धर्म का अर्थ , परिभाषाएं , धर्म की विशेषताएं - Meaning, Definitions, Characteristics of Religion

 धर्म का अर्थ , परिभाषाएं , धर्म की विशेषताएं - Meaning, Definitions, Characteristics of Religion


धर्म शिक्षा एवं राजनीति मनुष्य के जीवन के अनिवार्य तत्व हैं। धर्म एक ऐसा अमूर्त तत्व है जो मनुष्य की बुनियादी आवश्यकताओं से भी बढ़कर महत्वपूर्ण है। डेविस के अनुसार मानव समाज में धर्म इतना सार्वभौमिक स्थाई एवं व्यापक है कि धर्म को स्पष्ट रूप से समझे बिना हम समाज को नहीं समझ सकते।” यही कारण है कि धर्म बहुत लंबे समय से समाज में अध्ययन एवं चिंतन का विषय रहा है। पाश्चात्य विद्वानों का कथन है कि धर्म केवल सभ्य समाज के साथ जुड़ा होता है पर वास्तविकता यह नहीं है धर्म सभी ज्ञात समाजों में विद्यमान रहता है। इसलिए गिलिन एवं गिलिन ने कहा है कि “सामाजिक विज्ञान में धर्म की वास्तविकता के संदर्भ में उसकी सत्यता या असत्यता का अध्ययन नहीं किया जाता बल्कि सामाजिक जीवन के एक पहलू के रूप में धर्म का अध्ययन किया जाता है।

इसलिए समाजशास्त्र की मुख्य रुचि यह ज्ञात करने में है कि धर्म समाज में कैसे कार्य करता है तथा इसका अन्य संस्थाओं से क्या संबंध है। इसलिए तुलनात्मक अध्ययनओं के द्वारा धर्म की भूमिका की समीक्षा करने का प्रयास किया जाता है। धर्म, धार्मिक विश्वास, व्यवहार और संस्थाएं संस्कृति के पक्षों को जिस रूप में प्रभावित करती है उसे ज्ञात करने में भी समाज शास्त्रियों की विशेष रुचि होती है। यही कारण है कि दुर्खीम और मैक्स वेबर द्वारा धर्म पर किए गए अध्ययन धार्मिक या ईश्वर मीमांसीय अध्ययनों से पूर्णतः भिन्न है।


धर्म अलौकिक शक्तियों में विश्वास एवं इसकी उपासना पर आधारित है। धर्म का संबंध हमारी मानसिक प्रवृत्ति से होता है और इसकी उत्पत्ति हमारे विचारों और संस्कारों के द्वारा होती है धर्म को हम किसी अति मानवीय शक्ति के प्रति विश्वास किसी पवित्र वस्तु के प्रति विश्वास या किसी आध्यात्मिक शक्ति के प्रति विश्वास के रूप में देखते हैं।

यह विश्वासओं प्रतीकों मूल्यों और क्रियाओं की संस्थागत प्रणाली है। धर्म किसी ना किसी प्रकार की अति मानवीय या आलौकिक या समाजोपरि शक्ति पर विश्वास जिसका आधार भय, श्रद्धा, भक्ति और पवित्रता की धारणा है और जिसकी अभिव्यक्ति प्रार्थना पूजा या आराधना है। 


धर्म की परिभाषाएं


विभिन्न विचारकों ने धर्म की विभिन्न परिभाषाएं प्रस्तुति है उसमें से कुछ इस प्रकार हैं


टायलर के अनुसार “धर्म आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास है।”


जेम्स फ्रेजर के अनुसार धर्म से मैं मनुष्य से श्रेष्ठ उन शक्तियों की संतुष्टि या आराधना समझता हूं जिनके संबंध में यह विश्वास किया जाता है कि वह प्रकृति और मानव जीवन को मार्ग दिखाती है और नियंत्रित करती है।


