राधा कमल मुखर्जी के प्रमुख विचार - Major Thoughts of Radha Kamal Mukherjee
राधा कमल मुखर्जी के प्रमुख विचार - Major Thoughts of Radha Kamal Mukherjee
भारत में एक विषय के रूप में समाजशास्त्र की शुरूवात करने वाले विद्वानों ने आर. के. मुखर्जी की गणना प्रथम पीढी के समाजशास्त्रियों में की जाती है। डॉ. मुखर्जी ने भारतीय सामाजिक यथार्थ को समझने के लिए पश्चिमी समाजविज्ञान माडल और मार्क्सवादी माडल दोनो को ही अनुपयुक्त और अप्रर्याप्त बताया। मुखर्जी ने समाजशास्त्र-अर्थशास्त्र के क्षेत्र में सूक्ष्म स्तर पर समस्याओं के विश्लेषण की शुरूवात की। उन्होंने अपने अध्ययन तथा शोध कार्य दोनो में सामाजिक विज्ञानों के विभिन्न क्षेत्रों में परस्पर अन्तः क्रिया की आवश्यकता पर बल देते हुए मानवीय समस्याओं के अध्ययन में समाकलित उपागम (इंटीग्रेटेड एप्रोच) का समर्थन किया। मुखर्जी ने अपने अर्थशास्त्र के संस्थागत सिद्धांत में परंपरा एवं मूल्यों की भूमिका को स्वीकार करते हुए बताया कि किस प्रकार आर्थिक सिद्धांत, भौतिक एवं मनोविज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है।
डॉ. मुखर्जी पश्चिम की आनुभविक प्रत्यक्षवादी पद्धति से सहमत नही थे। साथ ही साथ इन्होंने वर्ग संघर्ष और साम्यवाद की विचारधाराओं को भी अस्वीकार करते हुए समुदाय वाद की वैकल्पिक धारणा प्रस्तुत की है। इनके प्रमुख विचार निम्नलिखित है
1. मूल्यों का समाजशास्त्र समाजशास्त्र में आर. के. मुखर्जी को विशेष ख्याति उनके समाजिक मूल्य सम्बन्धी सिद्धांत के कारण ही प्राप्ति हुई। समाजिक संरचना के क्षेत्र में मूल्यों का अध्ययन करने वाले वे पहले विद्वान थे। उन्होंने अपनी पुस्तक मूल्यों की सामाजिक संरचना (द सोशल स्ट्रक्चर ऑफ वैल्यूज 1949) तथा मूल्यों के आयाम (द डायमेन्संस ऑफ वैल्यूज 1964) में मूल्यों का गहन अध्ययन किया। प्रथम पुस्तक में मूल्यों के एक समाजशास्त्रीय सिद्धांत को प्रस्तुत करते हुए मूल्य की परिभाषा उत्पत्ति, विकास, नियम आदि पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला है वहीं दूसरी पुस्तक में मूल्यों के आयामों को समझने का प्रयास किया। मूल्य को परिभाषित करते हुए डॉ मुखर्जी ने लिखा है “ मूल्य समाज द्वारा मान्यता प्राप्त वें इच्छायें एवं लक्ष्य है।
जिनका आन्तरीकरण सीखने यह सामाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से होता है। मूल्य सम्बंधी उनके विचार उनके अधिकांश लेखनों में प्रत्यक्ष परोक्ष रूप में छाये हुए है। मूल्यों के बारे में मुखर्जी ने विशेषता दो मूलभूत मुद्दो पर ध्यान आकर्षित किया है। पहला, उनका यह मानना है कि मूल्य धर्म और राजनीतिशास्त्र तक सीमित नहीं है। अपितु अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग मूल्य भी है। जैसे आर्थिक मूल्य, सामाजिक मूल्य, वैधानिक मूल्य, शैक्षिक मूल्य, नैतिक मूल्य, परिस्थितिकी मूल्य आदि। जीवन के विभिन्न पक्षों में जुड़े मूल्यों के आपस में प्रकार्यात्मक सम्बंध होता है, परिणाम स्वरूप में समाज में संतुलन एवं व्यवस्था बनी रहती है। दूसरा, 'मूल्य आत्मनिष्ठ अथवा व्यक्तिपरक अकाक्षाओं का परिणाम नही होते अपितु ये मूल्य हमारी अकाक्षाओं और इच्छाओं में समाविष्ठ होते है। दूसरे शब्दो में मूल्य सामान्य और वस्तुनिष्ठ दोनो होते है। मुखर्जी ने मूल्यों को दो वर्गों में विभाजित किया है। जो निम्न है2. साध्य मूल्य - साध्य मूल्य मानव के आन्तरिक जीवन से संबंधित ऐसे लक्ष्य एवं तृप्तियाँ है जिन्हें मनुष्य और समाज दोनो ही जीवन और मस्तिष्क के विकास के लिए आवश्यक मानते है। ये मूल्य व्यक्ति के आचरण के अंग होने के साथ-साथ अमूर्त या लोकातीत होते है जैसे सत्य, शिव, व सुन्दर से संबंधित मूल्य मनुष्य के आन्तरिक जीवन से संबंधित है स्वतः ही पूर्ण हैं।
