मैक्स वेबर के आदर्श प्रारूप की अवधारणा - Max Weber's concept of ideal format

मैक्स वेबर  के आदर्श प्रारूप की अवधारणा - Max Weber's concept of ideal format


समाजशास्त्री जगत में आदर्श प्रारूप की अवधारणा एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। वेबर ने सामाजिक घटनाओं को समझने की दृष्टि से सन 1904 में सर्वप्रथम आदर्श प्रारूप की अवधारणा का प्रयोग किया। इस संबंध में जूलियन फ्रायड ने लिखा है “मैक्स वेबर की समाजशास्त्री जगत में एक और महत्वपूर्ण अवधारणा आदर्श प्रारूप है।" मैक्स वेबर के पूर्व भी आदर्श प्रारूप पर किसी न किसी रूप में विचार होता रहा है जैसा कि डिल्थे, एडमंड हार्मूल, सिम्मल, हैनरी रिकर्ट आदि के विचारों से स्पष्ट है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि आदर्श प्रारूप के रूप में वेबर ने कोई नवीन अवधारणा प्रस्तुत नहीं की है और ना ही ऐसा कोई दावा प्रस्तुत किया हैं।

टालकट पारसंस में लिखा है "मैक्स वेबर के लिए मानवीय क्रिया के क्षेत्र में सिद्धांत आदर्श प्रारूपों की प्रणाली में स्थित है।

इसे विकसित करने में मैक्स वेबर ने कोई नई चीज प्रस्तुत करने का दावा नहीं किया है, बल्कि अन्य की अपेक्षा इसे सूत्रबद्ध किया है। जिसे कि वस्तुतः विशिष्ट तार्किक सिद्धांतों के अंतर्गत समाज वैज्ञानिक कार्य-कारण संबंधों को सिद्ध करते हुए करते थे" जिस समय मैक्स वेबर ने आदर्श प्रारूप की विधिवत परिभाषा दी थी उस समय अध्ययन विधि के क्षेत्र में दो मुद्दे महत्वपूर्ण थे


1. वैचारिक विधि से जुड़ा मुद्दा

2. तुलनात्मक विधि का मुद्दा


 इस संबंध में दार्शनिकों में बहुत बड़ा विवाद था। डिल्थे एवं रेकर्ट समाज विज्ञान की विधियों में दो पृथक ध्रुवों पर खड़े थे। वेबर ने इन दोनों के मध्य में आदर्श प्रारूप को रखा। वेबर ने डिल्थे के इस विचार को स्वीकार किया कि समाज एवं मूल्य समाजशास्त्र की बुनियादी अवधारणा है। रेकर्ट के विचारों से उन्होंने इस बात को स्वीकारा कि विज्ञान आखिर विज्ञान ही होता है चाहे वह भौतिक घटनाओं का अध्ययन करें या मानसिक क्रियाओं एवं सामाजिक गतिविधियों का।

इस तरह उन्होंने डिल्थे से मूल्यों एवं समझ को लिया एवं रेकर्ट के अनुसार समाजशास्त्र को विज्ञान का स्थान दिया। हालांकि उन्होंने डिल्थे एवं रेकर्ट का विरोध भी किया। उन्होंने डिल्थे के इस विचार का विरोध किया कि समझ एवं मूल्यों को लेने से समाजशास्त्र विज्ञान नहीं रहता तथा उन्होंने रेकर्ट का इस बात पर विरोध किया कि विज्ञान और इतिहास परस्पर विरोधी नहीं है। वेबर के अनुसार "समाजशास्त्र एक विज्ञान है जिसकी अध्ययन सामग्री इतिहास से ली जाती है। इस तरह वेबर ने आदर्श प्रारूप की व्याख्या एक विधि के रूप में की है।"


दूसरा मुद्दा तुलनात्मक विधि से जुड़ा है यदि हम सामाजिक स्थितियों जैसे धर्म, वर्ग, क्रांति, है समाजवाद आदि का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं तो इसकी विधि आदर्श प्रारूप की होगी इस तरह उपरोक्त दो मुद्दों के आधार पर मैक्स वेबर ने आदर्श प्रारूप को परिभाषित किया है।


मैक्स वेबर के अनुसार "तर्कसंगत नीति से सामाजिक प्रघटनाओ के कार्य-कारण संबंधों को तब तक स्पष्ट नहीं किया जा सकता जब तक की उन घटनाओं को पहले समानताओं के आधार पर कुछ सैद्धांतिक श्रेणियों में बांट ना दिया जाए क्योंकि ऐसा करने पर हमें कुछ आदर्श टाइप की घटनाएं मिल जाती है।


