शक्ति की अवधारणा , शक्ति का अर्थ एवं परिभाषा - Meaning and definitions of power
शक्ति की अवधारणा , शक्ति का अर्थ एवं परिभाषा - Meaning and definitions of power
शक्ति मानव जीवन की एक प्रमुख आवश्यकता है। समाजशास्त्र में शक्ति का अध्ययन एक प्रमुख विषय बन गया है। नियंत्रण के रूप में शक्ति समाज में सुरक्षा शांति व्यवस्था न्याय स्वतंत्रता और सभ्यता के विकास एवं प्रगति के लिए आवश्यक है। शक्ति के अभाव में सामाजिक व्यवस्था की कल्पना नहीं की जा सकती। शक्ति के द्वारा एक व्यक्ति अपना प्रभाव दूसरे पर डालने में समर्थ होता है एवं वह दूसरों को प्रभावित करता है। सामान्य रूप से शक्ति का तात्पर्य किसी भी व्यक्ति या समूह के उस दबाव से समझा जाता है जो अन्य व्यक्तियों या समूह पर स्पष्ट होता है एक अवधारणा के रूप में शक्ति का संबंध एक विशेष परिस्थिति तथा उससे संबंधित भूमिका के निर्वाह से है शक्ति के आधार परंपरा कानून अथवा करिश्मा हो सकते हैं लेकिन व्यावहारिक रूप में शक्ति स्थिति तथा भूमिका से ही संबंधित होती है जिससे अन्य व्यक्तियों के द्वारा स्वीकार किया जाता है। शक्ति नेतृत्व अथवा लोगों के समूह में होती है
जो शक्ति को धारण करते हैं और भी अपने शक्तिशाली प्रभाव का उपयोग लोगों को दिशा प्रदान करने में करते हैं और यह शक्ति छोटे समूह के द्वारा अन्य रूपों में समाज में कार्य करती है शक्ति कभी-कभी औपचारिक रूप से व्यक्ति अथवा समूह के द्वारा समाज पर नियंत्रण रखती है यह निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाती है।
मैकाइवर "समस्त गति सभी संबंध सभी प्रक्रियाएं समस्त व्यवस्था और प्रकृति में घटने वाली प्रत्येक घटना शक्ति की अभिव्यक्ति है।"
शक्ति का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Power)
सामान्यतः शक्ति के कई अर्थ लगाए जाते हैं, शक्ति की चर्चा भौतिक शक्ति, आध्यात्मिक शक्ति, नैतिक शक्ति, शारीरिक शक्ति, मानसिक शक्ति, पाशविक शक्ति आदि विभिन्न रूपों में की जाती है। वर्तमान समय में यदि हम शक्ति के अर्थ को देखें तो यह हिंसा, आतंक एवं दमन के पर्यायवाची रूप में भी प्रयुक्त की जाती है।
प्रभाव, बल प्रयोग, सत्ता एवं नियंत्रण के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है। विभिन्न समाजशास्त्रियों ने शक्ति की परिभाषा इस प्रकार दी है
मैक्स वेबर के अनुसार, "सामान्यतः हम शक्ति को व्यक्ति अथवा कई लोगों द्वारा अपनी इच्छा को दूसरों पर थोपने अथवा दूसरों द्वारा प्रतिरोध करने पर भी पूर्ण करने को कहते हैं।
हार्टन एवं हंट के अनुसार, “दूसरों की क्रियाओं को नियंत्रित करने की क्षमता को ही शक्ति कहते हैं। “ पारसंस के अनुसार शक्ति को समाज व्यवस्था की एक ऐसी सामान्यीकृत क्षमता मानते हैं जिसका उद्देश्य सामूहिक हितों के लक्ष्यों को पूर्ण करना होता है।”
मैकाइवर के अनुसार, “शक्ति व्यक्तियों या व्यवहार को नियंत्रित करने, विनियमित करने या निर्देशित करने की क्षमता है।"
गोल्ड हैमर एवं शिल्स के अनुसार, “एक व्यक्ति को उतना ही शक्तिशाली कहां जाता है जितना कि वह अपने लक्ष्यों के अनुरूप दूसरों के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। "
रॉबर्ट बीरस्टीड के अनुसार, “शक्ति बल के प्रयोग की योग्यता है ना कि उसका वास्तविक प्रयोग।" हॉबस "शक्ति भविष्य में कुछ निश्चित लक्ष्य को प्राप्त करने का एक वर्तमान साधन है।" रॉबर्ट डाहल के अनुसार, “शक्ति की परिभाषा प्रभाव के एक विशेष रूप में की जाती है इस रूप में शक्ति प्राप्त करने वाले व्यक्ति की आज्ञा का पालन ना करने के कारण वश बहुत हानि उठानी पड़ती है।”
उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि एक व्यक्ति की शक्ति वास्तव में दूसरे व्यक्तियों के संबंध में वह प्रभाव है जो कि दूसरों पर डालने में समर्थ होता है अतः अपने इरादों के अनुसार एक व्यक्ति जिस सीमा तक दूसरों को प्रभावित करता है वह उसकी शक्ति है। मैक्स वेबर ने शक्ति को व्यक्ति अथवा व्यक्तियों में निहित मानकर एक ऐसी क्षमता के रूप में परिभाषित किया है जिसके द्वारा शक्ति धारण करने वाला व्यक्ति अपनी इच्छा को दूसरों लोगों की इच्छा पर लादता है, जबकि पारसंस शक्ति को एक समाज व्यवस्था के रूप में मानते हैं जिसका प्रयोग सामूहिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होता हैं। मनुष्य के अपने जीवन के अनेक लक्ष्य होते हैं, जिन्हें वह प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। व्यक्ति अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए शक्ति को साधन के रूप में प्रयुक्त करता है और दूसरे व्यक्तियों के व्यवहारों को प्रभावित करता है। वह व्यक्तियों को अपनी इच्छा अनुसार परिवर्तित करने का प्रयत्न करता है। इस तरह शक्ति दूसरे लोगों को प्रभावित करने एवं नियंत्रित करने की क्षमता है।
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