परंपराओं का विरोध करते हुए वेदो की ओर लौटो' का उद्घोष कर वैदिक साहित्य, संस्कृति एवं परंपराओं का समर्थन किया। और आर्य समाज की स्थापना की। इसके अलावा कार्लमार्क्स और मैक्सवेवर आदि ने अपने अध्ययन में भारतीय सामग्री का उपयोग किया। पश्चिमी विद्याशास्त्रीयों के चिंतन में अनेक कमियाँ नजर आयी जिन्होंने अपने अध्ययन में भारतीय समाज का विखण्डित, शोषित रूप प्रस्तुत किया।

फिर विद्याशास्त्र में भारतीय समाज समझने का एक नया दृष्टिकोण विकसित किया जिसका प्रयोग बाद में समाजशास्त्रीय चिंतको द्वारा भी किया जाने लगा।



भारतीय विद्याशास्त्र की विशेषताएँ


भारत विद्याशास्त्रीय अध्ययन 18-19 वीं शताब्दी के मध्य औपनिवेशिक भारत में सामाजिक सांस्कृतिक चिंतन में नये दृष्टिकोण का समावेश करता है जो भारतीय समाज के अध्ययन में पाश्यात्य दृष्टिकोण के स्थान पर भारतीय परम्परिक, साहित्यिक एवं ऐतिहासिक चिंतन पर बल देता है। विद्याशास्त्री अध्ययन परिपेक्ष्य की प्रमुख विशेषताओं को निम्नलिखित रूपों में देखा जा सकता है


यह विद्याशास्त्र इस मान्यता पर आधारित है कि किसी समाज का अध्ययन उसकी सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार किया जाना चाहिए जिससे उस समाज की यर्थाथता को आसानी से समझा जा सके।


यह विद्याशास्त्र भारतीय समाज का अध्ययन प्राचीन भारतीय ग्रन्थों, साहित्यों, भाषाओं, ऐतिहासिक तथ्यों, संस्कृति एवं परंपराओं के आधार पर करता है।


भारत विद्याशास्त्र भारतीय समाज को समझने के लिए ग्रन्थीय परंपरा पर बल देते हुए भारत के प्राचीन ग्रन्थ, वेद, पुराण, महाभारत, रामायण, मनुस्मृति, अर्थशास्त्र आदि का विमर्श एवं विश्लेषण करता है। इस विद्याशास्त्र ने भारत के परम्परिक सामाजिक व्यवस्थाओं एवं संस्थाओं को पुनः अध्ययन, चिंतन, एवं शोध का विषय बना दिया।


भारत विद्याशास्त्र ने भारत के समाजशास्त्रीय चिंतन को आधार प्रदान किया जिसके फलस्वरूप भारतीय समाज को समझने के लिए वर्ण, आश्रम, जजमानी, जाति, परिवार, विवाह, संस्कार, धर्म आदि का व्यापक अध्ययन अध्यापन शुरू हुआ।


यह विद्याशास्त्र वर्तमान भारतीय सामाजिक व्यवस्थाओं, संस्थाओं, मान्याताओं एवं मूल्यों को परंपरागत दर्शन एवं चिंतन के आधार पर ही समझने का प्रयास करता है। जिससे इस विद्याशास्त्र के लिए क्षेत्र कार्य आवश्यक नहीं है।


भारत विद्याशास्त्र ग्रन्थीय एवं किताबी ज्ञान पर आधारित होता है।