संस्कृति के प्रमुख अंग - Major parts of culture
संस्कृति के प्रमुख अंग - Major parts of culture
संस्कृति का निर्माण करने वाले प्रमुख तत्व निम्न हैं-
क) सांस्कृतिक तत्व
चूंकि संस्कृति सम्पूर्ण समाज की जीवन विधि का समावेश होता है, तो स्वाभाविक है कि इसका निर्माण कई नियामक इकाइयों के संयोग से होता है। संस्कृति एक प्रकार का संतुलित संगठन होता है जिसका निर्माण अनेक विधियों के संयोग से होता है। संस्कृति की सबसे छोटी इकाई को हम सांस्कृतिक तत्व के नाम से जानते हैं। सांस्कृतिक तत्वों का विभाजन नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार से किसी पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु है, शरीर की सबसे छोटी इकाई कोशिका है, समाज की सबसे छोटी इकाई संरचना है, ठीक उसी प्रकार से संस्कृति की सबसे छोटी इकाई सांस्कृतिक तत्व हैं। यह भौतिक तथा अभौतिक दोनों प्रकार का हो सकता है। घड़ी, रेडियो, टेलीविज़न, कलम, टेबल, कुर्सी, पंखा, रुमाल आदि को हम सांस्कृतिक तत्व के भौतिक पक्ष के रूप में समझ सकते हैं तथा शब्द, विचार, संकेत, कोई एक प्रथा अथवा रीति-रिवाज आदि को सांस्कृतिक तत्व के अभौतिक पक्ष के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
जेकब्स तथा स्टर्न के शब्दों में,
"सांस्कृतिक तत्व संस्कृति की वह आविष्कृत तथा हस्तांतरिक इकाइयां हैं जिनको विवरण अथवा सैद्धांतिक अध्ययन के लिए अनेक भागों में विभाजित नहीं किया जा सकता।'
हॉबेल के अनुसार,
"सांस्कृतिक तत्व व्यवहार का एक प्रकार के व्यवहार से उत्पन्न एक भौतिक वस्तु है जिसे सांस्कृतिक व्यवस्था की सबसे छोटी इकाई माना जा सकता है। "
डॉ. दुबे ने सांस्कृतिक तत्वों की व्याख्या संस्कृति का गठन करने वाली सरलतम व्यावहारिक इकाइयों के रूप में किया है।
हस्कर्कोविट्स बताते हैं कि सांस्कृतिक तत्व एक निर्दिष्ट संस्कृति में पहचानी जाने वाली सबसे छोटी इकाई है।
प्रस्तुत व्याख्याओं के आधार पर सार रूप में यह कहा जा सकता है कि सांस्कृतिक तत्व किसी भी संस्कृति की सबसे छोटी तथा अविभाज्य इकाई होती है।
यहाँ इस बात पर ध्यान आकृष्ट करने की आवश्यकता है कि ऐसा नहीं है कि सांस्कृतिक तत्वों को विभाजित नहीं किया जा सकता है, वरन् इसका आशय यह है कि सांस्कृतिक तत्व को विभाजित कर देने के पश्चात उसका कोई अर्थपूर्ण अस्तित्व नहीं रह जाएगा। उदाहरणस्वरूप, कलम एक सांस्कृतिक तत्व है तथा यदि इसको विभाजती कर दिया जाय तो इसका आवरण, निब, पोला, ढक्कन आदि अलग-अलग हो जाएंगे। यह विभाजन अर्थपूर्ण नहीं होगा तथा इन वस्तुओं का अलग-अलग कोई अर्थ नहीं रह जाएगा तथा मनुष्य इनका उपयोग नहीं कर पाएगा। सांस्कृतिक तत्व की प्रमुख विशेषताओं को निम्न बिन्दुओं के माध्यम से समझा जा सकता है -
• सांस्कृतिक तत्व का एक इतिहास होता है तथा यह इतिहास उसकी उत्पत्ति को स्पष्ट करता है। उदाहरणस्वरूप, कलम, रेडियो अथवा जहाज का एक इतिहास होता है तथा यह इतिहास उसके निर्माण व विकास को बताता है।
• यह संस्कृति के समान स्थिर नहीं होता है, इसमें परिवर्तनशीलता तथा गतिशीलता का गुण पाया जाता है। किसी अन्य सांस्कृतिक समूह के संपर्क में आने से सांस्कृतिक तत्व परिवर्तित हो जाते हैं तथा कभी-कभी ये परिवर्तन संस्कृति की संरचना को भी परिवर्तित कर देते हैं।