मैक्स वेबर कहते हैं कि “समाजशास्त्रियों को अपनी उपकल्पना का निर्माण करने के लिए आदर्श अवधारणाओं का चयन करना चाहिए। यह आदर्श प्रारूप ना तो औसत प्रारूप है और ना ही आदर्शात्मक बल्कि वास्तविकता के कुछ विशिष्ट तत्वों के विचारपूर्वक चुनाव एवं सम्मिलन के द्वारा निर्मित आदर्शात्मक मान है।” अन्य शब्दों में आदर्श प्रारूप का आशय है कुछ वास्तविक तथ्यों के तर्कसंगत आधार पर यथार्थ अवधारणाओं का निर्माण करना।

डॉनमार्टिनडेल ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि “आदर्श प्रारूप व्यक्तियों की काल्पनिक वास्तविकता से अनुसंधानकर्ता द्वारा उचित अवयवों से मिलकर बनाया गया है। जिसका उद्देश्य स्पष्ट तुलना करना हो सकता है। "


रेमण्ड ऐरन ने वेबर के आदर्श प्रारूप की व्याख्या विधिशास्त्र के विशाल संदर्भ में की है। इसके निर्माण का उद्देश्य अनुसंधानकर्ता की समझ को विकसित करना है।

जहां एक तरफ इसका संदर्भ हमारे समाज से है वहीं दूसरी तरफ विज्ञान से है। विज्ञान की प्रक्रिया विवेकपूर्ण होती है इसलिए आदर्श प्रारूप का निर्माण समाजशास्त्र को विज्ञान का दर्जा देने के लिए और अध्ययन सामग्री को समझने के लिए किया गया है।


● रेमण्ड ऐरन के अनुसार "आदर्श प्रारूप का निर्माण इसलिए भी किया गया है कि हम कार्य कारण की व्याख्या सही तरह से कर सके आदर्श प्रारूप हमें ऐतिहासिक तथ्यों को समझने में सहायक होता है लेकिन यह ऐतिहासिक या सामाजिक तत्व संपूर्ण ना होकर आंशिक ही होते हैं।”


जुलिएन फ्रेण्ड ने आदर्श प्रारूप की व्याख्या वैज्ञानिक पद्धति से की है क्योंकि प्राकृतिक विज्ञानों की एक बहुत बड़ी विशेषता यह होती है कि वह अपने अनुसंधान में काम आने वाली अवधारणा की व्याख्या स्पष्ट रूप से करते हैं लेकिन जब समाज विज्ञान में अवधारणाओं को परिभाषित करने का प्रश्न उठता है। तब यह परिभाषाएं अस्पष्ट रह जाती हैं इसलिए मैक्स वेबर ने आदर्श प्रारूप की जो व्याख्या की है उसका विश्लेषण करते हुए जूलिएन फ्रेण्ड कहते हैं कि आदर्श प्रारूप सब मिलाकर उन सभी अवधारणाओं का जोड है जिनका निर्माण विशेष रूप से अनुसंधान के उद्देश्य किया जाता है”।


लेविस कोजर ने आदर्श प्रारूप का विश्लेषण करते हुए कहा है कि यह वह विधि है जिसका प्रयोग तुलनात्मक अध्ययन के लिए किया जाता है इसके निर्माण में एक या इससे अधिक बिंदओं को सम्मिलित किया जाता है तथा इसके अंतर्गत समष्टि में पाई जाने वाली घटनाओं का विश्लेषण भी किया जाता है। आदर्श प्रारूप नैतिक दृष्टि से आदर्श ही हो ऐसा नहीं है एक तरफ आदर्श प्रारूप किसी व्यक्तित्व पर आधारित हो सकता है वहीं दूसरी तरफ इसका केंद्र सामूहिकता भी हो सकती है।"


सुशान हेकमन ने 1983 ने एक किताब वेबरः द आइडियल टाइप एंड कंटेंपररी सोशल थ्योरी लिखी। इसमें उन्होंने लिखा कि आदर्श प्रारूप किसी समाज वैज्ञानिक की कल्पना और इच्छा पर आधारित नहीं है बल्कि तर्क पूर्ण रूप से निर्मित धारणा है। वेबर के अनुसार उन्हें वास्तविक सामाजिक इतिहास के संसार से निगमन के आधार पर प्राप्त किया जा सकता है। यह अमूर्त चिंतन का परिणाम नहीं है बल्कि इतिहास से प्राप्त एक सैद्धांतिक चित्र है।

यह एक सैद्धांतिक वशीकरण है। आदर्श प्रारूप में कुछ भी आदर्श नहीं है। यह अतिशयोक्तिपूर्ण होते हैं और यह पूर्ण रूप से वास्तविकता का बोध भी नहीं कराते और ना ही आदर्श स्थिति का बोध कराते हैं। उदाहरण के लिए यदि हम भारतीय संयुक्त परिवारों का आदर्श प्रारूप तैयार करें तो हम यह देखते हैं कि संपत्ति पर उनका पूरा अधिकार है, परिवार की सत्ता पुरूषों के पास होती हैं, संयुक्त परिवार व्यक्तित्व के विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं, इनमें धर्म की सामूहिक अभिव्यक्ति होती है, संयुक्त परिवार संयुक्त चूल्हे एवं संयुक्त सम्पत्ति की धारणा पर आधारित है।


