प्रस्थिति के अर्थ एवं व्याख्या - Meaning and Explanation of Status
प्रस्थिति के अर्थ एवं व्याख्या - Meaning and Explanation of Status
‘प्रस्थिति' शब्द जेहन में आते ही किसी व्यक्ति की 'हैसियत' का संदर्भ प्रतीत होने लगता है। प्रतिदिन की जीवनचर्या में हमें यह सुनने को मिलता है कि फलां की प्रस्थिति निम्न है तथा फलां की स्थिति उच्च है। समाज में प्रत्येक व्यक्ति को एक स्थान मिला होता है तथा इसी स्थान को उस व्यक्ति की प्रस्थिति कहा जाता है। उदाहरणस्वरूप, कॉलेज में प्राचार्य की प्रस्थिति, पति की प्रस्थिति, मित्र की प्रस्थिति, छात्र की प्रस्थिति आदि। समान्यतः एक व्यक्ति की अनेक प्रस्थितियाँ होती हैं, जैसे एक व्यक्ति कॉलेज में प्रधानाध्यापक हैं, घर में वह किसी का पति है, किसी का पुत्र है, किसी का पिता है, साथ ही अपनी मित्र मंडली में मित्र की प्रस्थिति पर है। यहाँ प्रस्थिति की संकल्पना से जुड़े कुछ विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं को प्रस्तुत किया जा रहा है -
राल्फ लिंटन लिखते हैं कि
“प्रस्थिति किसी व्यक्ति की सामाजिक व्यवस्था में एक स्थिति है।"
के. डेविस के अनुसार,
प्रस्थिति किसी भी सामान्य संस्थात्मक व्यवस्था में किसी पद की सूचक है तथा यह जनरीतियों एवं रूढ़ियों से सम्बद्ध होती है। प्रस्थिति किसी व्यक्ति को स्वतः ही प्राप्त होती है तथा वह इसे परंपरागत तरीके से प्राप्त करता है।"
आगबर्न एवं निमकाफ ने प्रस्थिति की व्याख्या दूसरे व्यक्ति के संबंध में एक व्यक्ति के स्थान के रूप में की है।
इलियट एवं मैरिल के अनुसार,
"लिंग, आयु, परिवार, वर्ग, व्यवसाय, विवाह अथवा स्वयं के प्रयासों से प्राप्त स्थिति को ही प्रस्थिति कहते हैं। "
प्रस्तुत की गई परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह किसी समाज के अंतर्गत व्यक्ति की स्थिति अथवा हैसियत होती है, जो किसी अन्य व्यक्ति के सापेक्ष रहती है। प्रत्येक व्यक्ति को इसी प्रस्थिति के अनुरूप अपने व्यवहार व कार्यप्रणाली को निर्धारित करना पड़ता है।
सामाजिक व्यवस्था को समझने के लिए प्रस्थिति के साथ ही जुड़ी भूमिका की संकल्पना को समझ लेना आवश्यक है। ये दोनों संकल्पनाएँ समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान के मध्य एक पुल के रूप में कार्य करती हैं। पारसंस ने क्रिया को समाज व्यवस्था की आधारभूत इकाई के रूप में व्याख्यायित किया है तथा कर्ता प्रस्थिति और भूमिकाओं का एक सम्मिश्रित गुच्छा है। इसे हम एक उदाहरण की सहायता से सरलता से समझ सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति की समाज में पिता की प्रस्थिति है। उसके द्वारा की जाने वाली भूमिका का स्पष्टीकरण हम निम्न तीन बिदुओं के रूप में कर सकते हैं -
• पिता से किसी समाज से अपेक्षित व्यवहार
• व्यक्ति द्वारा पिता के रूप में चेतन अथवा अचेतन प्रकार से किया गया व्यवहार
• व्यक्ति द्वारा किया गया सम्पूर्ण व्यवहार (जो उसके पिता के व्यवहार को प्रभावित करता है)
किंग्सले डेविस ने स्पष्ट किया कि एक व्यक्ति की अनेक प्रस्थितियाँ हो सकती हैं। कोई व्यक्ति अस्पताल में चिकित्सक हो सकता है, किसी संगठन का सदस्य हो सकता है, एक खिलाड़ी हो सकता है, सामाजिक कार्यकर्ता हो सकता है, अच्छा मार्गदर्शक हो सकता है आदि-आदि। ऐसी दशा में उस व्यक्ति की सामान्य प्रस्थिति का मूल्यांकन इन सभी पदों के अनुरूप की गई भूमिका पर निर्धारित की जाएगी। कोई भी सामाजिक प्रस्थिति स्वतंत्र नहीं रहती है, अपितु वह सापेक्षिक होती है। सामाजिक व्यवस्था में एक ओर जहां एक व्यक्ति के अनेक पद देखने को मिलते हैं, वही दूसरी ओर इन पदों का वितरण बड़ा संगठित रूप में रहता है।
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