3. साधन मूल्य साधन मूल्य प्रथम प्रकार के मूल्यों अर्थात साध्य मूल्यों को प्राप्त करने, निर्वाह करने, विकसित करने सहायता करते है। स्वास्थ्य, सम्पत्ति, सुरक्षा, सत्ता, पेशा, प्रस्थिति आदि से संबंधित मूल्य साधन मूल्य है। क्योकि इनका उपयोग कतिपय लक्ष्यों व संतोषो की प्राप्ति के साधन के रूप में किया जाता है। ये मूल्य विशिष्ट और अस्तित्वात्मक होते है जिनका प्रयोग 'लौकिक लक्ष्यों' की पूर्ति के साधन या उपकरण के रूप किया जाता है।
डॉ. मुखर्जी ने मूल्यों तथा गैरमूल्यों (अपमूल्यों) में भी भेद किया है। समाज द्वारा स्वीकृत लक्ष्यों को प्राप्ति करने के लिए स्वीकृत मानदंडों की उपेक्षा कर जब उनके विरूद्ध आचरण किया जाता है, तो इस स्थिति को सामाजिक मूल्यों का उल्लंघन अथवा अपमूल्य कहा जाता है। आर.के. मुखर्जी ने मूल्यों के कुछ नियमों का उल्लेख करते हुए कहते है कि समाज के नियन्त्रण या अनुमोदन के माध्यम से समस्त मानवीय अभिप्रेरणायें मूल्यों से रूपान्तरित हो जाती है। आधारभूत मूल्यों की परितृप्ति हो जाने पर खिन्नता या उदासीनता पनपती है। उस अवस्था समाज एवं संस्कृति मनुष्य के लिए नवीन इच्छाओं, नवीन लक्ष्यों तथा के नवीन साधनों को प्रस्तुत करते है। जिसके कारण नये मूल्य पनपते है। इसी को मूल्यों के चक्र का नियम (ला ऑफ दा साइकिल ऑफ वैल्यू) कहते है। डॉ. मुखर्जी के अनुसार सभी मूल्य एक ही स्तर के नहीं होते अपितु उनमें एक संस्तरण देखने को मिलता है। इस संस्तरण का सम्बंध मूल्यों के आयामों से होता है। मूल्यों के तीन आयाम जैविक, सामाजिक, और आध्यमिक होते है। आर. के मुखर्जी के मूल्यों के सिद्धांत की तीन प्रमुख विशेषताएं है।
प्रथम मूल्य जनसमूह की आधारभूत प्रेरणाओं को व्यवस्थित रूप में संतुष्ट करते है।
द्वितीय मूल्यों का रूप सामान्य होता है। इनमें व्यक्तिगत और सामाजिक दोनो प्रकार के मनोभाव एवं प्रतिक्रियाएं सम्मिलित होती है।
तृतीय - मानव समाज में विभिन्नताओं के बावजूद कुछ सार्वभौमिक मूल्य है सभी धर्म इन सार्वभौमिक मूल्यों के भंडार है।
पिछले कुछ दशकों में मूल्य रहित या मूल्य तटस्थ सामाजिक विज्ञान का विचार भारत सहित सभी पश्चिमी देशों में उभरा है। इस विषय पर कॉफी वाद-विवाद हुआ है और अभी भी जारी है। मुखर्जी के विचार में तथ्य और मूल्य को अलग-अलग समझना सही नहीं है। मानव अन्तःक्रियाओं में इन दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। प्रत्येक समाज की अपनी एक संस्कृति होती है तथा इसके मूल्य और प्रतिमान लोगो के व्यवहार का निर्देशन करते है। इसलिए पश्चिम की प्रत्यक्षवादी विचारधारा जो तथ्यों और मूल्यों को अलग-अलग रूप में देखती है, भारतीय समाज के सन्दर्भ में डॉ. मुखर्जी को रास नही आया।
सामाजिक परिस्थितिकी - आर. के. मुखर्जी ने सामाजिक परिस्थितिकी का व्यापक रूप से अध्ययन करते हुए इससे संबंधित पुस्तकें एवं अनेक लेखों का सम्पादक किया। इनकी दृष्टि में सामाजिक परिस्थितिकी एक मिश्रित विज्ञान है, जिसमें कई सामाजिक विज्ञानों का परस्पर आदान प्रदान होता है। इसमें मानव जीवन पर सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक कारको सहित भूवैज्ञानिक, भौगोलिक एवं जैविक कारकों के सम्मिलित प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। डॉ मुखर्जी ने बताया कि मानव परिस्थितिकी और समाज के बीच गहरा सम्बंध है। अतः एक परिस्थितिक क्षेत्र के विकास को एक गतिशील प्रक्रिया के रूप देखा जाना चाहिए मुखर्जी के अनुसार मानव सम्बंधों के अध्ययन में मानव प्रदेश' ही एक उचित इकाई है, क्योंकि एक प्रदेश में ही हम एक दूसरे के साथ अन्तः क्रिया करने वाले, एक संस्कृति को मानने वाले मानव समूहों और पौधों, पशुओं एवं उनके निर्जीव पर्यावरण के बीच पाये जाने वाले जटिल अन्तर्सम्बंधों को ठीक समझ सकते है।