इस उदाहरण के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि सभी परिवार ऐसे नहीं होते जिस तरह वेबर ने स्वयं आदर्श प्रारूप की धारणा को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया है।


थॉमस बर्जर ने लिखा है कि वेबर ने 'इकोनॉमी एंड सोसाइटी' नामक पुस्तक में जो आदर्श प्रारूप प्रस्तुत किए हैं। वे परिभाषाएं हैं, वर्गीकरण है और विशिष्ट कल्पनाएं भी है। सुसान हेकमन ने वेबर की इस बात को स्वीकार नहीं किया परंतु उन्होंने इस बात को स्वीकार किया है कि वेबर ने आदर्श प्रारूप की धारणा का अनेक अर्थों में प्रयुक्त किया है।


मैक्स वेबर के आदर्श प्रारूप की अवधारणा को समझने के लिए हमें निम्न तीन बातों को जानना आवश्यक है


1. आदर्श प्रारूप आत्मगत होते हैं


मैक्स वेबर के अनुसार आदर्श प्रारूप वास्तव में आत्मगत होते हैं। भौतिक विज्ञान के नियम शुद्ध रूप से वस्तुनिष्ठ होते हैं जबकि सामाजिक विज्ञान के नियम शुद्ध रूप से वस्तुनिष्ठ नहीं हो सकते। इसी कारण सामाजिक अध्ययन में वस्तुनिष्ठता को प्राप्त नहीं किया जा सकता। वास्तव में सामाजिक विज्ञानों का संबंध मानव व्यवहार से होता है और मानव व्यवहार हमेशा स्वतंत्र इच्छा से जुड़ा रहता है। वह चाहते थे कि समाजशास्त्र को भौतिक विज्ञान की तरह वस्तुनिष्ट बनाया जाएं। दोनों विज्ञानों की प्रकृति में अंतर होने के कारण इसमें वस्तुनिष्ठता प्राप्त नहीं की जा सकती फिर भी हमें आदर्श प्रारूप के माध्यम से समाजशास्त्रीय अध्ययनों को अधिक से अधिक वस्तुनिष्ठ बनाने का प्रयास करना चाहिए।


2. आदर्श प्रारूप भावात्मक है


आदर्श प्रारूप भावात्मक होते हैं क्योंकि यह हमारी कल्पना में रहते हैं। आदर्श प्रारूप कोई स्थूल वस्तु नहीं होती यह सूक्ष्म होते हैं और हम आदर्श प्रारूपों की भौतिक नियमों से तुलना भी कर सकते हैं। 


3. आदर्श प्रारूप परिवर्तनशील है।


वेबर के अनुसार आदर्श प्रारूप का निर्माण व्यक्ति के द्वारा समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए किया जाता है। इसलिए यह स्थाई नहीं होते आदर्श प्रारूप में परिवर्तन के दो कारण हैं


1. इसका निर्माण किसी एक समय में होता है अर्थात यह समय की उपज है और समय बदलने से इनमें परिवर्तन हो जाता है।


2. आदर्श प्रारूप का निर्माण चूंकि मनुष्य ही करता है। इसलिए मनुष्य की भावात्मक स्थिति में परिवर्तन होने से आदर्श प्रारूप परिवर्तित हो जाता है इसलिए आदर्श प्रारूपों को स्थाई नहीं कहा जाता मैक्स वेबर के अनुसार आदर्श प्रारूप समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए साधन मात्र है और समय के बदलने के साथ-साथ उन्हें भी बदलना आवश्यक है। इसलिए एक समाजशास्त्री का कार्य केवल आदर्श प्रारूपों का निर्माण करना ही नहीं है बल्कि समय-समय पर इसके परिवर्तित अर्थ की व्याख्या करना


भी है जिससे सामाजिक क्रियाओं के अर्थ को समझा जा सके। वेबर के पद्धति शास्त्र में आदर्श प्रारूप की अवधारणा का विशेष महत्व है। वेबर ने सामाजिक वास्तविकता को समझने के लिए और उसके बारे में सामान्य नियमों को जानने के लिए इस अवधारणा का प्रयोग किया। वेबर आदर्श प्रारूप को अनुसंधानकर्ता के अध्ययन का एक यंत्र मानते थे। इसका प्रयोग वह घटनाओं की समानता और असमानताओं को ज्ञात करने के लिए कर सकते थे। तुलनात्मक अध्ययन के लिए यह एक मौलिक विधि है।