मैलिनोवस्की के अनुसार “धर्म क्रिया की एक विधि है और साथ ही विश्वासों की एक व्यवस्था भी धर्म एक समाजशास्त्री तथ्य होने के साथ ही व्यक्तिगत अनुभव भी है।"


  धर्म की विशेषताएं


धर्म में निम्नलिखित मौलिक विशेषताएं पाई जाती हैं


1. धर्म के दो पक्ष होते हैं आंतरिक पक्ष और बाह्य पक्ष। आंतरिक पक्ष में विचार भावनाएं धार्मिक प्रथाएं और मनुष्य के ईश्वर से संबंधित कार्यों के संबंध में विश्वास आदि सम्मिलित होते हैं। जबकि बाहरी पक्ष में प्रार्थना प्रथाएं धार्मिक उत्सव स्मृतियां आदि सम्मिलित होते हैं। धर्म में विश्वास की अभिव्यक्ति की जाती है।


2. धर्म का आधार विश्वास मानव से ऊपर किसी भी शक्ति में विश्वास रखना धर्म की प्रमुख विशेषता है और यह शक्ति मानव शक्ति की अपेक्षा श्रेष्ठ होती है। इस शक्ति को व्यक्ति अपने बाहरी आचरणों के द्वारा व्यक्त करता है। वासी इसमें केवल विश्वास ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि इसके माध्यम से व्यक्ति अपने विश्वासों का प्रदर्शन भी करता है।


3. धर्म व्यक्तिगत व सामाजिक धर्म व्यक्ति के व्यक्तिगत अनुभव से संबंधित होने के साथ-साथ सामाजिक अनुभवों से भी संबंधित होता है। इस तरह हमें कह सकते हैं कि धर्म सामाजिक वस्तु होते हुए भी व्यक्तिगत है। अनुभूति के द्वारा समझा जाने वाला विश्वास उसका धर्म है और यदि व्यक्ति किसी दूसरे धर्म से तुलना करके उसे अधिक श्रेष्ठ मानता है और उसे भी अपना सकता है इस तरह धर्म सामाजिक वस्तु है।


4. भय की धारणा धर्म सामाजिक नियंत्रण का एक प्रमुख साधन है। यह सामाजिक नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। क्योंकि धर्म में पवित्रता के साथ भय की भावना भी निहित होती है और इसी भय के कारण मनुष्य अनैतिक कार्य करने से डरता है।


5. पवित्रता की धारणा धार्मिक विश्वासों व स्थानों में पवित्रता का भाव निहित होता है। धर्म के साथ साथ पवित्रता धारणा हमेशा संबंधित रहती है।


6. सार्वभौमिकता हम एक सार्वभौमिक संस्था है। यह आदिकाल से लेकर वर्तमान सभ्य समाज तक ना किसी रूप में विद्यमान रहा है। अति प्राचीन काल में भी जनजाति समाज में आत्मा, माना, भूत प्रेत आदि शक्तियों के प्रति जो विश्वास व्यक्त किया गया है वह इस बात का प्रमाण हैं कि धर्म हर समय हर समाज में विद्यमान रहा है।


7. धर्म मानव समाज का सर्वश्रेष्ठ मूल्य है पवित्रता, आदर, भय की अवधारणा, विश्वासों की अनुभूति के कारण धर्म को मानव समाज का सर्वश्रेष्ठ मूल्य माना गया है।


8. मानव जीवन का नियंत्रण व निर्देशन धर्म की शक्ति प्राकृतिक व मानवीय जीवन को नियंत्रित करती है। इस शक्ति को मानवोपरि माने जाने के कारण व्यक्ति इससे डरता भी है यह शक्ति एक सामाजिक शक्ति भी है।


पवित्र शक्ति धर्म से संबंधित चीजें पवित्र मानी जाती हैं जैसे कि रामायण, गीता, कुरान, पवित्र ग्रंथ है। मंदिर मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारे आदि पवित्र स्थान है।