विवाह धर्म - marriage religion
विवाह धर्म - marriage religion
कौटिल्य का यह निश्चित मत है कि विवाह संस्कार के बाद ही सांसरिक व्यवहार प्राम्भ होते है अतः उचित समय में विधिवत इस संस्कार को पूरा कर लेना चाहिए। ताकि जीवन तथा धर्म सम्बन्धी कर्तव्य-कर्मों को पूरा किया जा सके। मनु की भांति कौटिल्य ने भी आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख किया है। वस्त्र आभूषण आदि से सजाकर विधिपूर्वक कन्यादान करना ब्रम्हा विवाह है। वेदों के समीप बैठकर ऋत्विज को जब कन्यादान दी जाती है तो उसे देव विवाह कहते है। वर से धर्मपूर्वक गाय अथवा बैल का जोड़ा लेकर कन्या देना आर्ष विवाह कहलाता है। कन्या और वर दोनो सहधर्म पालने की प्रतिज्ञा कर जिस विवाह बंधन को स्वीकार करते है उसे प्रजापात्य विवाह कहते हैं। कन्या और वर अपने-अपने माता-पिता से बिना पूछे आपसी पसंद व सहमति से जो विवाह करते है उसे गन्धर्व विवाह कहा जाता है। कन्या के पिता आदि को धन देकर किया हुआ विवाह असुर विवाह कहलाता है। बालात् किसी कन्या का अपहरण करके विवाह करना राक्षस विवाह है। सोई हुई कन्या के बालात्कार करके विवाह करना पैशाच विवाह कहलाता है। कौटिल्य ने प्रथम चार प्रकार के विवाह को धर्मानुकूल बताया है।
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