डॉ. मुखर्जी ने सामाजिक परिस्थितिकी दो प्रमुख प्रकार बताये है व्यावहारिक परिस्थितिकी व्यावहारिक परिस्थितिकी इस बात पर बल देती है कि मानव प्रकृति का दास नही। अपितु वह उसका एक सहयोगी है। इसमें मानवीय जनसंख्या, प्राकृतिक साधन, वनस्पति, और पशु जगत के बीच संतुलन का अध्ययन किया जाता है।
समुदाय परिस्थितिकी - इसके अन्तर्गत मानव भूगोल, जीवशास्त्र, अर्थशास्त्र, सामाजिक मनोविज्ञान, और प्रौद्योगिकी के साथ परिस्थितिकी सम्बंधो और अन्तः क्रियाओ का अध्ययन किया जाता है।
डॉ. मुखर्जी ने सामाजिक परिस्थितिकी पर अपनी पुस्तक में पाश्चात्य सामाजिक वैज्ञानिकों की मान्यताओं से भिन्न विचार व्यक्त किये हैं। अमेरिका में 'शिकागो स्कूल' ने सामाजिक विघटन, शहरीकरण की समस्याओं के आनुभविक अध्ययन को महत्व दिया इस विचारधारा के समर्थक पार्क, वार्गेस, लुई विर्थ, गीडिग्स आदि जैसे समाजशास्त्री थे जिनके विचारों से प्रभावित होकर डॉ. मुखर्जी ने अपना सामाजिक परिस्थितिकी से संबंधित सिद्धांत दिया।
शहरीकरण की समस्याओं का अध्ययन- डॉ मुखर्जी ने भारत में औद्योगिकीकरण के बाद शुरू होने वाली शहरीकरण की प्रक्रिया का अध्ययन किया। मुम्बई, कलकत्ता, मद्रास और कानपुर आदि जैसे शहरो की गंदी बस्तियों, वैश्यावृत्ति, जुआँखोरी, सामाजिक अपराध तथा आवास जैसी मूलभूत असुविधाओं का अध्ययन किया।
भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता- डॉ मुखर्जी ने भारतीय कला, वास्तुकला, इतिहास और संस्कृति के बारे में विस्तृत रूप से चर्चा की है। इनका मानना था कि एशियाई कला का उद्देश्य समाज का सामूहिक विकास करना है। जहां प्राचीन कलाएं सामुदायिक भावना से ओतप्रोत होती थी। वहीं पश्चिम के कलात्मक प्रयास में वैक्तिक भावना की प्रधानता होती थी। डॉ मुखर्जी के अनुसार भारतीय कला धर्म से जुडी रही है। हिन्दु, जैन और बौद्ध धर्म जैसे भारतीय धर्म कला, नीतिशास्त्र एवं सामाजिक मूल्यों के स्पष्ट प्रतिमान रहे हैं। जिसमें विभिन्न समूह एक साथ रह सकते है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय कला, संस्कृति एवं धार्मिक मूल्य अत्यधिक सहिष्णु थे। जिसके कारण यहां स्थानीय संस्कृतियों की समृद्धि के साथ-साथ नई सम्मिलित संस्कृतियों का भी उद्भव हुआ। डॉ मुखर्जी ने सार्वभौम सभ्यता (संस्कृति) पर भी विचार रखा जिसके अन्तर्गत उन्होंने मानव सभ्यता को तीन स्तरों में विभाजित किया। यह स्तर एक-दूसरे से सम्बद्ध है। प्रथम स्तर पर जैविक विकास की चर्चा की गयी है, जिसने मानव सभ्यता के उदय और विकास में सहायता की है। द्वितीय स्तर पर उन्होंने सभ्यता की सामाजिक मनोवैज्ञानिक आयामो की व्याख्या की है और तीसरे स्तर पर उन्होंने सभ्यता के आध्यमिक आयाम का विश्लेषण किया है।
डॉ मुखर्जी ने पश्चिम की प्रबोधनकालीन आधुनिकता को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए अपने दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि समाज के किसी भी सामान्य सिद्धांत की रचना तब तक नही कि जा सकती जब तक समाज को मनुष्य ईश्वर प्रकृति के त्रयी संरूपण में बांधा नहीं जाता है। डॉ मुखर्जी ने पिछली शताब्दी के साठ दशक में ही पश्चिमी सामाजिक विज्ञान की प्रकृति के संकट तथा इससे जुड़ी हुई आधुनिकता, औद्योगिकीकरण, और उपयोगितावादी योजनाओं के बारे में पूर्वानुमान कर समाज वैज्ञानिकों को इनके दुष्प्रभावों के बारे मे आगाह किया है। तथा भारतीय बुद्धिजीवियों को इसके अंधानुकरण से होने नुकसानो के प्रति सचेत किया।
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