धूर्जटी प्रसाद मुखर्जी के प्रमुख विचार - Major Thoughts of Dhurjati Prasad Mookerjee

 धूर्जटी प्रसाद मुखर्जी  के प्रमुख विचार - Major Thoughts of Dhurjati Prasad Mookerjee


डी.पी. मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न विद्वान थे। इन्होंने विभिन्न विषयों पर अपना विचार दिया है परन्तु समाजशास्त्र में भारतीय सामाजिक परंपरा और आधुनिकता से संबंधित द्वन्द्वात्मक सिद्धांत से इन्हे • विशेष ख्याति प्राप्त हुई। समाजशास्त्रीय अध्ययन में इनके प्रमुख विचार निम्न हैं


परंपरा से संबंधित विचार भारतीय सामाजिक चिंतन में परंपरा से सम्बन्धित अध्ययन डी.पी. मुखर्जी के विचारो का केन्द्र है। इसको उन्होंने मार्क्सवाद के द्वन्द्वात्मक पद्धति के आधार पर समझने का प्रयास किया है। लेकिन इन्होंने हीगल (विचारों का द्वंद्व) और मार्क्स (भौतिक पदार्थों का द्वंद्व) दोनो के द्वंद्ववादी धारणा से भिन्न द्वंद्वात्मकता का प्रयोग परंपराओं के द्वन्द्व' के रूप में किया है।

इसी माध्यम से उन्होंने भारतीय समाज में होने वाले परिवर्तन की व्याख्या की है। वे भारतीय परंपराओं के स्रोत धर्म, वेदान्त, बौद्ध धर्म, इस्लाम, और पश्चिमी संस्कृति को मानते है, जिनसे से भारतीय परंपराओं का निर्माण होता है। इस अवधारणा में डी.पी. मुखर्जी भारतीय और विदेशी दोनो परंपराओं को जोड़ते है। इस दृष्टि से भारतीय परंपरा एक प्रकार का संश्लेषण है जिसमें भारतीय तथा विदेश संस्कृतियों या मान्यताओं गठबंधन है। डॉ मुखर्जी ने भारतीय पम्पराओं का वर्गीकरण करते हुए तीन प्रकार बताएं प्राथमिक, द्वितीय और तृतीय, प्राथमिक परंपराओं का पालन प्रत्येक हिंदू के लिए अनिवार्य है। इससे किसी को मुक्ति नहीं है मृत्यु के बाद शरीर को अग्नि संस्कार द्वारा पंचभूतो में विलीन करना प्राथमिक संस्कार है। द्वितीयक एवं तृतीयक परंपरायें वैकल्पिक है। जिसमें व्यक्ति को छूट मिल जाती है। डॉ मुखर्जी के परंपरा की व्याख्या में तर्क को केंद्रीय स्थान प्राप्त है। यह तर्क व्यावहारिक और निराधार कल्पना मात्र भी हो सकता है। उनका मानना था कि भारतीय समाज में जो भी परंपराएं है वे सामाजिक तथा ऐतिहासिक प्रक्रियाओ का परिणाम है।इन परंपराओं में वेदान्त, पश्चिमी उदारवाद और मार्क्सवाद का संश्लेषण है।


आधुनिकीकरण से संबंधित विचार- डॉ मुखर्जी आधुनिकीकरण को केवल तार्किकता से संबंधित नही मानते, उनका मानना है कि केवल इसी आधार पर आधुनिकता एक खोटी या अभिनयपूर्ण अवधारणा बनकर रह जायेगी। अतः आधुनिकता को किसी देश की संस्कृति के दायरे में ही देखा-परखा जाना चाहिए, यह सांस्कृतिक मूल्यों से पूर्णता मुख नही मोडती, अपितु यह उनका बेहतर तरीके से उपयोग करती है। उन्होंने आधुनिकीकरण को एक ऐतिहासिक प्रक्रिया माना है जो विस्तार, उन्नयन, गहनता और पुर्नजीवन को साथ प्रतिनिधित्व करती है इसकी उत्पत्ति परम्परिक और आधुनिक दोनो ही अन्तःक्रिया का प्रतिफल है। इस तरह डॉ मुखर्जी ने आधुनिकता को परंपरा को जोडकर समझने का प्रयास किया है। उनका मानका है कि आधुनिकीकरण में परंपरा बाधक नही, अपितु यह तो उसकी एक स्थिति, एक दशा हैं। यह ऐसे सास्कृतिक प्रतिमानों को जन्म देने पर बल देती है जो नवीन और पुरातन के समन्वय को प्रस्तुत करती है। इस तरह डॉ मुखर्जी के अनुसार आधुनिकीकरण नवीन मूल्यों और संस्थाओं के लिए ऐसी आधारभूमि को तैयार करती है जिसमें वे अपनी जड़े जमा सके।


व्यक्तित्व के विकास से संबंधित विचार डॉ मुखर्जी के अनुसार आधुनिक सामाजिक विज्ञानो में के आनुभविक अध्ययन के माध्यम से प्रत्यक्षवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रत्यक्षवाद व्यक्तिाओं को मात्र जैविक और मनोवैज्ञानिक इकाईयो के रूप में देखता है। जिससे व्यक्तिवाद का बढावा मिलता है। डॉ मुखर्जी ने व्यक्तित्व के विकास के लिए व्यक्तिकरण और समष्टिकरण के बीच संतुलन स्थापित करने पर बल दिया है। विविधता के संबंध में विचार- डॉ मुखर्जी ने भारतीय सांस्कृतिक विविधता का अध्ययन किया जिसमें उन्होनें हिंदू-मुस्लिम के सांस्कृतिक संबंधों एवं अन्तक्रिया का विस्तार से वर्णन किया।

राजनैतिक दृष्टि से उत्तर भारत में 11वी.ई.पू. से 17वी. ई. पू. तक मुस्लिम बादशाहो ने हिंदू प्रजा पर शासन किया। इस दौरान प्रायः हिंदू राजाओं और मुस्लिम शासकों के बीच संधियों हुइर्, इस प्रकार मुस्लिम शासकों और हिंदू प्रजा में साझेदारी और भाईचारे की भावना विद्यमान थी। सांस्कृतिक दृष्टि से साहित्य, कला, संगीत, वेशभूषा, ललित कलाओं आदि के विकास में दोनों का एक दूसरे पर स्पष्ट प्रभाव था। उत्तर भारत में सूफीसंत एवं भक्ति संम्प्रदाय नें आपसी अन्तक्रिया को प्रोत्साहित किया।


अर्थशास्त्र के संबंध में विचार- डॉ मुखर्जी मूल रूप से अर्थशास्त्री थे। अर्थशास्त्र के प्रति उनका दृष्टिकोण दूसरे अर्थशास्त्रीयों से भिन्न था। उन्होंने भारत के आर्थिक विकास को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विशिष्टाओं के आधार पर देखां। उन्होंने बताया कि ब्रिटिश शासन काल में भारतीय अर्थव्यवस्था में व्यापक परिवर्तन । शहरी औद्योगिक अर्थव्यवस्था ने न केवल पुरानी संस्थाओं के जाल को समाप्त किया बल्कि परंपरागत विशिष्ट जातियों को भी उनके व्यावसायिक धंधो से अलग कर दिया। इसके लिए नये सामाजिक अनुकूलन की आवश्यकता थी। इस नयी व्यवस्था में भारत के शहरी केन्द्रो का शिक्षित मध्यम वर्ग समाज का केन्द्र का केन्द्र बिन्द बन गया।