• सांस्कृतिक तत्व अकेले नहीं रहते, अपितु ये सदैव अन्य सांस्कृतिक तत्वों के साथ मिलकर रहते हैं। अनेक अर्थपूर्ण क्रमबद्धता से जुड़े हुये सांस्कृतिक तत्वों द्वारा ही संस्कृति को एक अर्थपूर्ण स्वरूप प्राप्त होता है।
ख) संस्कृति संकुल
संस्कृति संकुल का निर्माण कई सांस्कृतिक तत्वों के मेल से होता है। जिस प्रकार से कई कोशिकाओं के मिलने से एक अंग बनता है, कई परमाणुओं के मिलने से एक अणु बनता है, कई परिवारों के मिलने से एक समाज बनता है, ठीक उसी प्रकार कई सांस्कृतिक तत्वों के मिलने से संस्कृति संकुल का निर्माण होता है।
ज्ञात रहे कि संस्कृति संकुल का निर्माण सांस्कृतिक तत्वों के व्यवस्थित तथा अर्थपूर्ण संबद्ध मेल से ही होता है।
सदरलैंड तथा वुडवर्ड के अनुसार,
"संस्कृति संकुल, सांस्कृतिक तत्वों की वह समग्रता है जो अर्थपूर्ण अंतः संबंध में परस्पर गुथे होते हैं। "
हॉबेल के शब्दों में,
"संस्कृति संकुल घनिष्ठ रूप से संबंधित प्रतिमानों का एक जाल है। "
डॉ. दुबे के अनुसार,
"संस्कृति संकुल, जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, समान धर्मों अथवा पूरक संस्कृति संकुल, सांस्कृतिक तत्वों का वह समग्र समूह है जो कि इनके अर्थपूर्ण तरीके से परस्पर संबंधित होने से निर्मित होता है।"
प्रस्तुत परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि जब अर्थपूर्ण तरीके से सांस्कृतिक तत्व परस्पर जुड़े रहते हैं तथा वे मानव कि आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, तो इसे सांस्कृतिक तत्व की संज्ञा प्रदान की जाती है। उदाहरणस्वरूप, बल्ला, गेंद, स्टंप, खेल के नियम, खेल का मैदान, खेल का पोशाक आदि विशिष्ट अर्थों में जुड़कर संस्कृति संकुल का निर्माण करते हैं।
ग) संस्कृति प्रतिमान
उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि अनेक सांस्कृतिक तत्वों के मेल से संस्कृति संकुल का निर्माण होता है, परंतु संस्कृति संकुल किसी शून्य में रहकर कार्य नहीं करता है, वरन एक सांस्कृतिक ढांचे के तहत संस्कृति संकुल का एक निश्चित स्थान अथवा कार्य होता है।
सांस्कृतिक ढांचे के अंतर्गत संस्कृति संकुलों की उस व्यवस्था को संस्कृति प्रतिमान कहा जाता है जो सम्पूर्ण संस्कृति की विशेषताओं को अभिव्यक्त करता हो।
रूथ बेनेडिक्ट ने अपनी पुस्तक 'पैटर्न्स ऑफ कल्चर' में संस्कृति प्रतिमान की अवधारणा प्रस्तुत की तथा यह अवधारणा गेस्टाल्ड के मनोविज्ञान के सिद्धांत और मैलीनोवस्की के संस्कृति के सिद्धांत से प्रभावित है। संस्कृति प्रतिमान, संस्कृति की उन मूलभूत प्रेरणाओं तथा आदेशों का अध्ययन प्रस्तुत करती है जो संस्कृति को एक विशिष्ट दिशा और स्वरूप प्रदान करते हैं। एक संस्कृति प्रतिमान में सांस्कृतिक तत्व तथा संस्कृति समुक एक विशिष्ट तरीके से व्यवस्थित रहते हैं। इस अवधारणा का प्रयोग बेनेडिक्ट ने अपने अध्ययन के दौरान किया तथा यह अवधारणा तीन संस्कृतियों प्युबलों, डोंबू तथा क्वाक्विटल के अध्ययन पर आधारित है। अध्ययन में बेनेडिक्ट ने पाया कि प्युबलों की संस्कृति में सुव्यवस्था तथा अनुशासन को महत्व दिया जाता है तथा दिखावे को अनुचित समझा जाता है। वहीं डोंबू संस्कृति में लोग धोखेबाज, सनघर्ष को महत्व देने वाले तथा अपनी धारणाओं को ही श्रेष्ठ समझने वाले हैं।
क्वाक्विटल संस्कृति से संबंधित लोग बड़प्पन दिखने का प्रयास करते हैं तथा यहाँ दिखावे की परंपरा देखने को मिलती है।
