प्रस्थिति से जुड़ी प्रमुख अवधारणाएँ - Key concepts related to status

 प्रस्थिति से जुड़ी प्रमुख अवधारणाएँ - Key concepts related to status


समाजशास्त्र में प्रस्थिति से जुड़ी अनेक संकल्पनाएँ देखने को मिलती हैं, उनमें से कुछ प्रमुख संकल्पनाओं को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है -


● किंग्सले डेविस द्वारा इस संबंध में प्रस्थितियों का संगठन प्रस्तुत किया गया है, जिसके तहत उन्होने चार संकल्पनाओं को प्रस्तुत किया है- प्रस्थिति, पदानुषंग (ऑफिस), स्टेशन तथा स्तृत (स्ट्रेटम)। प्रस्थिति से डेविस का तात्पर्य उस पद से है जो सामान्य संस्थात्मक व्यवस्था में समाज द्वारा न केवल स्वीकृत हो, अपितु वह पद सम्पूर्ण समाज द्वारा समर्पित भी हो, साथ ही उस पद का जन्म स्वतः ही हुआ हो, न कि उस पद को प्रयासपूर्वक बनाया गया हो। इसके बाद पदानुषंग के बारे में डेविस स्पष्ट करते हैं कि इसका संबंध एक ऐसे पद से है जो औपचारिक संगठन के तहत चेतनपूर्वक बनाया गया हो तथा साथ ही यह कुछ विशिष्ट और सीमित नियमों द्वारा किसी समूह विशेष के लिए ही लागू होता हो। इस पद को व्यक्ति द्वारा अर्जित किया जाता हो, न कि उसे जन्म के आधार पर यह पद प्राप्त होता हो।


स्टेशन के बारे में डेविस बताते हैं कि यह किसी प्रस्थिति कड़ी की अंतिम प्रस्थिति होती है तथा इसके बाद कोई अन्य प्रस्थिति नहीं रहती है। उदाहरणस्वरूप, आई.ए.एस. के बाद डी.एम., उसके बाद उप सचिव, उसके बाद, सचिव तथा अंत में मुख्य सचिव। यहां मुख्य सचिव को ही डेविस ने स्टेशन के रूप में प्रस्तुत किया है। स्तृत के बारे में डेविस बताते हैं कि इस पद से संबंधित लोगों में हम की भावना देखने को मिलती है। समाज में अनेक स्तरीकरण पाये जाते हैं तथा हम प्रत्येक व्यक्ति को उसके स्तर के आधार पर जानते हैं। भारतीय समाज में अनेक जातियाँ पायी हैं तथा ये सभी जातियाँ अपना अलग-अलग स्तृत निर्मित करती हैं तथा इसके अंतर्गत ही व्यक्तियों की सामाजिक प्रस्थिति भी निर्मित होती रहती है।


● प्रस्थिति संकुल की संकल्पना रॉबर्ट के मर्टन के साथ जुड़ी हुई है। मर्टन का मानना है कि किसी भी व्यक्ति की मात्र एक प्रस्थिति नहीं होती है, अपितु वह एक साथ अनेक प्रस्थितियों के साथ जुड़ा रहता है। व्यक्ति अपने जन्म के साथ ही कई प्रस्थितियाँ धारण किए रहता है

तथा अपने कर्म अर्थात् परिश्रम व प्रयास द्वारा भी वह अनेक प्रस्थितियाँ प्राप्त करता है। साधारण शब्दों में यह कहा जा सकता है कि यदि हम अर्जित तथा प्रदत्त प्रस्थितियों को एक साथ जोड़ दिया जाय, तो उसे हम प्रस्थिति संकुल के नाम से समझ सकते हैं। उदाहरणस्वरूप, एक व्यक्ति चिकित्सक, मित्र, खिलाड़ी, पिता-पुत्र, भाई आदि हो सकता है।


● जी.ई. लेस्की ने प्रस्थिति से जुड़ी दो संकल्पनाएँ प्रस्तुत की प्रस्थिति अनियमितता तथा मुख्य प्रस्थिति। प्रस्थिति अनियमितता से तात्पर्य किसी व्यक्ति की दो प्रस्थितियों से है, जिसमें एक प्रस्थिति अत्यधिक उच्च होती है, जबकि दूसरी प्रस्थिति अत्यंत निम्न होती है। उदाहरणस्वरूप, जाती व्यवस्था में किसी निम्न जाति की प्रस्थिति से संबंधित किसी व्यक्ति का वैज्ञानिक जैसी उच्च प्रस्थिति को प्राप्त कर लेना। लेंस्की द्वारा प्रस्तुत दूसरी संकल्पना मुख्य प्रस्थिति का आशय व्यक्ति की उस प्रस्थिति से है जो अन्य प्रस्थितियों से अधिक महत्वपूर्ण होती है

तथा जिसे समाज द्वारा अधिक महत्व प्रदान किया जाता है। उदाहरणस्वरूप, महेंद्र सिंह धोनी एक क्रिकेट खिलाड़ी हैं, वे फूटबाल भी खेलते हैं तथा मोटरसाइकिल भी चलाते हैं, इसके अलावा वे पति, पिता, पुत्र, मित्र आदि भी हैं, परंतु उनकी अन्य सभी प्रस्थितियों में क्रिकेट खिलाड़ी को हम मुख्य प्रस्थिति के रूप में मानते करते है।


● अल्बर्ट कोहेन ने प्रस्थिति हताशा की संकल्पना प्रस्तुत की तथा बताया कि समाज में कुछ व्यक्तियों की ऐसी प्रस्थिति रहती है, जिसमें संवर्धन के मार्ग नहीं दिखाई देते हैं। उदाहरणस्वरूप, जाति व्यवस्था में किसी निम्न जाति से संबंधित व्यक्ति में अपनी हीन दशा को लेकर हताशा अथवा विचलन का आना।


● प्रस्थिति झटका की संकल्पना का संबंध एल्विन टाफलर के साथ है तथा टाफलर ने स्पष्ट किया कि यह एक ऐसी अवस्था से संबन्धित प्रस्थिति है

जो व्यक्ति को अकसमत प्राप्त हो जाती है तथा व्यक्ति इस प्रस्थिति के लिए तैयार नहीं रहता है। उदाहरणस्वरूप, किसी नवविवाहित का विधवा अथवा विधुर हो जाना।


● रॉबर्ट बीरस्टीड द्वारा दो संकल्पनाओं का प्रतिपादन किया गया पीड़ाकारी प्रस्थिति तथा ध्रुवीय प्रस्थिति। पीड़ाकारी प्रस्थिति से अभिप्राय उन प्रस्थितियों से है जिन्हें व्यक्ति कभी भी अपनाना नहीं चाहता है। इस प्रकार की प्रस्थिति से व्यक्ति सदैव दुखी अथवा व्यथित होता है। उदाहरणस्वरूप, किसी विधवा/विधुर अथवा शारीरिक रूप से अपंग की प्रस्थिति। बीरस्टीड ने ध्रुवीय प्रस्थिति को दो प्रस्थितियों के युग्म के रूप में परिभाषित किया है तथा ये दोनों प्रस्थितियाँ एक-दूसरे की विरोधाभाषी होती हैं, परंतु एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं रहता है। उदाहरणस्वरूप, स्त्री-पुरुष, पति पत्नी, अमीर-गरीब, उच्च निम्न आदि।