संस्था के अर्थ एवं परिभाषाएँ - Meaning and definitions of organization

 संस्था के अर्थ एवं परिभाषाएँ - Meaning and definitions of organization


यह समाजशास्त्र की कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है। प्रत्येक मनुष्य की कुछ मौलिक आवश्यकताएँ होती हैं तथा इन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वह कुछ नियमों व कार्यप्रणालियों को निर्मित करता है। ये नियम तथा कार्यप्रणालियाँ समाज द्वारा स्वीकृत होते हैं। इन नियमों तथा कार्यप्रणालियों की सहायता से मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। धीरे-धीरे ये नियम तथा कार्यप्रणालियाँ मानव के लिए अनीवार्य हो जाते हैं तथा समाज के सदस्यों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु इन्हीं नियमों तथा कार्यप्रणालियों को अपनाएं। जब ये नियम तथा कार्यप्रणाली समाज में पूरी तरह से स्थापित हो जाते हैं तथा इनमें बाध्यता का गुण आ जाता है, तब इन्हें ही संस्था की संज्ञा प्रदान की जाती है। संस्थाएं मानव जीवन के प्रत्येक कदम पर उपस्थित रहती हैं तथा मानव के निर्देशन में सहायक रहती हैं।


संस्था का सर्वप्रथम प्रयोग हर्बर्ट स्पेन्सर द्वारा किया गया तथा वे अपनी पुस्तक 'फर्स्ट प्रिंसिपल्स' में लिखते हैं कि संस्था वह अंग है जिसके माध्यम से समाज के कार्यों को करियान्वित किया जाता है। 


मैकाइवर तथा पेज के अनुसार,


संस्थाएं समूहिक क्रिया की विशेषता व्यक्त करने वाली कार्यप्रणाली के स्थापित स्वरूप अथवा अवस्था को कहते हैं। "


सदरलैंड तथा अन्य के अनुसार,


समाजशास्त्रीय संभाषण में संस्था उन जनरीतियों तथा रूढ़ियों का समूह है, जो मानवीय सध्या अथवा उद्देश्य की प्राप्ति जआर केन्द्रित रहता है। 


गिलिन तथा गिलिन के शब्दों में,


"सामाजिक संस्था कुछ सांस्कृतिक विशेषताओं को प्रकट करने वाले वे नियम हैं जिनमें काफी स्थायित्व पाया जाता है तथा जिनका कार्य सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना होता है।”


रॉबर्ट बिरस्टिड के अनुसार,


"संस्था सुव्यवस्थित अथवा संगठिक कार्यप्रणाली को कहते हैं। समाज में कार्य करने के औपचारिक, मान्य, स्थापित उस प्रकार के तरीके को संस्था कहते हैं, जिसे समाज द्वारा स्वीकृति प्राप्त हो। "


आगबर्न एवं निमकाफ के अनुसार,


"कुछ आधारभूत मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि हेतु संगठिन एवं स्थापित प्रणालियाँ सामाजिक संस्थाएं हैं।" 


रॉस लिखते हैं कि


"सामाजिक संस्थाएं सर्वमान्य इच्छा द्वारा सुस्थापित अथवा समाज द्वारा स्वीकृत संगठित मानव सम्बन्धों का समूह है। "


उक्त प्रस्तुत परिभाषाओं के आलोक में सार रूप में यह कहा जा सकता है कि सामाजिक संस्थाएं मनुष्य की मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन के रूप में विकसित किए गए नियमों, कार्यप्रणालियों का एक सुव्यवस्थित तथा संगठित रूप है, जो समाज द्वारा स्वीकृत है। दूसरे शब्दों में सामाजिक जीवन को व्यवस्थित तथा संगठित बनाए रखने के लिए निर्मित समाज स्वीकृत नियमों का पुंज ही सामाजिक संस्था है।