सदरलैंड तथा वुडवर्ड के अनुसार,
"सम्पूर्ण संस्कृति के एक प्रकार के सामान्यीकृत चित्र के रूप में संकुलों का संग्रह संस्कृति प्रतिमान है।"
हर्सकोविट्स के शब्दों में, "संस्कृति प्रतिमान एक संस्कृति के तत्वों का प्रारूप है जो कि उस समाज के सदस्यों के व्यक्तिगत व्यवहार प्रतिमान के माध्यम से अभिव्यक्त होता हुआ जीवन के इस ढंग को संबद्धता, निरंतरता तथा विशिष्टता प्रदान करता है।"
उक्त परिभाषाओं के आलोक में यह कहा जा सकता है कि संस्कृति प्रतिमान सांस्कृतिक ढांचे को एक विशिष्ट स्वरूप प्रदान करता है, जिसमें संस्कृति संकुल की क्रमबद्ध तथा अर्थपूर्ण व्यवस्था किसी संस्कृति को निर्मित कर सकने में सक्षम हो सके।
घ) संस्कृति क्षेत्र
संस्कृति के अध्ययन में हम उसके भौगोलिक क्षेत्र को गौण नहीं समझ सकते, वरन् किसी भी संस्कृति की उपस्थिति तथा उपयोगिता में उसके भौगोलिक क्षेत्र की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। संसार में अनेक प्रकार के समाज हैं तथा उनके अनुरूप अनेक प्रकार की संस्कृतियाँ भी पायी जाती हैं तथा यदि हम संस्कृतियों को ध्यानपूर्वक अवलोकित करें तो यह ज्ञात होगा कि जो भी संस्कृतियाँ भौगोलिक दृष्टि से निकट है, उनमें अधिक समानताएँ देखने को मिलती है।
इसके विपरीत जो संस्कृतियाँ भौगोलिक दृष्टि से दूर है, उनमें अधिक असमानताएँ देखने को मिलती है। इस प्रकार से हम यह कह सकते हैं कि सांस्कृतिक तत्व, संस्कृति संकुल तथा संस्कृति प्रतिमान आदि का प्रसार एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र तह ही सीमित रहता है तथा इसी क्षेत्र को हम संस्कृति क्षेत्र के नाम से जानते हैं।
संस्कृति क्षेत्र की संकल्पना का प्रतिपादन सर्वप्रथम क्लार्क विसलर द्वारा प्रस्तुत किया गया। बिसलर का कहना है कि "संस्कृति तत्व और संकुल, विशेषकर यदि वे अभौतिक हैं, दूसरे संस्कृति के तत्वों और संकुलों के साथ बिना मिश्रित हुये अधिक दूर तक प्रसारित नहीं हो सकते। इसका प्रभाव यह होता है कि ये संस्कृति तत्व और अंकुल अपने मूल रूप में केवल एक ही सीमित क्षेत्र में पाये जाते हैं। "
हर्सकोविट्स के शब्दों में,
"वह क्षेत्र जिसमें समान संस्कृतियाँ पायी जाती हैं, एक संस्कृति क्षेत्र कहा जाता है। "
हॉबेल के अनुसार,
"एक संस्कृति क्षेत्र, भौगोलिक क्षेत्र के उस भाग को कहा जा सकता है जिससे संस्कृति इतनी मात्रा में समानता प्रकट करती है कि उसे उन संस्कृतियों से पृथक कर देती है, जो क्षेत्र के बाहर हैं।" डॉ. दुबे के शब्दों में, ‘कतिपय संस्कृति तत्व अथवा संस्कृति संकुल एकविशेष भौगोलिक क्षेत्र में फैलकर संस्कृति क्षेत्र का निर्माण करते हैं। "
प्रस्तुत सभी परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि संस्कृति क्षेत्र एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र है जिसमें संस्कृति अथवा उसके तत्वों का फैलाव होता है। चूंकि संस्कृति एक सीखा हुआ व्यवहार होता है, अतः निकट की संस्कृति को सीख पाना सरल होता है अपेक्षाकृत किसी दूर की संस्कृति को सीखने के। यही कारण है कि सांस्कृतिक तत्वों में गतिशीलता का गुण होने बाद भी वे एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्रों तक ही सीमित रह जाते हैं।
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