मनु एवं मनुस्मृति - Manu and Manusmriti
मनु एवं मनुस्मृति - Manu and Manusmriti
हिंदू धर्म के अनुसार मनु संसार का पहला व्यक्ति है। समाज का प्रथम व्यवस्थाप है, जिन्होंने अपने ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ में सामाजिक व्यवस्था का विस्तृत वर्णन किया है। लेकिन मनु के जीवन के बारे में कोई प्रामाणिक कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है, इनके जन्म, मृत्यु, अभिलेख, के तथ्यात्मक विवरण उपलब्ध नही है। जिसके कारण इस संबंध में भिन्न-भिन्न विचारकों ने अपना मत प्रस्तुत किया है। के मोतवानी ने मनु के संन्दर्भ में तीन मत प्रस्तुत किये है प्रथम, मनु एक ऋषि के रूप में वास्तविक व्यक्ति हुए है, द्वितीय मनु की उपाधि उन्हें वेदो की अनेक शाखाओं के ज्ञान के कारण दी गयी थी, तथा तृतीय, मनु सम्पूर्ण मानव जाति से संबंधित थे तथा वह भारत के हिन्दुओं की व्यक्तिगत सम्पत्ति नही थे।
पी. वी. काणे ने अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र’ में यह स्पष्ट नहीं किया कि मनु का जन्म कब हुआ, मनुस्मृति की रचना कब और किसने की? ऋग्वेद में जिस मनु का उल्लेख है निश्चय ही उन्होंने मनुस्मृति की रचना नहीं की। एस.सी. दूबे ने लिखा है कि ‘मनुस्मृति’ के मनु को कोई ऐतिहासिक पुरूष न मानते हुए हम इतना कह सकते हैं
कि वैदिक सभ्यता के अन्तिम चरण में सम्भवता मनु नाम के कई पुरूष हुए हों जो शक्ति, बुद्धि और विद्वत्ता में तत्कालीन युग में श्रेष्ठ रहे हो और समाज के परिवर्तन के साथ उनकी ऐतिहासिकता, पौराणिकता, का रूप ग्रहण करती गयी हो, जिन्होंने बाद में उन्हें श्रद्धावश आदि पुरूष स्वीकार कर लिया हो। इस प्रकार मनुस्मृति में वर्णित नियम लम्बी परंपरा की देन है उसे किसी एक व्यक्ति की रचना मान लेना एक भूल होगी। कुछ विचारक मानते है कि मनु शब्द का संबंध मनन अथवा चिंतन' से है। इसका तात्पर्य है कि मनु एक व्यक्ति न होकर विशेष पद का सूचक है। जिस तरह शंकराचार्य की गद्दी' को ग्रहण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को 'शंकराचार्य' कहा जाता है। ठीक उसी तरह मनु पद का प्रचलन हो गया, इन्हीं में से किसी एक मनु ने मनुस्मृति की रचना की तथा ने उनकें बाद मनु के पद पर असीन विचारकों द्वारा समय-समय पर मनुस्मृति में संशोधन किया जाता रहा।
मनुस्मृति की रचना का भी कोई स्पष्ट काल निर्धारण नहीं मिलता स्वयं मनुस्मृति में इसकी रचना के काल का कोई उल्लेख न होने के कारण विभिन्न विद्वानों एवं इतिहासकारों ने इसे अपने-अपने ढंग से स्पष्ट किया है। उदाहरण के लिए काल्डवेल ने मनस्मृति की रचना का काल 900 वर्ष ई0 पूर्व माना है जबकि मैक्समूलर का विचार है कि यह ग्रंथ ई0 से 400 वर्ष पहले लिखा गया। भारतीय संस्कृति प्रमुख इतिहासकार पी.वी. काणे का विचार है
कि मनुस्मृति की रचना ई0 से 200 वर्ष पहले से लेकर ई0 से 200 वर्ष बाद के बीच किसी समय की गयी। अनेक विद्वानों का मानना है कि जिस तरह वेदो की रचना का कोई निश्चित समय निर्धारित नहीं किया जा सकता उसी तरह मनुस्मृति की रचना का काल निर्धारण कर सकना भी बहुत कठिन है।
'मनुस्मृति सम्पूर्ण धनशास्त्र माना जाता है जिसमें मानव जीवन के सभी पहलुओं पर चर्चा की गयी है। मनुस्मृति बारह अध्यायों में विभाजित है तथा इसमें लगभग 2700 श्लोक है। इसकें प्रथम अध्याय में विश्व की उत्पत्ति, द्वितीय अध्याय में धर्म, संस्कार विधि, जातकर्म, तृतीय अध्याय में हिंदू विवाहों के प्रकार, ब्रम्हचर्य आश्रम, समावर्तन संस्कार, पंच महायज्ञ विधि तथा श्राद्ध कर्मो आदि, चतुर्थ अध्याय में गृहस्थ के नियम आदि का, पंचम अध्याय में शुद्ध-अशुद्ध और व्यवहारों आदि का, षष्ठ अध्याय में वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम, मोक्ष आदि का, सप्तम अध्याय में राजधर्म का, अष्ठम अध्याय में न्याय एवं दंड का, नवम् अध्याय में स्त्री-पुरूष के धर्म, नियोग की निंदा, वैश्य एवं शूद्र के कर्मों आदि का, दशम अध्याय में अनुलोम प्रतिलोम विवाह, आपद् धर्म आदि का, एकादश अध्याय में प्रयश्चित विधान एवं द्वादश अध्याय में संसारगति, कर्म एवं पुनर्जन्म, मोक्ष एवं आत्मज्ञान आदि का वर्णन किया गया है।
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